प्राइम टाइम एनालिसिस: रवीश कुमार कल को सड़क पर आपको दाँत काट लें, तो आश्चर्य मत कीजिएगा

रवीश जी, अब बीमार हो चुके हैं। एक दर्शक होने के नाते, एक बिहारी होने के नाते, एक पत्रकार होने के नाते मुझे अब चिंता होने लगी है। कल को रवीश जी सड़क पर आपसे मिलें, तथा आप से पूछ लें कि क्या आप मोदी के कामों से संतुष्ट हैं, और आपका जवाब 'हाँ' में हो तो वो आपकी बाँह पर दाँत भी काट लेंगे तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा। अब यही करना बाकी रह गया है।

रवीश कुमार पत्रकारिता के स्वघोषित मानदंड, स्तम्भ और एकमात्र सर्टिफाइंग अथॉरिटी हैं, ऐसा तो हम सब जानते ही हैं। वो अपने प्राइम टाइम के ज़रिए कभी-कभी सही मुद्दों पर बात करने के अलावा माइम आर्टिस्टों से लेकर आपातकाल तक बुला चुके हैं। उनके प्राइम टाइम पर उनको बहुत गर्व है, जो कि कालांतर में अवसादजनित घमंड में बदल चुका है। उन्हें ऐसा महसूस होता है, जिसे वो अभिव्यक्त करने में पीछे नहीं रहते, कि वो जिस चीज को मुद्दा मानेंगे वही मुद्दा है, वो जिस बात को सही सवाल मानेंगे वही सही सवाल होगा, वो जिस इंटरव्यू को सही ठहराएँगे वही सही साक्षात्कार कहा जाएगा।

जैसा कि रवीश के अलावा सबको पता है कि आज कल प्रधानमंत्री मोदी कई चैनलों को इंटरव्यू दे रहे हैं, ये बात और है कि इसमें रवीश के चैनल का नंबर नहीं आया है। ये प्रधानमंत्री कम और प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी का इंटरव्यू ज़्यादा है, ये सर्वविदित है। ये मोदी की चुनावी कैम्पेनिंग का एक हिस्सा है, जिसके ज़रिए वो तय सवालों के जवाब देते हुए अपनी सरकार द्वारा किए गए कार्यों पर बात करते दिखते हैं। रवीश को वो सब नहीं दिखता। इस पर चर्चा आगे करेंगे।

हाल ही में मोदी जी ने अक्षय कुमार को एक ग़ैरराजनीतिक इंटरव्यू दिया जिसमें उनके निजी जीवन से जुड़ी बातों पर सवालात थे जैसे कि वो क्या खाते हैं, क्या पहनते हैं, कहाँ जाते हैं, क्या पसंद है, किससे कैसी बातचीत है आदि। इंटरव्यू की शैली बहुत लाइट थी, और ये सभी को पता था। इसे ग़ैरराजनीतिक कहने का उद्देश्य यह भी था कि पीएम की रैलियों से लेकर हाल के सारे इंटरव्यूज़ में, सारी बातें राजनीति को लेकर ही हो रही थीं।

- विज्ञापन - - लेख आगे पढ़ें -

इस इंटरव्यू के बाद रवीश कुमार इसकी एनालिसिस लेकर आए और पहले फ़्रेम से उनके चेहरे के भाव बता रहे थे कि जब आपका पूरा जीवन पत्रकारिता को समर्पित रहा हो, और आपको आपके भक्त सबसे बड़ा पत्रकार मानते हों, आपके सामने पैदा हुए चैनलों और उनके एंकरों को पीएम इंटरव्यू दे दे, लेकिन आपको प्रधानमंत्री के नाम खुली चिट्ठियाँ ही लिखने को मिले तो आदमी को फ़ील होता है। आदमी को फ़ील ही नहीं होता, बहुत डीपली फ़ील होता है। रवीश का चेहरा बता रहा था कि वो किस मानसिक हालत से गुजर रहे हैं। मेरी निजी सहानुभूति उनके साथ हमेशा रहेगी।

