क्विंट वालों ने टिक-टॉक विडियो से रॉकेट साइंस लगाकर ‘डेन्जरस हिन्दुत्व प्रोपेगेंडा’ कुछ यूँ निकाला

वो एक्सट्रीम पोलिटिकल विचार क्या हैं? विडियो क्लिप पर आए 132 कमेंट में से एक कमेंट, “टिकटॉक मनोरंजन के लिए है फिर भी मंदिर वहीं बनाएँगे।” ये कमेंट सबसे अधिक ख़तरनाक और समाज को बाँटने बाला रहा होगा क्योंकि पत्रकार ने इसे इतनी अहमियत दी। आप पढ़ लीजिए, और सोचिए कि इसमें ‘डेंजर’ या ‘एक्सट्रीम’ कहाँ है?

सोशल मीडिया के आने से पत्रकारिता को बहुत सारे लाभ हुए हैं। लेकिन हाँ, इसका एक बुरा असर यह भी पड़ा कि लोग इन्स्टाग्राम और ट्वीट उठाकर, उसे आर्टिकल बनाकर मेनस्ट्रीम मीडिया में रख देते हैं। इसका एक ही तरीक़ा है, जो ज़्यादातर एंटरटेनमेंट बीट के पत्रकार अपनाते हैं: किसी भी सेलिब्रिटी का इन्स्टाग्राम/ट्विटर पोस्ट लीजिए, उसमें जो लिखा है उसको पहले ‘इनडायरेक्ट स्पीच’ में लिखिए, फिर उसे डायरेक्ट स्पीच में लिखिए और अंत में पोस्ट को एम्बेड कीजिए। बन गया आर्टिकल। 

लगता है ‘द क्विंट’ के पत्रकार ऐसा करने में विश्वास नहीं रखते क्योंकि ‘ईमानदार सरकार’! चुनाव आने वाले हैं, लेकिन किसी सीट की लड़ाई में न तो जुनैद मारा जा रहा है जिसे बीफ से जोड़ा जा सके, न ही ब्राह्मिनिकल पेट्रियार्की टाइप कुछ कांड सामने आ रहा, राम मंदिर पर सिर्फ सुप्रीम कोर्ट तारीख़ दे रहा है, मोदी अपनी रैलियों में हर दिन विकास के प्रोजेक्ट्स के नाम और प्रोग्रेस गिना रहा है, तो ऐसे में वामपंथियों और पत्रकारिता के समुदाय विशेष में उनके कम्यूनल अजेंडे को हवा देने वाले लेखों का अकाल पड़ गया है।

ये जो गिरोह है पत्रकारिता के समुदाय विशेष का, असली मायनों में सबसे घटिया स्तर की जातिवादी बातें, सबसे नीच स्तर की साम्प्रदायिक बातें यही करता है। वरना, जब कुछ वैसा घटित न हो रहा हो, तब किसी एप्प से चार पोस्ट और चार हैशटैग पर क्लिक करके, उनसे डेंजरस, पोलराइजिंग, एक्सट्रीम हिन्दुत्व अजेंडा निकाल लेना, इनकी ज़िम्मेदारी है, जिसे क्विंट की इस पत्रकार ने बख़ूबी निभाया है। 

- विज्ञापन - - लेख आगे पढ़ें -

आर्टिकल की शुरुआत ही इतने कमज़ोर तरीके से हुई है मानो लॉजिक को लूज़ मोशन्स हो रखे हों! फोटो के कैप्शन से ही ‘क्विंट’ ने ‘टिक-टॉक’ के बारे में जो बात कही है, विडम्बनावश, वो क्विंट और उनके पाठकों पर सटीक बैठती है: “टिक टॉक पर यूज़र्स को पता है कि उनको देखने-सुनने वाले भी उन्हीं की तरह हैं। यही कारण है कि एप्प पर पोलिटिकल विडियोज बिलकुल बेपर्दा (अनअबैश्ड) और क्रिएटिव हैं।” पहला पैराग्राफ़ किसी यूज़र के बारे में बताता है कि उसने भगवा वस्त्र धारण किए हुए हैं और कह रहा है, “क्यूँ जाना है अयोध्या, घर बैठिए और राम का नाम लीजिए।” इसके बाद किसी रिकॉर्ड किए हुए साउंड पर वो अपने होंठ हिला रहा है, “ये हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रश्न है और इससे हम कोई समझौता नहीं कर सकते।” 

