जेपी आंदोलन का जहर तो बिहार के हिस्से आया, लेकिन रत्न कहाँ गए?

सत्ता कायम रखने के लिए इन्दिरा गाँधी ने 25 जून 1975 को लोकतंत्र का गला घोंट दिया। देश में आपातकाल लागू हो गया, जिसे 'सरकारी संत' कहलाने वाले विनोबा भावे ने 'अनुशासन पर्व' भी घोषित कर दिया था। जेपी को उस दौर में चंडीगढ़ में रखा गया था और बिहार की बाढ़ पर जनता की मदद के लिए उन्होंने पेरोल भी माँगा था।

ये वो दौर था जब गुजरात में ‘नव निर्माण’ नाम के छात्र आन्दोलन ने सरकार को उखाड़ फेंका था। गुजरात की ही तर्ज पर बिहार में भी आन्दोलन शुरू हो चुका था। मगर वहाँ और यहाँ एक अंतर था। बिहार की छात्र राजनीति में सक्रिय राजनैतिक दलों की छात्र इकाइयाँ भी शामिल हो रही थीं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, समाजवादी युवजन सभा, लोक दल, ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन इत्यादि बिहार के आन्दोलन में शामिल हुए। विपक्षी पार्टियों ने उस वक्त की कॉन्ग्रेसी सरकार के खिलाफ हड़ताल का आह्वान किया। राज्य भर में जब 1973 में हड़ताल की बात चल रही थी, तब राज्य की कमान कॉन्ग्रेस पार्टी के अब्दुल गफ्फूर के हाथ में थी।

इसी वक्त मध्य प्रदेश में 17 अगस्त 1973 को पुलिस की गोलियों से 8 छात्रों की मौत हुई और रैना जाँच आयोग ने इसके लिए सीधे तौर पर मध्य प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार को दोषी बताया। बिहार भर के कई छात्र नेता उस वक्त बिहार छात्र संघर्ष समिति (बीसीएसएस) के तौर पर एक जगह इकठ्ठा होने लगे और 18 फरवरी 1974 को बीसीएसएस की बैठक हुई। इसमें लालू प्रसाद यादव को बीसीएसएस का प्रेसिडेंट चुना गया था। इस बीसीएसएस में सुशील कुमार मोदी और रामविलास पासवान जैसे नेता भी शामिल थे। 18 मार्च 1974 को बीसीएसएस ने बिहार विधानसभा का बजट सत्र के दौरान घेराव करने का फैसला किया।

इस घेराव के दौरान भूतपूर्व शिक्षा मंत्री रहे रामानंद सिंह का आवास ही जला दिया गया था। मुख्यमंत्री अब्दुल गफ्फूर ने छात्रों को समझाने की कोशिश की थी, मगर राज्य भर में चल रहे आन्दोलन में तब तक पटना में कुछ छात्र पुलिस के हाथों मारे जा चुके थे। बीसीएसएस ने 23 मार्च को फिर से बिहार भर में हड़ताल का आह्वान किया। जब बिहार भर में ये सब चल रहा था, तब जय प्रकाश नारायण गुजरात में ‘नव निर्माण’ आन्दोलन देखकर लौटने की तैयारी में थे। राजनैतिक रूप से ये ‘भूदान आंदोलन’ के खत्म होने का दौर भी था और जेपी अपने आप को भूदान आन्दोलन से अलग कर रहे थे। फरवरी के शुरुआती दौर से शुरू हुई ये कवायद आखिर 30 मार्च 1974 को खत्म हुई, जब उन्होंने आन्दोलन में शामिल होने की अपनी मंशा साफ जाहिर कर दी।

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केंद्र की राजनीति और इन्दिरा गाँधी पर इन आन्दोलनों का असर न पड़ रहा हो, ऐसा भी नहीं था। ये जरूर कहा जा सकता है कि उस वक्त वो दूसरे मामलों में भी व्यस्त रही होंगी। ‘सरकारी संत’ कहलाने वाले विनोबा भावे के आन्दोलन से अलग होकर कॉन्ग्रेसी सरकार को हटाने के छात्र आन्दोलन में शामिल हो रहे जेपी के बारे में तब इन्दिरा गाँधी ने कहा था, “जो पूँजीपतियों से पैसा और मदद लेता रहता है, आखिर ऐसा आदमी भ्रष्टाचार पर बात भी कैसे कर सकता है?” कॉन्ग्रेसी समाजवाद उद्योगपतियों को भ्रष्ट और देश का शत्रु ही मानता था। उनकी ये सोच नेहरु वाले रिसाव के सिद्धांत से काफी हद तक आम आदमी में भी आई। विनोबा भावे ने इसके थोड़े ही समय बाद लगे आपातकाल को ‘अनुशासन पर्व’ घोषित किया था।

अप्रैल आते-आते ये आन्दोलन पूरी तरह जोर पकड़ चुका था। 8 अप्रैल को हजारों छात्र पटना के मौन जुलूस में शामिल हुए। गया में 12 अप्रैल को प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने गोलियाँ चलाई और लोग मारे गए। जवाब में आम जनता ने बिहार विधानसभा को भंग करने की माँग उठाई। एनएच 31 जाम कर दिया गया और लोगों ने खुद ही अपने आप पर कर्फ्यू लगा लिया। अप्रैल के इस दौर में जेपी दिल्ली में नागरिक अधिकारों की माँग करने वाले संगठनों के साथ मिलकर सरकार का इस्तीफा माँग रहे थे। जाहिर है ये माँगें कामयाब नहीं हुईं। इस दौर तक ये आन्दोलन अपने पूरे शबाब पर नहीं आया था। सत्ता और विपक्ष दोनों ओर से रस्साकशी जारी थी और आम लोगों का पलड़ा भारी दिख रहा था।

ये अलग बात है कि कुर्सी के लालच में पड़े राजनीतिज्ञ उस वक्त भी जनभावना को समझने से साफ इनकार कर रहे थे। 5 जून को आयोजित रैली में जेपी ने जनता से बिहार विधानसभा पर विरोध प्रदर्शन करने के लिए कहा। जल्द ही ‘सम्पूर्ण क्रांति’ कहलाने वाले आन्दोलन का दौर आने लगा था। 1 जुलाई 1974 तक करीब 1600 प्रदर्शनकारी और 60 से अधिक छात्र नेता गिरफ्तार किए जा चुके थे। जेपी ने 3 अक्टूबर से तीन दिन की राज्यव्यापी हड़ताल बुलाई और 6 अक्टूबर को एक जनसभा को भी संबोधित किया। नव निर्माण की ही तर्ज पर विधायकों से इस्तीफा देने के लिए भी कहा गया था लेकिन जैसा कि पहले ही कहा कि अपनी आँखों पर चढ़ी चर्बी के कारण राजनीतिज्ञ जनभावना नहीं समझ रहे थे। उस समय के 318 विधायकों में से केवल 42 ने इस्तीफा दिया था। कईयों ने इस्तीफा देने से साफ मना कर दिया।

इन्दिरा गाँधी ने बिहार के मुख्यमंत्री अब्दुल गफ्फूर को नहीं बदला। वो गुजरात की तरह बिहार में ‘कमजोर पड़ती’ नहीं दिखना चाहती थीं। गुजरात में चुनाव टाल दिए गए थे और मोरारजी देसाई के अनशन के बाद वहाँ 10 जून 1975 को चुनाव हुए। इन चुनावों में कॉन्ग्रेस को करारी हार झेलनी पड़ी थी और 12 जून 1975 को जिस दिन ये नतीजे आए, उसी दिन इलाहबाद हाई कोर्ट ने 1971 के लोकसभा चुनावों में धाँधली करने के आरोप में इन्दिरा गाँधी का चुनाव रद्द कर दिया। इस फैसले के कारण वो संसद से तो निकाली ही गई, साथ ही उन पर 6 साल तक चुनाव न लड़ने का प्रतिबन्ध भी लगाया गया था। अदालत के फैसले को मानने से साफ इनकार करते हुए ‘आयरन लेडी’ फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में गईं।

फिर तत्कालीन राष्ट्रपति वीवी गिरी को कहकर मुख्य न्यायाधीश के तौर पर एएन रे को लाकर बिठाया गया। जेपी ऐसे फैसलों के भी विरोध में थे और इस बारे में भी उन्होंने इन्दिरा गाँधी को चिट्ठियाँ लिखी थीं। सत्ता कायम रखने के लिए इन्दिरा गाँधी ने 25 जून 1975 को लोकतंत्र का गला घोंट दिया। देश में आपातकाल लागू हो गया, जिसे ‘सरकारी संत’ कहलाने वाले विनोबा भावे ने ‘अनुशासन पर्व’ भी घोषित कर दिया था। जय प्रकाश नारायण और सत्येन्द्र नारायण सिन्हा जैसे कई नेता इस दौर में गिरफ्तार कर लिए गए। जेपी को उस दौर में चंडीगढ़ में रखा गया था और बिहार की बाढ़ पर जनता की मदद के लिए उन्होंने पेरोल भी माँगा था। उनकी तबियत बिगड़ने पर जब 12 नवम्बर को उन्हें छोड़ा गया तो मुंबई के जसलोक अस्पताल में जाँच में पता चला कि उनकी किडनी फेल हो चुकी है। उस समय से बाकी की उम्र जेपी ने डायलिसिस पर गुजारी।

अब जब मुड़कर इस आन्दोलन को देखा जाए, तो ये आन्दोलन बिहार को कई राजनीतिज्ञ देने के लिए याद किया जा सकता है। इस आन्दोलन से निकले लालू प्रसाद यादव 1977 में 29 साल की उम्र में सबसे कम उम्र के सांसद बने। आज कल चारा घोटाले के जुर्म में लालू यादव जेल की सजा काट रहे हैं। उनके शासन काल को बिहार में जातिवादी राजनीति के उदय के अलावा हाईकोर्ट की टिप्पणी में ‘जंगलराज’ घोषित करने के लिए भी जाना जाता है। उन्होंने ‘गोपालगंज टू रायसीना’ नाम की किताब भी लिखी है। गोपालगंज से वो लम्बे समय तक सांसद रहे और रेल मंत्री भी बने। इस रेल मंत्री के गोपालगंज में रेलवे स्टेशन कहाँ है, ये गंभीर शोध का विषय हो सकता है।

इसी आन्दोलन से रामविलास पासवान जैसे राजनीतिज्ञ भी उभर कर आए। वो कॉन्ग्रेस, गठबंधन और भाजपा सभी सरकारों में मंत्री होने के लिए याद किए जा सकते हैं। कभी-कभी उन्हें राजनीति का बैरोमीटर भी कहा जाता है। वो जिस पक्ष के साथ दिखें, उनकी चुनावी जीत की संभावना प्रबल होती है। अपने ही परिवार के लोगों को राजनैतिक पार्टी बना डालने में वो भी दूसरे समाजवादियों जैसे ही रहे हैं। इसी आन्दोलन से निकले सुशील कुमार मोदी की सत्तर के दशक में पटना के जलजमाव पर अनशन की तस्वीरें नजर आती हैं। अब वो उप मुख्यमंत्री हैं और पटना के जलजमाव से पिछले ही वर्ष की तरह इस वर्ष भी उनका आवास डूबा रहा।

भारतीय पौराणिक कथाओं में एक समुद्र मंथन का जिक्र मिलता है। सुर-असुर दोनों ने मिलकर जो समुद्र मंथन किया था, उसमें कई निधियों के साथ हलाहल विष भी निकला था। अगर बिहार की राजनीति में ‘सम्पूर्ण क्रांति’ को समुद्र मंथन माना जाए तो उससे निकले नेता ‘हलाहल’ ही लगते हैं। बाकी सवाल ये है कि अगर सम्पूर्ण क्रांति से निकल हलाहल हम बिहारियों के हिस्से आया, तो फिर सारी निधियाँ कहाँ गईं?

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