धीमी आवाज के साथ रवीश ने बोलना शुरू किया और अक्षय कुमार बनने के चक्कर में खुद ही रवीश कुमार की बेकार पैरोडी बन कर रह गए। रवीश ने ग़ैरराजनीतिक इंटरव्यू का मजाक बनाने की कोशिश की और मजाक कौन बना, वो उनके इंटरव्यू के इस शुरुआती क्लिप को देखकर पता लग जाता है।

साभार: NDTV

इस बात का उपहास करने की कोशिश में रवीश ने यह कहा कि चुनावों के बीच में कोई अपोलिटिकल इंटरव्यू कैसे कर रहा है। रवीश कुमार की समस्या छोटी-सी ही है, और बस उसी के कारण रवीश अपनी फ़ज़ीहत तो कराते ही हैं, बल्कि जो भी सेंसिबल आदमी पहले देखा करता था, अब उनसे दूर भागने लगा है। वह समस्या है रवीश द्वारा खुद को ही पूरी दुनिया समझ लेना, या महाभारत सीरियल वाला ‘मैं समय हूँ’ मान लेना।

रवीश जी, आप समय नहीं हैं। समय से आपका रिश्ता यही है कि आपके मालिक के साथ-साथ आपका भी समय खराब चल रहा है। आपने अगर टाइम्स नाउ, रिपब्लिक, न्यूज 18, एबीपी आदि को देखा होता तो आपको पता होता कि आज कल हर सप्ताह मोदी का एक इंटरव्यू आ रहा है। इन सारे साक्षात्कारों में मोदी से वो तमाम सवाल पूछे गए जो रवीश हर रोज पूछते हैं: नोटबंदी, जीएसटी, बेरोज़गारी, अर्थव्यवस्था, विकास आदि। सब पर मोदी ने लगातार, हर इंटरव्यू में उत्तर दिए हैं।

लेकिन बात तो वही है कि रवीश को इंटरव्यू नहीं दिया, तो वो इंटरव्यू माना ही नहीं जाएगा। रवीश कुमार जो देखते हैं, जिस इंटरव्यू को देखते हैं, वही दिखना चाहिए वरना रवीश कुमार काला कोट पहन कर, काले बैकग्राउंड में मुरझाया हुआ चेहरा लेकर बेकार-से उतार-चढ़ाव के साथ, एक्टिंग करने की फूहड़ कोशिश में नौटंकी करेंगे और आपको देखना पड़ेगा। देखना ही नहीं पड़ेगा, अगर आप रवीश भक्त हैं तो इस छिछलेपन को भी डिफ़ेंड करना पड़ेगा कि ‘अरे देखा रवीश ने एकदम, छील कर रख दिया अक्षय कुमार को!’

रवीश कुमार ने जस्टिफिकेशन दिया कि उनके इस प्राइम टाइम का कारण यह है कि आज कल हर इंटरव्यू का पोस्टमॉर्टम होता है। मुझे नहीं लगता कि ऐसा होता है। हर इंटरव्यू का तो नहीं ही होता है, वरना रवीश के गुरु रहे राजदीप सरदेसाई ने सोनिया गाँधी के तलवे कैसे चाटे थे, उसकी एनालिसिस रवीश ने शायद काला पर्दा टाँग कर नहीं की।

रवीश अवसाद में तो हैं ही और उसका सबसे बड़ा कारण भी मोदी ही हैं। लेकिन उनकी निजी खुन्नस तो भाजपा के कई नेताओं से है। जैसे कि दिल्ली विधानसभा चुनावों के समय उन्होंने अरविंद केजरीवाल का भी इंटरव्यू लिया था, जो एक बार मुख्यमंत्री रह चुके थे, और किरण बेदी का भी, जिसमें उनकी निजी नापसंदगी छलक कर बाहर आ गई थी। बेचारे किरण बेदी को आज भी किसी तरह घुमा कर ले आए, साबित कुछ नहीं कर पाए सिवाय इसके कि किरण बेदी के नाम पर भी कॉमिक्स है।

रवीश जी, किरण बेदी जैसी शख्सियत को किताबों में बच्चों को पढ़ाने की ज़रूरत है। आप चाहे जितना मुलेठी वाले छिछोरेपन वाले सवाल ले आइए, किरण बेदी ने अपने क्षेत्र में जो उपलब्धि पाई है, उसके सामने आपकी पूरी पत्रकारिता पानी भरती रह जाएगी। मोदी के इंटरव्यू में किरण बेदी के मज़े लेना बताता है कि कुछ भीतर में कसक रह गई है कहीं।