इसमें प्रोपेगेंडा क्या है और किसी व्यक्ति का ‘अयोध्या’ को लेकर प्रेम ‘एक्सट्रेमिज्म’ कैसे है, यह मेरी समझ से बाहर है। क्या हमें संविधान इसकी अनुमति नहीं देता, या फिर भगवा वस्त्र पहनने भर से आदमी आतंकवादी हो जाता है? क्या अपने भगवान में आस्था, उनके मंदिर बनाने की बात पर अडिग रहना, उसे अपने स्वाभिमान से जोड़ना और एक पंद्रह सेकेंड का विडियो बनाना ‘हिन्दुत्व प्रोपेगेंडा’ है? और ऐसा साबित करने का लॉजिक (जो नीचे है) वो इतना कुत्सित और बेकार है कि कोई भी समझदार आदमी माथा पीट लेगा। 

आर्टिकल में लिखा है कि यूँ तो यहाँ पोलिटिकल विडियो बहुत हैं, जिसमें राहुल गाँधी के स्पीच आदि भी हैं, लेकिन इन सबको #RSS, #rammandir, #hindu and #bjp लोकप्रियता में पछाड़ देता है। यह कहते-कहते मोहतरमा वहाँ पहुँच जाती हैं जहाँ कॉमन सेन्स नहीं पहुँच सकती, “ये विडियोज़ खतरनाक तरीके से ध्रुवीकरण करने वाले प्रोपेगेंडा की तरफ चले जाते हैं।” 

फिर पत्रकार ने लिखा है कि कैसे मनोरंजन और अभिव्यक्ति का यह माध्यम ‘एक्सट्रीम पोलिटिकल विचारों’ का प्लेटफ़ॉर्म बनता जा रहा है। और वो एक्सट्रीम पोलिटिकल विचार क्या हैं? विडियो क्लिप पर आए 132 कमेंट में से एक @jitenkpatel नामक यूज़र का यह कमेंट, “टिकटॉक मनोरंजन के लिए है फिर भी मंदिर वहीं बनाएँगे।” ये कमेंट सबसे अधिक ख़तरनाक और समाज को बाँटने बाला रहा होगा क्योंकि पत्रकार ने इसे इतनी अहमियत दी। आप पढ़ लीजिए, और सोचिए कि इसमें ‘डेंजर’ या ‘एक्सट्रीम’ कहाँ है?

क्या राम मंदिर बोलने से, भगवा वस्त्र पहनने से, अयोध्या की बात करने से व्यक्ति हिन्दुत्व प्रोपेगेंडा करने लगता है? क्या हिन्दू धर्म को मानने वाले अपने देवता के लिए मंदिर निर्माण की बात, एक सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर करने भर से एक्सट्रेमिस्ट हो जाते हैं? फिर तो तिलक लगाकर घूमने वाले साधुओं को क्विंट मानव बम कह सकता है। (ऊप्स! मैंने तो इन्हें नया आइडिया दे दिया कि ‘कुम्भ में पहुँचे लाखों मानव बम, हिन्दुत्व पूरी मानवता के लिए ख़तरा’)

ये अपने आप में हास्यास्पद बात है कि #RSS हैशटैग पर 63 मिलियन व्यूज़ होना प्रोपेगेंडा है, ख़तरनाक है, समाज को तोड़नेवाला है, साम्प्रदायिक है, ध्रुवीकरण करने वाला है! आर्टिकल को लम्बा करने के लिए (क्योंकि एक भी सही तर्क नहीं है सिवाय चार हैशटैग और उससे जुड़े कमेंट पर एकतरफ़ा फ़ैसला सुनाने के) बीच-बीच में यह समझाया गया है कि ये एप्प है क्या, कैसे काम करता है, किस भाषा में है, यहाँ पर कैसे लोग हैं, वो कितने ‘सिली’ हैं, या ‘धरती हिला देने वाले टैलेंट’ लेकर नहीं आए हैं।  

ऐसे ही एक और विडियो का उदाहरण दिया गया है जिसमें कोई माया नायर नाम की यूज़र मलयालम में कहती हैं कि उन्हें RSS पसंद है, और उनकी पसंद में कोई बदलाव नहीं आने वाला। उसके बाद बताया गया कि उस विडियो पर 7.9 हजार लाइक्स और 906 कमेंट हैं। उसके बाद एक और विडियो का उदाहरण है जो RSS हैशटैग से जुड़ा है। इसमें RSS ‘नेशनल सॉन्ग’ (ये क्या है?) की बात करते हुए पत्रकार महोदया ने लिखा है कि यूज़र कहती है, “जीवन संघ के नाम, दिल संघ के नाम, और मैं बेटी संघ की हूँ।”  

इस उदाहरण का उद्देश्य समझ में नहीं आया सिवाय इसके कि भारत में ‘संघ’ की बात करना शायद जर्मनी में हिटलर के क्रॉस की तरह बैन है। लेकिन ऐसी बात तो बिलकुल नहीं है। संघ की शाखाएँ हैं, संघ के स्कूल हैं, संघ हर आपदा में आगे खड़े होकर मदद करता है, संघ में तमाम बड़ी शख़्सियतें जाती रहती हैं, वहाँ से जुड़े लोग देश के प्रमुख पदों पर बैठे हैं, और ऑक्सफोर्ड-हार्वर्ड वालों से बेहतर काम कर रहे हैं। फिर ‘संघ’ का नाम ले लेना ही ‘एक्सट्रेमिस्ट अजेंडा’ हो जाता है? पत्रकार को भारतीय इतिहास से लेकर अपने संविधान, कुछ कानूनी बातें और नागरिक के मौलिक अधिकारों पर क्रैश कोर्स कर लेना चाहिए ताकि वो ऐसी वाहियात बातें लिखकर चार फैशनेबल शब्दों की बात अंग्रेज़ी में करके लहरिया लूटने की नाकाम कोशिश न करे। 

और तो और, खुद ही टिक टॉक के विडियो की गुणवत्ता की बात करते हुए पत्रकार महोदया लिखती हैं कि ऐसा नहीं है कि कोई ग़ज़ब का टैलेंट है इधर, लोग तो अंग्रेज़ी बोलते ही नहीं, और उसमें गर्व भी महसूस करते हैं। मतलब, स्वयं ही इस प्लेटफ़ॉर्म पर जो हो रहा है उसका उपहास कर रही हैं, बताती हैं कि दो-तीन दोस्तों द्वारा घर के बरामदे में चादर की आड़ में ‘अदृश्य होते आदमी’ वाले जादू का प्रदर्शन कर रहे हैं, जो कि कोई धरती-धमक टैलेंट तो नहीं है लेकिन बताता है कि यहाँ किस तरह का कंटेंट है। 

मानवी जी, इस घटना को विरोधाभास कहते हैं। जब ये प्लेटफ़ॉर्म इस तरह की जोकरई और मूर्खतापूर्ण हरकतों से, सलमान और अजय देवगन के गीतों पर रोते हुए लड़कों को विडियो से भरा हुआ है, तो वहाँ आपको राम मंदिर को लेकर भी ‘ख़तरनाक राजनीति’ करने वाले, या ‘एक्सट्रीम हिन्दुत्व अजेंडा’ के नाम पर सबसे ख़तरनाक पोस्ट यही मिलेगा कि ‘मैं आरएसएस को पसंद करती हूँ’, या यह कि ‘मेरा जीवन संघ के लिए है।’

अगर वहाँ और ज़हरीले कमेंट होते तो मुझे पता है क्विंट निकाल लेता तथा एक बड़ा आर्टिकल लिख देता कि कैसे ये ‘ख़तरनाक हिन्दुत्व अजेंडा’ वाले लोग दो-तीन दिन में तलवार लेकर सड़कों पर निकल सकते हैं। लेकिन दुर्भाग्य कहिए, या सौभाग्य, कि ऐसा वास्तविक जीवन में नहीं होता। जिनको राम मंदिर चाहिए वो सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का इंतज़ार कर रहे हैं। जिस पार्टी को चाहिए, उसने भी कह दिया है कि वो सुप्रीम कोर्ट के हिसाब से चलेंगे। 

पूरे आर्टिकल में एक ऐसा उदाहरण नहीं है जिससे कि आर्टिकल का शीर्षक या अंत जस्टिफाय किया जा सके। इस पर अपने सात मिनट बर्बाद करने के बाद आपको यही पता चलेगा कि अगर आपने आर्टिकल लिखने से पहले, रिसर्च से पहले ही हायपोथिसिस को प्रूव करने का इरादा कर लिया हो, टैम्पलेट बना रखा हो, तो आपका कन्क्लूजन कुछ ऐसा ही होगा, “टिक-टॉक भारत के हज़ारों युवाओं की अभिव्यक्ति का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। अपने फ़ैन्स, अपनी बेपर्दा राजनैतिक अभिव्यक्ति, अपने आक्रामक हिन्दुत्व और वृहद् यूज़र बेस के लिए। क्या भारत इसकी उपेक्षा कर सकता है?”

मैंने आर्टिकल का लिंक भी दे दिया है, उसमें जो सबसे ख़तरनाक अजेंडा की बातें थी, वैसी बातें जो बेपर्दा राजनैतिक अभिव्यक्ति है, वैसे पोस्ट जो आक्रामक हिन्दुत्व का स्वरूप हैं, सब आपको हिन्दी में दे दिया है। डिसाइड कर लीजिए कि क्विंट में काम करने वालों को वैसे विशेषणों से विशेष प्रेम है जिसका मतलब वो नहीं जानते, या फिर ‘हिन्दुत्व’, ‘प्रोपेगेंडा’, ‘एक्स्ट्रेमिज्म’ लिखकर कुछ भी चला दिया जाएगा? इससे कहीं बेहतर तो इन्स्टाग्राम से दीपिका पदुकोन और रणवीर सिंह के लवी-डवी कमेंट पर पोस्ट बना दिया जाता! प्रोसेस तो मैंने बता ही दिया है! 

शेयर करें, मदद करें:
Support OpIndia by paying for content

यू-ट्यूब से

ये पढ़ना का भूलें

लिबरल गिरोह दोबारा सक्रिय, EVM पर लगातार फैला रहा है अफवाह, EC दे रही करारा जवाब

ज़्यादा पढ़ी गईं ख़बरें

उत्तर प्रदेश, ईवीएम

‘चौकीदार’ बने सपा-बसपा के कार्यकर्ता, टेंट लगा कर और दूरबीन लेकर कर रहे हैं रतजगा

इन्होंने सीसीटीवी भी लगा रखे हैं। एक अतिरिक्त टेंट में मॉनिटर स्क्रीन लगाया गया है, जिसमें सीसीटीवी फुटेज पर लगातार नज़र रखी जा रही है और हर आने-जाने वालों पर गौर किया जा रहा है। नाइट विजन टेक्नोलॉजी और दूरबीन का भी प्रयोग किया जा रहा है।
राजदीप सरदेसाई

राजदीप भी पलट गए? विपक्ष के EVM दावे को फ़रेब कहा… एट टू राजदीप?

राजदीप ने यहाँ तक कहा कि मोदी के यहाँ से चुनाव लड़ने की वजह से वाराणसी की सीट VVIP संसदीय सीट में बदल चुकी है। जिसका असर वहाँ पर हो रहे परिवर्तन के रूप में देखा जा सकता है।
ओपी राजभर

इतना सीधा नहीं है ओपी राजभर को हटाने के पीछे का गणित, समझें शाह के व्यूह की तिलिस्मी संरचना

ये कहानी है एक ऐसे नेता को अप्रासंगिक बना देने की, जिसके पीछे अमित शाह की रणनीति और योगी के कड़े तेवर थे। इस कहानी के तीन किरदार हैं, तीनों एक से बढ़ कर एक। जानिए कैसे भाजपा ने योजना बना कर, धीमे-धीमे अमल कर ओपी राजभर को निकाल बाहर किया।
बरखा दत्त

बरखा दत्त का दु:ख : ‘मेनस्ट्रीम मीडिया अब चुनावों को प्रभावित नहीं कर पाएगा’

बरखा ने कॉन्ग्रेस की आलोचना करते हुए कहा कि अगर एक्जिट पोल के आँकड़ें सही साबित हुए, तो यह कॉन्ग्रेस पार्टी के 'अस्तित्व पर संकट' साबित हो सकता है।
क्या अभी भी 'अर्बन नक्सली' नहीं है आप?

