‘मंदिर के खंडहर पर बनी बाबरी मस्जिद अमान्य, शरिया के विपरीत’ – 1608-1611 के इतिहास का उल्लेख

मस्जिद का निर्माण मंदिर के खंडहरों पर किया गया और यह मंदिर के खंडहर पर है तो यह एक वैध मस्जिद नहीं हो सकती। यह शरिया क़ानून के विपरीत है, जिसमें कहा गया है कि मस्जिद को बेकार ज़मीन पर...

विवादित अयोध्या भूमि पर दावा करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के सामने ऐतिहासिक तथ्यों और पुरातात्विक सबूतों को रखते हुए, बुधवार को पेश वकील ने कहा कि बाबरी मस्जिद शरिया कानून के तहत ‘अमान्य’ थी क्योंकि इसे मंदिर के खंडहरों पर बनाया गया था। इस भूमि का संबंध हिंदुओं से था।

तेरहवीं शताब्दी में भारत की यात्रा करने वाले विभिन्न पश्चिमी और चीनी तीर्थयात्रियों का हवाला देते हुए, वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन ने मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और जस्टिस एसएपी चड्डे, डी वाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एसए नज़ीर की पीठ को बताया कि हिंदुओं की आस्था है कि अयोध्या भगवान राम का जन्म स्थान है जिसका इतिहास सदियों पुराना है। उन्होंने विभिन्न पश्चिमी और चीनी तीर्थयात्रियों के कई दस्तावेजी सबूतों का हवाला दिया, जो तेरहवीं सदी में भारत और अयोध्या आए थे, जहाँ उन्होंने उनकी पूजा की थी। उन्होंने बताया कि विवादित भूमि हमेशा से ही हिंदुओं के लिए काफ़ी मायने रखती है, उसे हिंदुओं ने भगवान राम की जन्मभूमि के रूप में हमेशा पूजा है।

वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन ने 1608-1611 के दौरान भारत आए अंग्रेज व्यापारी विलियम फिंच के यात्रा वृतांत का उल्लेख किया, जिसमें दर्ज किया गया था कि अयोध्या में एक किला या महल था जहाँ, हिन्दुओं का विश्वास है कि भगवान राम का जन्म हुआ था।

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सीएस वैद्यनाथन ने बेंच को बताया कि विवादित भूमि पर एक मंदिर था और इसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्वीकार किया था। मस्जिद का निर्माण मंदिर के खंडहरों पर किया गया था और यह मंदिर के खंडहर पर है तो यह एक वैध मस्जिद नहीं हो सकती। यह शरिया क़ानून के विपरीत है, जिसमें कहा गया है कि मस्जिद को बेकार ज़मीन पर नहीं बनाया जा सकता है।

उन्होंने आगे कहा कि विदेशी यात्रियों में एक विरोधाभास था क्योंकि उनमें से कुछ ने कहा था कि यह मुगल सम्राट बाबर था जिसने मंदिर को ध्वस्त कर दिया था जबकि कुछ का कहना है कि इसे दूसरे मुगल शासक औरंगजेब के कार्यकाल के दौरान नष्ट किया गया। लेकिन उनके बीच अयोध्या में भगवान राम के जन्मस्थान होने को लेकर कोई मतभेद नहीं था।

पीठ ने तब सवाल उठाया कि मस्जिद का नाम बाबरी मस्जिद कैसे रखा गया और क्या इस बात का कोई सबूत है कि बाबर ने मंदिर को ध्वस्त किया था या उसे ध्वस्त करने का कोई आदेश दिया था। वैद्यनाथन ने उत्तर दिया कि मस्जिद का नाम केवल 19वीं शताब्दी में बाबरी मस्जिद रखा गया था और मंदिर के विध्वंस में बाबर की भागीदारी साबित करने के लिए कोई प्रामाणिक दस्तावेजी सबूत नहीं है। उन्होंने कहा कि ‘बाबरनामा’ में भी बाबर की अयोध्या यात्रा पर कुछ नहीं लिखा।

लेकिन मुस्लिम पक्षकारों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कहा कि बाबर अयोध्या आया था। लेकिन उसने वहाँ क्या किया इस संदर्भ में कोई जानकारी इसलिए नहीं है कि क्योंकि उस पुस्तक के कुछ पृष्ठ ग़ायब हैं।

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