रवीश बताते हैं कि लोग मिस कर जाते हैं कई बार कुछ सवाल। लेकिन रवीश मिस नहीं करते। रवीश सवालों को तो मिस नहीं करते पर मोदी जी को बहुत मिस करते हैं। रवीश मुहल्ले की गली का वो लौंडा है जो किसी लड़की के नाम से हाथ काट लेता है, और लड़की को पता भी नहीं होता कि उसका नाम क्या है। रवीश के ऐसे प्रोग्रामों को देख कर मैं बस इसी इंतज़ार में हूँ कि वो किस दिन कलाई का नस काट कर कहेंगे कि उन्हें कुछ होगा तो ज़िम्मेदार मोदी ही होगा।

चूँकि रवीश सिर्फ अपने चैनल पर, बस अपना ही शो देखते हैं इसलिए वो ये कह सकते हैं कि दूसरे चैनलों के एंकर मोदी से यही सब पूछते हैं कि कितना सोते हैं वो। इसी को कहते हैं धूर्तता। मोदी ने जिस-जिस को 2019 में इंटरव्यू दिया है, सबको एक घंटे से ज़्यादा का समय दिया है। सबने तमाम पोलिटिकल प्रश्न किए, लगभग हर मुद्दा कवर किया गया, और उन्हीं एक-एक घंटों में इंटरव्यू के मूड को लाइट करते हुए किसी एंकर ने यह भी पूछा कि वो सोते कितना हैं, थकते क्यों नहीं आदि।

ऐसा पूछना न तो गुनाह है, न ही पत्रकारिता के हिसाब से अनैतिक। साठ मिनट में अगर एक मिनट एक इस तरह का प्रश्न भी आए, तो इसमें से रवीश के लिए पूरे इंटरव्यू को परिभाषित करने वाला हिस्सा वही एक प्रश्न हो जाता है। यही कारण है कि रवीश कुमार अपने बेकार से प्राइम टाइम में, जिसे मुझे मजबूरी में देखना पड़ा, यह भी कह देते हैं कि इंटरव्यू बस उन्हीं के आ रहे हैं।

ये किस आधार पर बोला रवीश कुमार ने मुझे नहीं मालूम। उनको इस बात से भी समस्या है कि प्रधानमंत्री का इंटरव्यू कितने बड़े पन्ने में छपता है जैसे कि वो दसवीं में अव्वल आने वाले बच्चे का इंटरव्यू हो। अरे मेरे राजा! वो पीएम है, आपके शेखर कूप्ता जी भी तो पूरे पन्ने में वाक द टॉक कराते थे, वो भी प्रधानमंत्री से कम रुतबे वालों का।

अगर राहुल गाँधी इंटरव्यू दे ही नहीं रहे, जो कि एकदम गलत बात है क्योंकि उनके इंटरव्यू से भाजपा को हमेशा फायदा हुआ है, तो वो दिखेगा कहाँ! राहुल गाँधी रैली में तो राफेल के दाम दस बार, जी हाँ दस बार, अलग-अलग बता चुके हैं, फिर इंटरव्यू में क्या करेंगे सबको पता है। गुजरात की महिलाओं को मजा देने से लेकर अर्णब के साथ वाले इंटरव्यू में क्या हुआ था, वो सबको याद है। इसलिए, न तो वो दे रहे हैं, न उनका कोई इंटरव्यू ले रहा है।

रवीश की निष्पक्षता तब और खुलकर बाहर आ गई जब रवीश ने प्रियंका गाँधी की वो क्लिप दिखाई जिसमें वो कह रही हैं कि मोदी हमेशा विदेश में रहता है, बनारस के गाँव में कभी गया ही नहीं। ये बात प्रियंका गाँधी बोल रही हैं जिसका भाई अमेठी को अपने हाल पर छोड़ने के बाद वायनाड भाग चुका है। मतलब, रवीश कुमार को इस स्तर तक गिरना पड़ रहा है मोदी को घेरने के लिए? क्या रवीश कुमार नहीं जानते कि पीएम विदेश यात्रा पर फोटो खिंचाने नहीं जाता, उसके और औचित्य होते हैं?

बाकी एंकरों का मुझे पता नहीं पर रवीश कुमार की स्थिति बहुत खराब होती जा रही है। उनकी शक्ल और शब्दों के चुनाव से यह स्पष्ट हो चुका है कि रवीश जब ज़बरदस्ती का लिखते हैं तो बहुत ही वाहियात लिखते हैं। ये प्रोग्राम क्या था? क्या रवीश दोबारा अपने इस बेकार बीस मिनट को देख सकते हैं? मुझे तो नहीं लगता।

एक छोटा-सा भ्रम, एक छोटी-सी मानसिक समस्या आपको यह मानने पर मजबूर कर देती है कि जो आप कर रहे हैं, वही आदर्श है, वही होना चाहिए। जो आपके साथ नहीं है, जो आपके मतलब की बातें नहीं कहता, जो आपके द्वारा उठाए फर्जी सवाल नहीं पूछता वो अपने प्रोफ़ेशन के साथ गलत कर रहा है।

रवीश जी, अब बीमार हो चुके हैं। एक दर्शक होने के नाते, एक बिहारी होने के नाते, एक पत्रकार होने के नाते मुझे अब चिंता होने लगी है। चिंता तो हो रही है लेकिन मैं सिवाय लिखने के कुछ कर भी तो नहीं सकता, जैसे कि रवीश जी दूसरों को इंटरव्यू का उपहास करने के अलावा कुछ सकारात्मक नहीं कर पा रहे। कल को रवीश जी सड़क पर आपसे मिलें, तथा आप से पूछ लें कि क्या आप मोदी के कामों से संतुष्ट हैं, और आपका जवाब ‘हाँ’ में हो तो वो आपकी बाँह पर दाँत भी काट लेंगे तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा। अब यही करना बाकी रह गया है।

शेयर करें, मदद करें:
Support OpIndia by paying for content

यू-ट्यूब से

ये पढ़ना का भूलें

लिबरल गिरोह दोबारा सक्रिय, EVM पर लगातार फैला रहा है अफवाह, EC दे रही करारा जवाब

ज़्यादा पढ़ी गईं ख़बरें

ओपी राजभर

इतना सीधा नहीं है ओपी राजभर को हटाने के पीछे का गणित, समझें शाह के व्यूह की तिलिस्मी संरचना

ये कहानी है एक ऐसे नेता को अप्रासंगिक बना देने की, जिसके पीछे अमित शाह की रणनीति और योगी के कड़े तेवर थे। इस कहानी के तीन किरदार हैं, तीनों एक से बढ़ कर एक। जानिए कैसे भाजपा ने योजना बना कर, धीमे-धीमे अमल कर ओपी राजभर को निकाल बाहर किया।
राहुल गाँधी

सरकार तो मोदी की ही बनेगी… कॉन्ग्रेस ने ऑफिशली मान ली अपनी हार

कॉन्ग्रेस ने 23 तारीख को चुनाव नतीजे आने तक का भी इंतजार करना जरूरी नहीं समझा। समझे भी कैसे! देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कॉन्ग्रेस भी उमर अबदुल्ला के ट्वीट से सहमत होकर...
उपेंद्र कुशवाहा

‘सड़कों पर बहेगा खून अगर मनमुताबिक चुनाव परिणाम न आए, समर्थक हथियार उठाने को तैयार’

एग्जिट पोल को ‘गप’ करार देने से शुरू हुआ विपक्ष का स्तर अब खुलेआम हिंसा करने और खून बहाने तक आ गया है। उपेंद्र कुशवाहा ने मतदान परिणाम मनमुताबिक न होने पर सड़कों पर खून बहा देने की धमकी दी है। इस संभावित हिंसा का ठीकरा वे नीतीश और केंद्र की मोदी सरकार के सर भी फोड़ा है।
राशिद अल्वी

EVM को सही साबित करने के लिए 3 राज्यों में कॉन्ग्रेस के जीत की रची गई थी साजिश: राशिद अल्वी

"अगर चुनाव परिणाम एग्जिट पोल की तरह ही आते हैं, तो इसका मतलब पिछले साल तीन राज्यों के विधानसभा के चुनाव में कॉन्ग्रेस जहाँ-जहाँ जीती थी, वह एक साजिश थी। तीन राज्यों में कॉन्ग्रेस की जीत के साथ ये भरोसा दिलाने की कोशिश की गई कि ईवीएम सही है।"
पुण्य प्रसून वाजपेयी

20 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली पार्टी को 35+ सीटें: ‘क्रन्तिकारी’ पत्रकार का क्रन्तिकारी Exit Poll

ऐसी पार्टी, जो सिर्फ़ 20 सीटों पर ही चुनाव लड़ रही है, उसे वाजपेयी ने 35 सीटें दे दी है। ऐसा कैसे संभव है? क्या डीएमके द्वारा जीती गई एक सीट को दो या डेढ़ गिना जाएगा? 20 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली पार्टी 35 सीटें कैसे जीत सकती है?

यूट्यूब पर लोग KRK, दीपक कलाल और रवीश को ही देखते हैं और कारण बस एक ही है

रवीश अब अपने दर्शकों से लगभग ब्रेकअप को उतारू प्रेमिका की तरह ब्लॉक करने लगे हैं, वो कहने लगे हैं कि तुम्हारी ही सब गलती थी, तुमने मुझे TRP नहीं दी, तुमने मेरे एजेंडा को प्राथमिकता नहीं माना। जब मुझे तुम्हारी जरूरत थी, तब तुम देशभक्त हो गए।
स्वरा भास्कर

प्रचार के लिए ब्लाउज़ सिलवाई, 20 साड़ियाँ खरीदी, ताकि बड़े मुद्दों पर बात कर सकूँ: स्वरा भास्कर

स्वरा भास्कर ने स्वीकार करते हुए बताया कि उन्हें प्रचार के लिए बुलाया गया क्योंकि वो हीरोइन हैं और इस वजह से ही उन्हें एक इमेज बनाना आवश्यक था। इसी छवि को बनाने के लिए उन्होंने 20 साड़ियाँ खरीदीं और और कुछ जूलरी खरीदी ताकि ‘बड़े मुद्दों पर’ बात की जा सके।
राहुल गाँधी, बीबीसी

2019 नहीं, अब 2024 में ‘पकेंगे’ राहुल गाँधी: BBC ने अपने ‘लाडले’ की प्रोफाइल में किया बदलाव

इससे भी ज्यादा बीबीसी ने प्रियंका की तारीफ़ों के पुल बांधे हैं। प्रियंका ने आज तक अपनी लोकप्रियता साबित नहीं की है, एक भी चुनाव नहीं जीता है, अपनी देखरेख में पार्टी को भी एक भी चुनाव नहीं जितवाया है, फिर भी बीबीसी उन्हें चमत्कारिक और लोकप्रिय बताता है।
योगेन्द्र यादव

योगेंद्र यादव का दावा: अबकी बार 272 पार, आएगा तो मोदी ही

उन्होंने स्वीकार किया कि बालाकोट एयरस्ट्राइक का बाद स्थिति बदल गई है। आज की स्थिति में अब बीजेपी बढ़त की ओर आगे बढ़ गई है।
ट्रोल प्रोपेगंडाबाज़ ध्रुव राठी

ध्रुव राठी के धैर्य का बाँध टूटा, बोले राहुल गाँधी ने 1 ही झूठ किया रिपीट, हमारा प्रोपेगैंडा पड़ा हल्का

जिस प्रकार से राहुल गाँधी लगातार मोदी सरकार को घोटालों में घिरा हुआ साबित करने के लिए झूठे डाक्यूमेंट्स और बयानों का सहारा लेते रहे, शायद ध्रुव राठी उन्हीं से अपनी निराशा व्यक्त कर रहे थे। ऐसे समय में उन्हें अपने झुंड के साथ रहना चाहिए।

ताज़ा ख़बरें

हमसे जुड़ें

41,313फैंसलाइक करें
7,863फॉलोवर्सफॉलो करें
63,970सब्सक्राइबर्ससब्सक्राइब करें

ज़रूर पढ़ें

शेयर करें, मदद करें: