सेक्स ही सेक्स… भाई साहब आप देखते किधर हैं, दि प्रिंट का सेक्सी आर्टिकल इधर है

अलग एंगल तलाशता पत्रकार यहाँ पर यह सवाल भी पूछ सकता है कि क्या आप मोदी जी द्वारा बनवाए शौचालय में सेक्स करना पसंद करेंगी? क्या आप सौभाग्य योजना के नीले रंग की एलईडी लाइट सेक्स करना पसंद करेंगी? क्या आप उज्ज्वला वाले सिलिंडर पर चाय बनाने के बाद सेक्स करना पसंद करेंगे? क्या आप आवास योजना वाले छत पर सेक्स करना पसंद करेंगी?

2016 के उत्तरार्ध में महान दार्शनिक श्री दीपक कल्लाल जी महाराज ने अपने कॉलर बोन को सहलाते हुए कहा था, “सेक्स आधारित आर्टिकल नवांकुर न्यूज पोर्टलों की अंतिम शरणस्थली है।” ‘दि प्रिंट’ नामक पोर्टल ने पिछले दिनों ‘अलग एंगल’ तलाश करते हुए एक आर्टिकल शेयर किया जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में पूछने के लहजे में लिखा गया है कि ‘क्या ग्रामीण औरतों को लिए सेक्स सिंबल हैं नरेन्द्र मोदी?’

जब इस तरह के हेडलाइन में ही प्रश्नवाचक चिह्न हो तो पता चल जाता है कि लिखने वाले को या तो पता नहीं है कि वो कहना क्या चाहता है, या फिर यह कि इतना ज़्यादा पता है कि उस चिह्न का प्रयोग कैसे किया जाए। ऐसा नहीं है कि शीर्षक में प्रश्नवाचक चिह्नों का इस्तेमाल नहीं हो सकता, लेकिन आज कल विचारों को तथ्य की तरह दिखाने के लिए धूर्तता से इसका प्रयोग किया जाता है।

चुनावों के समय इस तरह के आर्टिकल लिखना एक अलग स्तर की पत्रकारिता है जहाँ लल्लनपॉट यूनिवर्सिटी से समाज शास्त्र में पीएचडी करने वाले लोग ही पहुँच पाते हैं। ख़बर यह भी आई है कि लल्लनपॉट के एडिटोरियल टीम के दर्ज़ी इंची-टेप लेकर हिटलर का लिंग नापने के बाद अब कुछ नया धमाका कर सकते हैं क्योंकि व्हाय एफिंग नॉट!

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ये बात मैं कई बार कह चुका हूँ कि बढ़ते कम्पटीशन के दौर में सर्वाइवल और नाम का भार ढोते इन पोर्टलों के पास नग्नता और वैचारिक नकारात्मकता के अलावा फर्जीवाड़ा और सेक्स ही बचता है जिसे हर तरह की जनता पढ़ती है। कुछ लोग इसलिए पढ़ते हैं कि उन्हें आनंद मिलता है, कुछ लोग इसलिए पढ़ते हैं कि वो सवाल कर सकें कि ये क्या लिखा गया है, और क्यों लिखा गया है।

शेखर गुप्ता से इस तरह की आशाएँ हम और आप कर सकते हैं क्योंकि देश में मिलिट्री कू यानी सैन्य तख्तापलट की फर्जी स्टोरी को मुख्य पृष्ठ पर छापने के बात इन्होंने गुप्ता उपनाम के साथ जो खिलवाड़ किया है, उसे यह समाज कभी माफ नहीं करेगा।

खैर, सीरियस बातें एक तरफ लेकिन इस सेक्सी स्टोरी से गुप्ता जी का प्रिंट आखिर समाज का कौन सा हित करना चाह रहा है, यह एक चिंतनीय प्रश्न है। नारीवाद का झंडा लेकर चलने वालों के लिए सेक्स शब्द एक उन्माद की तरह प्रभाव छोड़ता है। सारे वाद सेक्स में जाकर घुस जाते हैं, और उससे बनने वाले मुहावरे, उपवाक्य और वाक्यांश आपको उभरती हुई, लवचेरी नारीवादी की तरह स्थापित कर सकते हैं। ‘लवचेरी’ ठेठी का एक शब्द है, जिसका न तो लव से कोई लेना-देना है, न चेरी से। इसका मतलब ‘नया’ होने से है।

इस तरह के आर्टिकल के पीछे की रिसर्च क्या है? चार-पाँच फोटो जहाँ मोदी अनुष्का, कंगना या इवांका के साथ सहजता से खड़े हैं? तो क्या मोदी हलचल के अमरीश पुरी की तरह सर पर यह चिपका कर घूमता फिरे कि ‘औरत नर्क का द्वार है’? या फिर औरतों को देखते ही कहे कि मैं साइड में फोटो खिंचा लेता हूँ, फोटोशॉप से डाल देना? या फिर यह कि मोदी दोनों कंधे ऊँचे करके, दोनों आँखों से असहजता का भाव दिखाते हुए, साँस खींचे विक्षिप्तों की तरह ऐसे खड़ा हो जैसे बग़ल में औरतें नहीं, करंट मारने वाली ईलें झूल रही हों?

ग्रामीण औरतों के पास किस तरह के संसाधनों की उपलब्धता है, अगर पत्रकार ने जानने में सर खपाया होता तो पता चलता कि बिहार, यूपी, बंगाल, राजस्थान, ओडीशा जैसे राज्यों में ऐसे सैकड़ों गाँव हैं जहाँ आज भी रेडियो या अख़बार एक लग्ज़री है। जिसने मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर जाना हो, जिसकी पहली चिंता पेट भरने की हो, जिसकी पहली चिंता यह हो जिस साड़ी को बीच से फाड़कर, उसने पूरा शरीर ढक रखा है, उसके घिसकर फटने के बाद वह क्या पहनेगी, उसे शायद नरेन्द्र मोदी सेक्स सिंबल की तरह नहीं दिखेंगे।

जो लोग इस तरह की बेहूदी बातें लिखकर हिट होना चाहते हैं, वो वैसे खोखले लोग हैं जिन्होंने न तो सेक्स को समझा, न सिंबल को, ग्रामीण और औरत को तो खैर रहने ही दीजिए। जीने की जद्दोजहद, और परिवार पालने से फ़ुरसत न पा सकने वाली महिलाओं का जीवन, देहरी से द्वार, और खेत से चूल्हे तक में सिमट जाता है, उसके जीवन में सेक्स सिंबल के होने या न होने से कोई प्रभाव नहीं डाल सकता।

छद्म नारीवादी मुझे इस बात पर घेर सकते हैं कि मैं क्या जानूँ ग्रामीण औरतों की यौन आकांक्षाओं, यानी सेक्सुअल डिज़ायर्स, के बारे में, तो मेरा जवाब भी वही है कि तुम क्या जानो कि छत, भोजन, पानी, कपड़ा, बच्चों की शिक्षा के लिए दशकों से बाट जोहती उन औरतों के लिए सेक्स की प्राथमिकता कहाँ है। तुम्हारी हर गीता, सुनीता, राधा और सलमा पर मैं दस माला, निदा, मीनाक्षी, वर्षा, बहार ला सकता हूँ। सिर्फ नाम जुटा लेने से लेख की व्यापकता और सार्थकता सिद्ध नहीं हो जाती, न ही अंत में ‘हमने मनोविश्लेषक से बात की’ कहना।

कल को कई यह लिख दे कि क्या फलाना गाँधी हैं टिकटॉक पर रोने वाले लौंडों के क्रश? क्या शेखर गुप्ता इस आर्टिकल को जगह देंगे? क्या शेखर गुप्ता इस बेहूदगी को छापेंगे जबकि लिखने वाला वैसे लड़कों के बाइट और वीडियो भी एम्बेड कर दे? मुझे नहीं लगता कि वॉक द टॉक वाले गुप्ता जी इस टॉक को वॉक कर पाएँगे।

अगर वो ऐसा करने को तैयार हैं, तो लानत है उन पर और उनकी पत्रकारिता पर कि ऐसी बेहूदगी को उनके नाक के नीचे बैठा एडिटर चार सेकेंड से ज्यादा डिस्कस भी कैसे कर सकता है। नरेन्द्र मोदी सेक्स सिंबल हैं कि नहीं, यही चर्चा करना बाकी रह गया है?

कौन सेक्स सिंबल है कौन नहीं, इसकी कोई तय परिभाषा नहीं है। शेखर गुप्ता भी सेक्स सिंबल हो सकते हैं, और मैं भी, लेकिन वो हमारा काम नहीं है। हम पत्रकार हैं, मोदी नेता हैं, रितिक रौशन ग्लैमर की दुनिया से हैं। जिनका करियर यह साबित करने में लगा हो कि उनका आकर्षक होना ही उनके व्यवस्था को चलाता है, तो उस व्यक्ति के बारे में यह लिखना उचित है कि क्या रितिक रौशन कॉलेज की लड़कियों के लिए सेक्स सिंबल हैं?

लेकिन, जिस व्यक्ति का पूरा जीवन राजनीति में बीता हो, जिस पर तमाम तरह के लांछन लगाने के बाद भी कुछ साबित न हुआ हो, उस व्यक्ति पर अब इसी तरह के नकारे विचार लिखे जाएँगे जिसे अंग्रेज़ी में ट्रिवियलाइज करना कहते हैं। शेखर गुप्ता ने दसियों चुनाव कवर किए होंगे, कुछ सौ नेताओं के इंटरव्यू लिए होंगे, कुछ सौ बड़े नेताओं से निजी बातचीत की होगी, लेकिन आज उनका वेंचर क्या इस स्तर का हो गया है कि उन्हें नरेन्द्र मोदी और सेक्स शब्द को एक लाइन में लिखवाने के बाद, अपने हैंडल से शेयर करना पड़ रहा है?

संदर्भ और समय देखकर पत्रकारिता में आर्टिकल बेचे जाते हैं। बेचे ही जाते हैं, क्योंकि इस तरह के हेडलाइन या आर्टिकल का और कोई औचित्य नहीं कि ये जहाँ हैं, वहाँ क्यों हैं। अगर चुनावों का समय है तो पत्रकारों को कहा जाता है कि वो चुनाव से जुड़ी बातें, इतिहास, आँकड़े, बयान, रैलियाँ, विचार, ग्राउंड रिपोर्ट आदि पर ध्यान दें। और गुप्ता जी के लौंडे का ध्यान कहाँ है? गुप्ता जी के लौंडे का ध्यान इस बात पर है कि उनकी सहकर्मी मोदी के सेक्स सिंबल होने की अवधारणा को जस्टिफाय करने की कोशिश कर रही है, और गुप्ता जी के लौंडे उनको शेयर कर रहे हैं ताकि दो-चार सौ लोग रीट्वीट करें और मज़े लें।

इस आर्टिकल का क्या मतलब है? इससे समाज को क्या सूचना मिल रही है? इससे क्या भला या बुरा हो रहा है समाज का जो कि इस आर्टिकल की ज़रूरत पड़ गई? खलिहर एडिटर के दिमाग की वाहियात उपज से पैदा होते हैं ऐसे आर्टिकल जिसे सिर्फ इसलिए छापा जाता है क्योंकि फ़्री इंटरनेट पर जगह की कमी नहीं है।

जिनको लग रहा हो कि मैं नैतिकता का झंडा उठा रहा हूँ तो वो यह जान लें कि बात नैतिकता की तो है ही, बात पत्रकारिता में सन्निहित ज़िम्मेदारी की भी है। इस लेख का न तो कोई मतलब है, न जरूरत है, न डिफ़ेंड किया जाना चाहिए। पत्रकार आज वैचारिक दरवाज़े पकड़ कर झूल रहे हैं। मैं कहता हूँ कि मेरी विचारधारा क्या है, अधिकतर लोगों को स्वीकारने में डर लगता है जबकि पूरी दुनिया को पता है कि वो किस राह पर हैं।

आर्टिकल पढ़ने पर पता चलता है कि ‘दि प्रिंट’ की पत्रकार ने मनोविश्लेषक की बाइट भी डाल दी है ताकि लगे कि कुछ सीरियस बात भी हुई है भीतर में। ये एक तरीक़ा होता है फर्जीवाड़े को ऑथेन्टिक बताने का, पूरे आर्टिकल में पितृसत्ता से लेकर शादी और सेक्स को लगभग एक बताते हुए, मोदी से शादी के बारे में क्या ख़्याल है यह पूछा गया।

जैसे कि बाकी सारे प्रश्न खत्म हो गए हों जिसने ग्रामीण महिलाओं के जीवन पर प्रत्यक्ष प्रभाव डाले हैं। ऐसी हर महिला के पास, जो एक गृहणी है, मोदी के लिए अच्छी और बुरी बातें हो सकती हैं कहने को जिनका सामाजिक सरोकार है, राजनीतिक औचित्य है। उन खबरों में कई खबरें हो सकती हैं कि क्या उन्हें उज्ज्वला योजना का लाभ मिला, क्या उनके घर में शौचालय है, क्या सौभाग्य योजना का एलईडी वहाँ तक पहुँचा, क्या उनकी बच्चियों को पढ़ाई में सरकारी मदद मिल रही है, क्या उनके बजट पर प्रभाव पड़ा है, क्या उनके सर पर छत आई है, क्या वो सड़क से बाज़ार जा सकती हैं…

अलग एंगल तलाशता पत्रकार यहाँ पर यह सवाल भी पूछ सकता है कि क्या आप मोदी जी द्वारा बनवाए शौचालय में सेक्स करना पसंद करेंगी? क्या आप सौभाग्य योजना के नीले रंग की एलईडी लाइट में सेक्स करना पसंद करेंगी? क्या आप उज्ज्वला वाले सिलिंडर पर चाय बनाने के बाद सेक्स करना पसंद करेंगे? क्या आप आवास योजना वाले छत पर सेक्स करना पसंद करेंगी?

इस पर भी एक आर्टिकल बन जाएगा कि ‘मोदी की योजनाओं में सेक्स अपील और ग्रामीण औरतें’। ये एक आइडिया दे रहा हूँ, बाकी गुप्ता जी के लौंडे के ऊपर है कि इस पर दिल्ली के बग़ल के गाँवों को ही ग्रामीण समझ कर रिपोर्टिंग करा लें। और अंत में, दि प्रिंट के मनोविश्लेषक तो हैं ही जो बताएँगे कि ‘देखिए मोदी ने सिलिंडर दिया, बिजली दी, शौचालय दिया, तो महिलाओं से वो भावनात्मक स्तर तक जुड़ गए हैं। यही भावनाएँ थोड़ी उग्र हो जाएँ तो… अब मैं आगे क्या बोलूँ… हें हें हें…’।

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