‘मोदी ने विज्ञापन रोका’ वाली फ़र्ज़ी खबर ‘सूत्रों के हवाले से’ फैला रहा है पत्रकारिता का समुदाय विशेष

इसके अलावा वायर/रॉयटर्स का यह भी दावा है कि इन तीनों समाचारपत्रों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (सीईओ) ने रॉयटर्स के इस बाबत ईमेल का जवाब नहीं दिया है। भला ऐसा वह क्यों करेंगे, जब तक कि खबर फ़र्ज़ी न हो? अगर उनका काम-धंधा सरकार के इस कदम से पहले से ही चौपट है, तो वह भला ईमेल का जवाब क्यों नहीं देंगे?

‘सूत्रों के हवाले से’ हमेशा से पत्रकारिता में विवादास्पद विषय रहा है- एक ओर कुछ लोग इसे ज़रूरी मानते हैं ताकि सरकारों और सार्वजनिक पद पर बैठे, टैक्स के पैसे का लाभ ले रहे अधिकारियों की जवाबदेही बनी रहे, और वह किसी भी जनहित की सूचना को आधिकारिक गोपनीयता के आवरण में न दबा लें, वहीं दूसरी ओर यही वाक्यांश पत्रकारों को किसी भी जवाबदेही, सबूत की अनिवार्यता की जिम्मेदारी से मुक्त कर देता है। इसीलिए पत्रकारों को यह सिखाया जाता है कि ‘सूत्रों के हवाले से’ रिपोर्टिंग कम-से-कम और विशेष परिस्थितियों में ही हो। खासकर कि राजनीतिक बीट पर इसके इस्तेमाल के लिए पत्रकारिता के और व्यक्तियों के खुद के कई सारे नैतिक ‘फ़िल्टर’ होते हैं।

लेकिन नैतिक मानदंडों से कभी कोई लेना-देना न पत्रकार से पत्तलकार बने सिद्धार्थ वरदराजन का रहा है, न उनके ‘द वायर’ का। रॉयटर्स की जिस खबर को वायर ने कॉपी-पेस्ट मारकर ऐसा दिखाने की कोशिश की कि मोदी सरकार विज्ञापन न देकर टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप, द हिन्दू और टेलीग्राफ़ का गला घोंटे दे रही है, वह न केवल तथ्यहीन और केवल ‘सूत्रों के हवाले से’ पर आधारित है, बल्कि अंदर की खबर खुद ही कई जगहों पर हेडलाइन का खंडन करती है। इसके अलावा यह ‘द वायर’ के पिछले प्रोपेगंडे कि टाइम्स ऑफ़ इंडिया मोदी सरकार का पिट्ठू है, के भी विपरीत दिशा में है।

किसने कहा? कब कहा? सबूत कहाँ है?

सबसे पहले तो यह खबर किस आधार पर है? केवल ‘गुप्त सूत्रों’ से बातचीत के आधार पर। ऐसे कैसे ‘गुप्त सूत्र’ हैं जो इतने बड़े तो हैं कि उन पर विश्वास कर लिया जाए, लेकिन वे न केवल खुद सामने नहीं आ सकते बल्कि कोई ऐसा दस्तावेज भी नहीं दे सकते जिससे उनकी बात सही होने का सबूत मिल जाए? विनीत जैन (टाइम्स ऑफ़ इंडिया), राजगोपाल (टेलिग्राफ) या एन राम (हिन्दू) सब अधिकारियों के whatsapp और फेसबुक चेक करते हैं क्या?

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इसके अलावा वायर/रॉयटर्स का यह भी दावा है कि इन तीनों समाचारपत्रों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (सीईओ) ने रॉयटर्स के इस बाबत ईमेल का जवाब नहीं दिया है। भला ऐसा वह क्यों करेंगे, जब तक कि खबर फ़र्ज़ी न हो? अगर उनका काम-धंधा सरकार के इस कदम से पहले से ही चौपट है, तो वह भला ईमेल का जवाब क्यों नहीं देंगे? कायदे से तो उन्हें ईमेल का जवाब देकर अपना मुद्दा उठा रहे अन्य क्रांतिकारी पत्रकारों की सहायता करनी चाहिए।

15% का क्या चक्कर है?

खबर की हैडलाइन के मुताबिक तो मोदी सरकार ने तीनों अख़बारों में विज्ञापन एकदम रोक दिए हैं। पढ़कर कोई भी विवेकशील इंसान नाराज हो जाए। यही बात खबर के पहले वाक्य में भी कही गई है। लेकिन और अंदर जाकर पता चलता है कि नहीं, नहीं, बंद केवल पूरी तरह टाइम्स ऑफ़ इंडिया का विज्ञापन हुआ है, बाकी टेलीग्राफ़ और द हिन्दू का केवल कम हुआ है।

उसमें भी ‘दिलचस्प’ बात यह है कि जहाँ टाइम्स ग्रुप की कुल विज्ञापन आय का 15% केंद्र के सरकारी विज्ञापन से है (जो कि कथित तौर पर बंद हो गई है), वहीं टेलीग्राफ़ ने इसी आँकड़े (15%) बराबर कमी केंद्र सरकार से मिलने वाले विज्ञापन में दर्ज की है। यह एक संयोग है, या पूरा आँकड़ा फ़र्ज़ी है, और एक ही संख्या को बार-बार दिखाकर ‘इम्पैक्ट’ बनाने की कोशिश हो रही है? द हिन्दू का तो कोई आँकड़ा भी नहीं है कि बंद हुआ है विज्ञापन, या फिर केवल कमी हुई है। बस एक दावा है- मोदी सरकार हमारे राफेल ‘कवरेज’ (जिसे ऑपइंडिया ने महज़ फोटोशॉप साबित किया था) से नाराज़ होकर विज्ञापन रोक दिए हैं।

कोबरापोस्ट भूल गए?

रॉयटर्स ने यह लेख लिखा तो लिखा, लेकिन इसे चेपने से पहले वायर वालों को अपनी आर्काइव तो देख लेनी चाहिए थी। अभी खाली साल भर पहले कोबरापोस्ट के एक तथाकथित ‘स्टिंग’ के भरोसे वायर वालों ने टाइम्स ग्रुप को मोदी का ‘पिट्ठू’ घोषित कर दिया था। और अब उसी टाइम्स ग्रुप, जो आपकी खबर के हिसाब से मोदी की जेब में था, का मोदी ने ‘जेब खर्च’ रोक दिया? ऐसे तो अभी तक खुद मोदी को अम्बानी की जेब में बताने के बाद क्या कल वायर यह भी छाप देगा कि अंबानी ने मोदी को “10 लाख का सूट” पहनने के लिए भी पैसा देना बंद कर दिया है? कम-से-कम प्रोपेगंडे में तो निरंतरता बनाए रखते!

पत्रकारिता के समुदाय विशेष, और उसमें भी खास कर कि वायर वालों, को यह समझने में और कितना समय लगेगा कि जनता उनके ‘हिट जॉब’ को पत्रकारिता और नहीं मानेगी? प्रोपेगेंडा-पर-प्रोपेगेंडा फैलाते रहना, बार-बार पकड़े जाते रहना, शर्मिंदा होना- अगर यही बिज़नेस मॉडल है तो बात दूसरी है, वरना वायर वालों को बाज आ जाना चाहिए।

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