अप्रिय नितीश कुमार, बच्चों का रक्त अपने चेहरे पर मल कर 103 दिन तक घूमिए

मीडिया नहीं घेरेगी क्योंकि आधी मीडिया नितीश को भाजपा के पार्टनर के रूप में देखती है, और बाकी की आधी मीडिया को लगता है कि आने वाले दिनों में नितीश मोदी के विरोधियों के खेमे में शिफ्ट हो सकते हैं। ऐसे में जैसी तीक्ष्णता के साथ योगी पर धावा बोला गया था, वैसी तीक्ष्णता नितीश के मामले में नहीं दिखेगी।

सौ से ज़्यादा बच्चे मर गए, इससे आगे क्या कहा जाए! विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है। हॉस्पिटल का नाम, बीमारी का नाम, जगह का नाम, किसकी गलती है आदि बेकार की बातें हैं, क्योंकि सौ से ज़्यादा बच्चे मर चुके हैं। इतने बच्चे मर कैसे जाते हैं? क्योंकि भारत में जान की क़ीमत नहीं है। हमने कभी किसी सरकारी कर्मचारी या नेता को इन कारणों से हत्या का मुकदमा झेलते नहीं देखा।

सूरत में आग में बच्चे मर गए, कौन-सा नेता या सरकारी अफसर जेल गया? किसी को पता भी नहीं। शायद कोई जाएगा भी नहीं क्योंकि इसे हत्या की जगह हादसा कहा जाता है। हादसा का मतलब है कि कोई अप्रिय घटना हो गई। जबकि, ये घटना ‘हो’ नहीं गई, ये बस इतंजार में थी अपने होने की। ये तो व्यवस्थित तरीके से कराई गई घटना है। ये तो कुछ लोगों द्वारा एक तरह से चैलेंज है कि ‘हम अपना काम नहीं करेंगे ठीक से, तुम से जो हो सकता है कर लो’।

तब पता चलता है कि माँओं की गोद में बेजान लाशें हैं और बिल्डिंग से चालीस फ़ीट ऊपर तक गहरा धुआँ उठ रहा है। जब आग थमती है तो आपके पास एक संख्या पहुँचती है कि इतने लोग मर गए। बिहार वाले कांड में भी हम संख्या ही गिन रहे हैं। संख्या से तब तक फ़र्क़ नहीं पड़ता, किसी को भी नहीं, जब तक वो बच्चा आपका न हो।

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अधिकांशतः, हम इसलिए लिखते हैं क्योंकि हमें किसी को अटैक करना है। हमारी संवेदनशीलता अकांउटेबिलिटी फ़िक्स करने की जगह, या इस बीमारी के प्रति जागरूकता जगाने की जगह, किसकी सरकार है, कौन मंत्री है, और किसने क्या बेहूदा बयान दिया है, उस पर बात बढ़ाने में चली जाती है। हम स्वयं ही ऐसे विषयों पर बच्चों या उनके माता-पिता के साथ खड़े होने की जगह किसी के विरोध में खड़े हो जाते हैं।

जब आप विरोध में खड़े हो जाते हैं तो मुद्दा आक्रमण की तरफ मुड़ जाता है। मुद्दा यह नहीं रहता कि सरकार क्या कर रही है, कैसे कर रही है, आगे क्या करे, बल्कि मुद्दा यह बन जाता है कि तमाम वो बिंदु खोज कर ले आए जाएँ ताकि पता चले कि इस नेता ने कब-कब, क्या-क्या बोला है। फिर हमारी चर्चा सरकार को, जो विदित है कि निकम्मी है, उसी को और निकम्मी बताने की तरफ मुड़ जाती है। जबकि चर्चा की ज़मीन ही यही होनी चाहिए कि सरकार तो निकम्मी है ही, लेकिन आगे क्या किया जाए।

गोरखपुर में अगस्त के महीने में दो साल पहले ऐसे ही बच्चों की मौतें हुई थीं। उस वक्त भी चर्चा ऐसे ही भटक कर कहीं और पहुँच गई थी। उस वक्त भी भाजपा-योगी के चक्कर में लोग संवेदना की राह से उतर कर कब संवेदनहीनता में बच्चों की तस्वीरें लगा कर अपनी राजनैतिक घृणा का प्रदर्शन करने लगे, उन्हें पता भी नहीं चला। बच्चों की बीमारी, और यह बीमारी होती क्यों है, इसको छोड़ कर बातें इस पर होने लगी कि किसने क्या बयान दिया है।

बिहार एक बेकार जगह बनी हुई है। सुशासन बाबू ने जो तबाही वहाँ मचाई है, वो लालू के दौर से बहुत अलग नहीं है। ये सारे बच्चे बचाए जा सकते थे। ये बीमारी जिन दो तरीक़ों से फैलती है, उसमें से एक मच्छर के काटने से होती है, दूसरा है जलजनित। पहले के लिए टीका विकसित किया जा चुका है, दूसरे में तुरंत लक्षण पहचान कर डॉक्टर तक पहुँचना ही बचाव है। उसका कोई टीका नहीं।

ऐसे में जागरुकता अभियान की ज़रूरत होती है जो कि सरकार की ज़िम्मेदारी है। सरकार की ज़िम्मेदारी इसलिए है क्योंकि सरकारों में एक स्वास्थ्य विभाग होता है, और हम साबुन ख़रीदते हैं तो उस पर टैक्स कटता है जिससे सरकारों के मंत्री और अफसरों की तनख़्वाह जाती है। ये लोग इन बच्चों के हत्यारे हैं क्योंकि बिहार सरकार ने इस बीमारी से निपटने के लिए काग़ज़ पर एक पूरी प्रक्रिया बनाई हुई है। इसमें टीकाकरण से लेकर स्वच्छता और जागरुकता अभियान शामिल है। लेकिन वो इस साल लागू नहीं किया गया क्योंकि पिछले साल कम बच्चे मरे थे।

इसका समीकरण बिलकुल सीधा है, जब ज़्यादा बच्चे मर जाते हैं तो सरकार हरकत में आती है और बताया जाता है कि फ़लाँ लोगों को विदेश भेजा जाएगा इस पर स्टडी करने के लिए। सरकारें अपनी गलती नहीं मानतीं। वो यह नहीं बताती कि इस बीमारी से बचाव असंभव तो बिलकुल नहीं है। जैसे ही ऐसा मौसम आए, सरकारी काग़ज़ों में लिखा है कि लोगों में जागरूकता फैलाई जाए कि इस बीमारी के लक्षण क्या हैं, कैसे बचाव हो सकता है, सफ़ाई रखनी है आदि।

गोरखपुर में भी, और पूरे पूर्वांचल बेल्ट में, 1977 से हजारों बच्चे हर साल मरते रहे। गोरखपुर वाला मामला दो साल पहले जब राष्ट्रीय परिदृश्य में उछला तो योगी सरकार ने इस पर एक्शन लिया। टीकाकरण को प्राथमिकता दी गई और नवजात शिशुओं से शुरुआत की गई। सूअरों को आबादी वाले इलाके से हटाया गया। मच्छर मारने के उपाय किए गए। जागरूकता फैलाई गई कि बच्चों को मिट्टी वाले फ़र्श पर न सोने दिया जाए। सारे लक्षण बताए गए कि लोग तुरंत समझ सकें कि बच्चे को बीमारी हुई है, और अस्पताल ले जाना आवश्यक है।

लेकिन बिहार में इनके निष्प्राण होने का इंतजार किया जा रहा था शायद। 2015 में हुआ था तो काग़ज़ पर लिखा गया कि क्या करना है। एक-दो साल उस पर एक्शन भी हुआ। फिर लगता है सरकार भूल गई कि ये हर साल आता है और बच्चों को महज़ एक संख्या में बदल कर चला जाता है।

सरकारें भूल जाती हैं कि भारत जैसे देश में, या बिहार जैसे राज्य में, जहाँ जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा दो रोटी जुटाने में व्यस्त रहता है, वहाँ माँ-बाप से कहीं ज्यादा ज़िम्मेदारी सरकार की होती है कि वो अपना बहुत ज़रूरी काम करे क्योंकि उसके लिए एक मंत्रालय बनाया गया है। जो बच्चे मरते हैं वो किसी की पहली या दूसरी संतान होते हैं। वो शायद जागरुक नहीं होते इन बातों को लेकर। उनके लिए शायद सीज़न बीतने के बाद लक्षण पहचानने में गलती हो सकती है।

इसकी भयावहता को ‘चमकी बुखार’ जैसा बेहूदा नाम देकर कम किया जाना भी अजीब लगता है। ऐसी बीमारी जो हजारों बच्चों को लील जाती है उसके नाम में ‘चमकी’ और ‘बुखार’ जैसे सामान्य शब्दों का प्रयोग बताता है कि सरकार ने भारतीय जनमानस के सामूहिक मनोविज्ञान पर अध्ययन नहीं किया कि वो किस तरह के नामों से डरते हैं, किस नाम पर ज्यादा रिएक्ट नहीं करते। आप सोचिए कि जिस व्यक्ति को इसकी भयावहता का अंदाज़ा न हो, वो ‘चमकी बुखार’ सुन कर इस बीमारी के बारे में क्या राय बनाएगा।

इसीलिए लोग सरकार चुनते हैं कि वो अगर नमक ख़रीदकर आपको टैक्स देते हैं तो उनकी कुछ ज़िम्मेदारी आपको लेनी ही होगी। यहाँ सरकार को लगातार मिशन मोड में यह बताते रहना होगा, चाहे आदमी सुन-सुन कर चिड़चिड़ा हो जाए, कि मस्तिष्क ज्वर से बचाव कैसे करें, कौन-सा पानी पिएँ, मच्छरों से बचाव करें, घर के आस-पास गंदगी न फैलने दें। इस पूरी प्रक्रिया को, इस जागरुकता अभियान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पारंपरिक ज्ञान की तरह आगे बढ़ाने की हद तक फैलाते रहना चाहिए।

सुशासन बाबू की सरकार में बिहार में शायद कुछ भी सही नहीं हो रहा। अपराध घट नहीं रहे, शिक्षकों को वेतन नहीं मिल रहा, पटना के पीएमसीएच के आईसीयू में लोग बाँस वाला पंखा हौंक रहे हैं, सड़कों पर अराजकता है… एक बिहारी आज भी वापस जा कर कुछ करने से डरता है क्योंकि जिस लालू के काल को गाली देकर, उसे एक घटिया उदाहरण बता कर नितीश कुमार सत्ता में आए, उन्होंने शुरुआत के कुछ सालों के बाद, बिहार के लिए कुछ नहीं किया।

मीडिया नहीं घेरेगी क्योंकि आधी मीडिया नितीश को भाजपा के पार्टनर के रूप में देखती है, और बाकी की आधी मीडिया को लगता है कि आने वाले दिनों में नितीश मोदी के विरोधियों के खेमे में शिफ्ट हो सकते हैं। ऐसे में जैसी तीक्ष्णता के साथ योगी पर धावा बोला गया था, वैसी तीक्ष्णता नितीश के मामले में नहीं दिखेगी। उसके बाद मीडिया वालों को अपना बिजनेस भी देखना है। उस योजना में नितीश किसी भी तरह से फ़िट नहीं बैठते। इसलिए, इतनी बर्बादी और निकम्मेपन के बाद भी जदयू-भाजपा की सरकार कभी भी ज़हरीली आलोचना की शिकार नहीं हुई है।

सोशल मीडिया वाली जेनरेशन

इसी संदर्भ में सोशल मीडिया पर देखने पर एक हद दर्जे की संवेदनहीनता दिखती है। ये संवेदनहीनता सोशल मीडिया की पहचान बन चुकी है जहाँ मुद्दा बच्चों की मौत से हट कर राजनैतिक विरोधियों को गरियाने तक सिमट जाता है। हर दूसरा आदमी अपने पोस्ट पर तीसरे आदमी को धिक्कार रहा है कि कोई इस पर क्यों नही लिख रहा, फ़लाँ आदमी कुछ क्यों नहीं कर रहा, आप सही आदमी को क्यों नहीं चुनते…

हो सकता है दो-एक लोग सही मंशा रखते हों। हो सकता है कुछ लोग विचलित हो गए हों। लेकिन बच्चों की तस्वीरें लगा कर आप कुछ नहीं कर रहे, सिवाय दिखावे के। उस तस्वीर के लगाने से आप संवेदनशील नहीं हो जाते। अगर आप संवेदनशील हैं तो आपको दूसरे ‘क्या नहीं हैं’, वो बताने की कोई ज़रूरत नहीं। हम सारे लोग इस तरह से व्यवहार करने लगते हैं जैसे कि हम ही सबसे ज्यादा विचलित हो गए हों, और हमारी बात हर कोई क्यों नहीं मान रहा, नेता ऐसे कैसे बोल रहे हैं…

ऐसे समय में बात करना, खुद को अभिव्यक्त करना ज़रूरी है। गुस्सा भी वाजिब है लेकिन जज मत बनिए। क्योंकि आपकी संवेदनशीलता आपके ऐसे पोस्ट के बाद वाले पोस्ट में झलक जाती है जहाँ आप किसी और विषय पर चले जाते हैं जिसे पढ़ने के बाद कहीं से नहीं लगता कि आपको बच्चों की मौत से उतना दुःख वास्तव में पहुँचा है जितना आपने पोस्ट में लिख दिया।

सत्य तो यह है कि आपको लिखना है, और आपको दिखना है कि आपने अपनी ज़िम्मेदारी लिख कर निभा ली। जब आपको अपनी ज़िम्मेदारी ही निभानी है तो बस अपने हिस्से का लिखिए। आप रोइए, गाइए, हताश हो जाइए, काला पिक्चर लगाइए, लेकिन आपको कोई हक़ नहीं है यह कहने का कि बाकी लोग क्या कर रहे हैं। ज्योंहि आप बच्चों की मौतों को अपने व्यक्तिगत इमेज बिल्डिंग के लिए इस्तेमाल करने लगते हैं, वो बच्चे दोबारा मर जाते हैं।

सरकारों को आड़े हाथों लेना, आलोचना करना, स्वास्थ्य सुविधाओं पर आवाज उठाना हमरा फर्ज है एक नागरिक के तौर पर लेकिन जब आप इसे खानापूर्ति की तरह लगाते हैं तो पता चलता है कि आप गंभीर नहीं हैं। गंभीरता तब झलकेगी जब आप दूसरों पर फ़ैसले नहीं सुनाएँगे, और अगर एक मुद्दा पकड़ा है तो उस पर तब तक लिखते रहेंगे जब तक वो सही मुक़ाम तक न पहुँच जाए।

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