चुनाव परिणामों को लेकर AAP नेता ने दी दंगों, गृह युद्ध की धमकी

भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी के भारी बहुमत के साथ सत्ता में वापसी के अनुमान के बाद से विपक्षी नेताओं में हिंसा की धमकी की बाढ़ सी आ गई है।

यूट्यूब पर लोग KRK, दीपक कलाल और रवीश को ही देखते हैं और कारण बस एक ही है

रवीश अब अपने दर्शकों से लगभग ब्रेकअप को उतारू प्रेमिका की तरह ब्लॉक करने लगे हैं, वो कहने लगे हैं कि तुम्हारी ही सब गलती थी, तुमने मुझे TRP नहीं दी, तुमने मेरे एजेंडा को प्राथमिकता नहीं माना। जब मुझे तुम्हारी जरूरत थी, तब तुम देशभक्त हो गए।
अशोक लवासा

अशोक लवासा: कॉन्ग्रेस घोटालों से पुराने सम्बन्ध, चुनाव आयोग के कमिश्नर हैं

ऑपइंडिया के पास शुंगलू कमिटी का वह रिपोर्ट है जिसमें अशोक लवासा की बेटी और बेटे के अनुचित लाभ उठाने की बात कही गई है। शुंगलू कमिटी ने ये साफ बताया है कि सिलेक्शन कमिटी ने अन्वी लवासा के प्रोजेक्ट ऑफिसर (PO) के रूप में चयन में उन्हें उनके पॉवरफुल संबंधों की वजह से फेवर किया गया।
आदित्यनाथ ने बदल दी है यूपी पुलिस की सूरत

UP पुलिस का खौफ: किडनैपर ने पुलिस को देखकर खुद को मार ली गोली

कभी सपा के जंगलराज में भागीदार के रूप में बदनाम रही यूपी की पुलिस ने अपराधियों में आज कैसा खौफ बैठा दिया है, इसकी एक बानगी अभी-अभी सामने आ रही है। उत्तर प्रदेश में एक बिजनेसमैन के बच्चे को अगवा करने वाले अपराधी ने उत्तर प्रदेश पुलिस...
संजय सिंह

AAP नेता संजय सिंह का अर्नब गोस्वामी पर फूटा ग़ुस्सा- पागलखाने जाएँ, जेल जाएँ या डूब मरें!

AAP के राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ नेता संजय सिंह ने रिपब्लिक टीवी के संपादक अर्नब गोस्वामी की एक वीडियो क्लिप ट्विटर पर शेयर की। इसमें अर्नब EVM हैकिंग को लेकर विपक्षी दलों पर तंज कसते नज़र आए। इसी वीडियो के जवाब में पागलखाने से लेकर डूब मरने तक की बात लिखी गई।
उपेंद्र कुशवाहा

‘सड़कों पर बहेगा खून अगर मनमुताबिक चुनाव परिणाम न आए, समर्थक हथियार उठाने को तैयार’

एग्जिट पोल को ‘गप’ करार देने से शुरू हुआ विपक्ष का स्तर अब खुलेआम हिंसा करने और खून बहाने तक आ गया है। उपेंद्र कुशवाहा ने मतदान परिणाम मनमुताबिक न होने पर सड़कों पर खून बहा देने की धमकी दी है। इस संभावित हिंसा का ठीकरा वे नीतीश और केंद्र की मोदी सरकार के सर भी फोड़ा है।

ताज़ा ख़बरें

हमसे जुड़ें

41,529फैंसलाइक करें
7,970फॉलोवर्सफॉलो करें
64,204सब्सक्राइबर्ससब्सक्राइब करें

ज़रूर पढ़ें

शेयर करें, मदद करें: