Wednesday, September 22, 2021
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‘सेकुलर’ प्रोपेगेंडा को ‘राष्ट्रवादी’ कार्टूनों से ध्वस्त करता नवयुवक; हिन्दुओं के नरसंहार ने बनाया आर्टिस्ट

"पिछली सरकारों ने देश में इस तरह का माहौल तैयार किया कि हम वास्तविकता से बहुत दूर हो गए। आज अगर कोई सच बोलता है या उसके लिए आवाज उठाता है, तो हेट-स्पीच का नाम दे दिया जाता है और ऐसे मुद्दों पर टिप्पणी करने वाले को इतना परेशान किया जाता है कि वह खुद ही कुछ समय में चुप हो जाता है।"

वैसे तो सोशल मीडिया पर पसरी वामपंथी विचारधारा से लड़ पाना वाकई एक बेहद कठिन काम है। लेकिन, फिर भी पिछले दिनों सोशल मीडिया पर कई ऐसे लोग उभर कर सामने आए हैं, जिन्होंने इस बने-बनाए इकोसिस्टम को ध्वस्त करने के लिए अपनी रचनात्मकता का प्रयोग किया और वामपंथियों-लिबरलों के हर प्रोपगेंडे की बखिया उधेड़ते रहे। 

इंस्टाग्राम पर official_artkraftervishy के नाम से एक्टिव एक कार्टूनिस्ट हमारी इस बात का सबसे अच्छा उदाहरण हैं। ये कार्टूनिस्ट लगातार ऐसे मुद्दों व शख्सियतों के लिए अपने हुनर का प्रदर्शन कर रहे हैं, जिनपर वर्तमान में अधिकांश लोगों का ध्यान नहीं गया है। बात चाहे वीर सावरकर की हो, छत्रपति शिवाजी की हो, आदिगुरु शंकराचार्य की हो या फिर संसद का कॉन्सेप्ट देने वाले कायाकवे कैलासा की। 

इस अकॉउंट पर आपको उस हर शख्स की झलक देखने को मिलेगी, जिन्होंने सनातन के पताका को कभी झुकने नहीं दिया। इन सबके अलावा इस अकॉउंट पर आपको कुछ ऐसे मुद्दों पर बने कार्टून भी मिलेंगे जो लिबरलों की विचारधारा के उलट आपको सच्चाई से रूबरू करवाएँगे। साथ ही ये भी बताएँगे कि आखिर किस तरीके से आम आदमी को वामपंथ का इंजेक्शन प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से दिया जाता है, ताकि उसका ध्यान पूरे मुद्दे से भटक जाए और वह असल समस्या पर बात करना ही छोड़ दे।

official_artkraftervishy की ऑपइंडिया से बात

आज जब हमारी नजर इस अकॉउंट पर पड़ी, तो हमने इस कार्टूनिस्ट से संपर्क किया। हालाँकि, बातचीत के दौरान सुरक्षा के लिहाज से उन्होंने अपना असली नाम हमसे साझा नहीं किया। उन्होंने बताया कि वह एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते हैं और अपनी नौकरी के काम से समय निकाल कर लोगों को जागरूक करने के लिए ये कार्टून या डिजिटल आर्ट बनाते हैं। ऐसे में असली नाम बताना उनके लिए खतरनाक हो सकता है। इसलिए उन्होंने अपने असली नाम की जगह हमें अपनी पहचान ‘विशाल’ के तौर पर करने को कही।

सरलता व सहजता से अपने काम की जानकारी देने वाले विशाल ने ऑपइंडिया से बातचीत में बताया कि स्कूल और कॉलेज तक उन्हें ड्राइंग केवल एक हॉबी के रूप में पसंद थी। मगर, जैसे-जैसे समय बीता। उन्होंने सोशल मीडिया पर वामपंथियों की पकड़ को महसूस किया और उन्हें ये बात कचोटने लगी कि आखिर कोई भी हिंदुओं के लिए या हिंदू धर्म पर बोलने के लिए क्यों तैयार नहीं है?

इसके बाद उन्होंने खुद को इस काम के लिए तैयार किया। उन्होंने बताया कि वैसे तो कार्टून्स पर काम करना पिछले साल अक्टूबर में ही शुरू कर दिया था। मगर, उनके इरादे इस दिशा में तब और मजबूत हुए, जब 19 जनवरी को उन्होंने कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अत्याचार पर 30 साल बीत जाने पर भी लोगों को चुप देखा। 

उसी क्षण, उन्होंने निश्चय किया कि अब वह अपनी कला के जरिए लोगों को इन सभी मुद्दों पर जागरूक करेंगे। उन्होंने सोशल मीडिया पर अकॉउंट बनाए, ईएमआई पर एक आईपैड खरीदा और आगे अपनी प्रैक्टिस शुरू की।

इस पूरे अंतराल में उनके मन को सिर्फ़ एक बात परेशान करती रही कि राष्ट्र के नाम पर आखिर क्यों सही दिशा में कोई आवाज नहीं उठाता?

धीरे-धीरे विशाल ने अपने आपको तैयार किया और ऐसे कार्टून बनाए जो देखने में कार्टून कम और इलस्ट्रेशन ज्यादा थे। उन्होंने ऐसे मुद्दों को उठाया। जो सनातन धर्म से संबंधी थे और हमारे भारत के इतिहास को दर्शाते थे।

उन्होंने बताया कि इस मुहिम को चलाते हुए उन्हें कई लोगों ने धमकियाँ दीं। उन्हें कई बार ऐसे मैसेज आए, जिसमें उनसे सवाल किया गया कि आखिर वो नफरत क्यों फैलाते हैं? जिसपर वह उन्हें बस यही जवाब देते रहे कि वो नफरत नहीं फैलाते, बस लोगों को सच्चाई से रूबरू करवाते हैं।

वे कहते हैं, “पिछली सरकारों ने देश में इस तरह का माहौल तैयार किया कि हम वास्तविकता से बहुत दूर हो गए। आज अगर कोई सच बोलता है या उसके लिए आवाज उठाता है, तो हेट-स्पीच का नाम दे दिया जाता है और ऐसे मुद्दों पर टिप्पणी करने वाले को इतना परेशान किया जाता है कि वह खुद ही कुछ समय में चुप हो जाता है।”

अपने साथ हुए हालिया वाकए की चर्चा करते हुए विशाल बताते हैं, “कुछ समय पहले हावड़ा में जब प्रदर्शनकारियों ने RPF का कॉलर पकड़ लिया था, तो मैंने गृहयुद्ध जैसी उस स्थिति दर्शाने के लिए एक कार्टून बनाया। मगर, मुंबई के एक वकील को वो पसंद नहीं आया और उन्होंने मेरे अकाउंट की शिकायत पुलिस आयुक्त से कर दी।”

विशाल के अनुसार इस घटना के बाद और पहले भी उनके कार्टूनों पर ऐसी अनेकों शिकायतों का सिलसिला चलता रहा। लेकिन फिर भी वो अपने उद्देश्य से भटके नहीं है। वे कहते हैं, “कई शिकायतों के बावजूद मैं अपना काम कर रहा हूँ और हमेशा करता रहूँगा।” 

बता दें, इन कार्टूनों के कारण कुछ समय पहले सोशल मीडिया पर उनके ख़िलाफ़ मास रिपोर्टिंग भी हुई थी, जिसके कारण उनका ट्विटर अकाउंट भी सस्पेंड कर दिया गया। अभी फिलहाल वह फेसबुक और इंस्टा पर एक्टिव हैं।

विशाल मानते हैं कि जब भी कोई दक्षिणपंथी विचारधारा का व्यक्ति अपनी आवाज उठाता है तो उसे इस तरह की परेशानियों का सामना करना ही पड़ता है।

विशाल के कुछ कार्टून और उनकी राय

1.केरल में हथिनी की मौत- 

हाल में केरल में गर्भवती हथिनी के साथ हुई अमानवीयता के मद्देनजर कई लोगों ने अपनी सहानुभूति प्रकट की। लेकिन ये ध्यान रखने की आवश्यकता है कि केरल वही जगह है, जहाँ कम्यूनिस्टों का बोल बाला है और लोग खुले आम बीफ पार्टी करने से नहीं चूकते।

ऐसे में इस हुनरमंद कार्टूनिस्ट ने अपनी कला के जरिए केरल में पसरी वामपंथी मानसिकता और उनके दोहरेपन पर गहरी चोट की। उन्होंने, हर कार्टूनिस्ट से हटकर, इस मुद्दे पर एक घड़ियाल को फ्रेम में दिखाया। जिसके सामने बीफ रखा है और दीवार पर गाय का सिर टंगा है।

मगर, वो सोशल मीडिया पर एक हथिनी की मौत से आहत होकर पूछता है कि आखिर एक मनुष्य, जानवरों के साथ ऐसी बर्बरता कैसे कर सकता है।

2. एकतरफा सेकुलरिज्म

हमारे समाज में सेकुरलिज्म के नाम पर वामपंथियों द्वारा सनातन धर्म की उपेक्षा कई बार देखने को मिलती है। ऐसे में हिंदुओं से ये उम्मीद की जाती है कि वह समुदाय विशेष के हर रिवाज को शांति से मानते जाएँ और उनकी आर्थिक मदद करते जाएँ। लेकिन जब इसी प्रकार की अपेक्षा समुदाय विशेष से की जाती है तो उनका कट्टरपंथ उनपर हावी हो जाता है।

इसी बात को अपने कार्टून के जरिए दिखाते हुए विशाल उस खबर का जिक्र करते हैं जब वैष्णो देवी श्राइन ने मुस्लिमों के लिए 500 लोगों की इफ्तारी का इंतजाम किया। लेकिन 2014 में इसी वैष्णो देवी की तस्वीर दस के सिक्के पर दिखने से कट्टरपंथियों ने बवाल खड़ा कर दिया था।

इसके अलावा कार्टूनिस्ट ने इस बात को भी दिखाया कि भले ही मंदिरों से इफ्तारी की खबरें आ जाएँ लेकिन मस्जिदों से कभी लंगर या दान की खबर नहीं आएगी।

3.पालघर साधुओं की लिंचिंग, तबरेज की मौत और जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या

बीते दिनों लिंचिंग एक ऐसा बड़ा मुद्दा उभरकर समाज की सुर्ख़ियाँ बना। जिसका पर्याय वामपंथियों ने हिंदू आतंक से जोड़कर प्रदर्शित किया। मसलन तबरेज की मौत पर जिस प्रकार जय श्रीराम के नारे को आधार बनाकर हिंदुत्व पर प्रहार हुआ, वैसे पालघर मामले में हिंदू संतों के लिए किसी ने इंसाफ नहीं माँगा।

लेकिन, विशाल ने बड़ी सजगता से इस मामले पर कार्टून बनाकर लिबरल इकोसिस्टम द्वारा गढ़े नैरेटिव का भंडाफोड़ किया। उन्होंने एक कार्टून में जॉर्ज फ्लॉयड, तबरेज और जूना अखाड़े के साधू की तस्वीर बनाई, साथ ही ये बताया कि इन तीनों हत्या के मामले में कैसे सबकी प्रतिक्रिया अलग-अलग रही।

जॉर्ज के मामले में लोगों ने बड़े-बड़े लेख और ट्वीट लिखे, तबरेज के मामले को तूल देकर दंगे करने की कोशिश की गई। मगर पालघर मामले पर पर केवल अनुरोध किया गया कि साम्प्रदायिकता न फैलाएँ और बस चुप रहें।

4.बुद्धिजीवियों का आतंक

वामपंथी विचारधारा के बारे में जब भी हम बात करते हैं, तो ये ध्यान में रखना आवश्यक है कि बिना मीडिया में पकड़ के इस आइडियोलॉजी का कोई औचित्य नहीं है। आज जितना भी पाठकों या दर्शकों को इस विचारधारा के प्रति प्रेरित किया जाता है, वो सब मीडिया के जरिए है। 

हमें मीडिया में एक पक्ष की पत्रकारिता दिखाई जाती है और बड़ी चालाकी से आम जनता को बरगला दिया जाता है। इसी मुद्दे को अपने कार्टून के जरिए विशाल ने बखूबी दिखाया है। उन्होंने इस तरह की पत्रकारिता से आम जनता को भटकाने वालों की विचारधारा को ‘Intellectual terrorism’ का नाम दिया है।

5. विक्टिम कार्ड

पिछले कुछ समय में हमने ये ट्रेंड देखा है कि इस्लामोफोबिया के नाम पर देश में हमेशा समुदाय विशेष एक प्रकार से विक्टिम कार्ड खेलता रहा और वामपंथी खुलेआम उनके इस झूठ के सबसे बड़े वाहक बने हुए हैं। मगर, जब भी समुदाय विशेष द्वारा किए अपराधों का पर्दाफाश हुआ, तो इसपर सफाई देने की जगह, उसे उन्होंने अपने अस्तित्व पर ही खतरा बता दिया।

इसी संबंध में विशाल ने एक कार्टून बनाया। इस कार्टून के जरिए उन्होंने संदेश दिया कि लोग कट्टरपंथ के बारे में नहीं बोलते। तबलीगियों को समर्थन देने पर नहीं बोले। समुदाय विशेष के बहुत सारे अपराधों पर नहीं बोलते। मगर, जैसे ही उँगली उठनी शुरू होती है, वह अपने अल्पसंख्यक होने का विक्टिम कार्ड खेल जाते हैं

6. हिंदूफोबिक कॉमेडी

हास्य, व्यंग्य के नाम पर पिछले दिनोँ खुलेआम हिंदू घृणा फैलाई गई। कई जगह ऐसे कॉमेडियन सामने आए जिन्होंने अपनी क्रिएटिव सोच के नाम पर केवल हिंदू देवी-देवताओं और उनकी खिल्ली उड़ाई।

इस मुद्दे पर कार्टून बनाकर विशाल ने यह संदेश देना चाहा कि हम हिंदू इतने बिखरे हुए हैं कि कोई भी टुटपुँजिया वामपंथी कॉमेडी के नाम पर हमारे इतिहास, हमारी परंपरा, हमारी मान्यताओं के साथ खिलवाड़ करता जाता है और हम उसे केवल अभिव्यक्ति की आजादी समझकर बख्शते जाते हैं।

7. रमजान स्पेशल कवरेज

इस कार्टून में विशाल ने एक गंभीर मुद्दा उठाया। उन्होंने अपने कार्टून के जरिए जानवरों पर होते अत्याचार को प्रकाशित तो किया। साथ ही उन्होंने इस कार्टून में उन्होंने बताया कि एक त्यौहार के नाम पर लाखों जानवरों को हलाल कर दिया जाता है। लेकिन न पेटा वाले कुछ बोलते हैं और न ही कोई सामाजिक कार्यकर्ता इसपर अपनी जुबान खोलता है। मगर, जैसे ही कोई हिंदू त्यौहार आता है तो लोगों की अचानक संवेदनाएँ जाग जाती हैं और वो ज्ञान देना शुरू कर देते हैं।

8. ऑल लाइव्स मैटर

पिछले दिनो अमेरिका में जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद सोशल मीडिया पर ब्लैक लाइव मैटर का ट्रेंड बहुत चर्चा में रहा। बड़े-बड़े चेहरे भी इसपर अपनी प्रतिक्रिया देने से नहीं चूँके। ऐसे में विशाल ने एक कार्टून बनाया। जिसमें उन्होंने इस व्यक्ति की व्यथा को दर्शाया, जो सोशल मीडिया पर हिंदू घृणा से सने ट्वीट देखकर तंग आ चुका है और वह अब न ऐसी बातें सुनना चाहता है और न ही देखना।

9. सेव योर टेंपल

हिंदुओं में हिंदू धर्म के लिए घृणा और सरकारों का हस्तक्षेप देखते हुए इस कार्टून को विशाल ने बनाया। उन्होंने कार्टून के बारे में बताया कि अंग्रेजों के समय से एक नियम बना है कि राज्यों का दखल हमेशा मंदिरों में रहता है। 

ऐसे में मंदिर के पास जितना पैसा आता नहीं है, उससे ज्यादा पैसा निकाल लिया जाता है और बाद में सब्सिडी के नाम पर बाँट दिया जाता है। लेकिन गैर हिंदू धार्मिक संस्थानों से सवाल तक नहीं होता कि उनका फंड कहाँ से आ रहा है? बाद में वे लोग यही पैसा धर्मांतरण के लिए प्रयोग करते हैं, जिहाद में इस्तेमाल करते हैं। कुल मिलाकर हमारा पैसे लेकर हमारे खिलाफ ही इस्तेमाल किया जाता है।

इसलिए लोगों को सजग होने की जरूरत हैं कि जब हम मंदिर में जाते हैं तो दान आदि ज्यादा न करें, बल्कि उस पैसे से किसी गरीब हिंदू का पेट भर दिया जाए। या फिर उस पैसे को पंडितों को दिया जाए। या फिर उस पैसे को हिंदू धर्म के विस्तार के लिए प्रयोग में लाया जाए।

वे कहते हैं कि सेव योर टेंपल पर उनके कार्टून का उद्देश्य सिर्फ़ यही था कि लोग जागरूक हों और मंदिरों से राज्य के अनावश्यक हस्तक्षेप को हटाने की माँग करें।  

10. रियाज नाइकू- गणित का टीचर

आतंकवादी रियाज नाइकू के एनकाउंटर के बाद जिस तरह से मीडिया में ट्रेंड चला कि हेडलाइन में उसके अपराधों की जगह उसके प्रोफेशन का जिक्र होने लगा, उससे आहत होकर विशाल ने यह कार्टून बनाया।

इसमें उन्होंने बताया कि अगर रियाज मैथ का टीचर था भी तो उसने शायद अपने छात्रों को यही पढ़ाएगा कि जिस दिन हिंदुस्तान से काफिरों का सफाया होगा उस दिन हिंदुस्तान में गजवा ए हिंद आएगा।

इस कार्टून पर हमसे बात करते हुए विशाल बताते हैं कि हमाारे मीडिया में आतंकियों को एक ‘स्ट्रगलर’ के तौर पर दिखाया जाता है। जबकि सच्चाई ये नहीं है। विशाल रियाज नाइकू और बुरहान वानी से जैसे आतंकियों के बारे में कहते हैं कि इन सबका एक ही मिशन है।

ऐसे में अगर न्यूज के जरिए ब्रेनवॉश किया जाएगा, इनके लिए सहानुभूति इकट्ठा की जाएगी। लेकिन अगर, वहीं कोई हिंदू लड़का ऐसा कुछ करता है, तो वो उसकी मंशा को जानने की कोशिश नहीं करते बल्कि सिर्फ उसके हिंदू होने के कारण उसे हिंदू आतंकी का चेहरा बता दिया जाता है।

विशाल का युवाओं को संदेश

ऑपइंडिया से बात करते हुए अंत में विशाल सिर्फ़ हमारे युवाओं से यही अपील करते हैं कि वह किसी भी मुद्दे पर एक राय निर्मित करने से पहले हर पहलू पर गौर करें। जब भी कोई मीडिया संस्थान कोई खबर चलाए तो उसे अपने स्तर पर समझने की कोशिश करें कि आखिर कोई मीडिया चैनल ऐसी बात क्यों कर रहा है?

वे कहते हैं कि हमें इस समय इस बने-बनाए नैरेटिव को तोड़ना बहुत जरूरी हो गया है। वरना ये लोग देश में धर्म का नाश कर देंगे।

वे कहते हैं कि उनके कार्टून बनाने के पीछे का उद्देश्य था कि आज जो लोग लंबे-लंबे आर्टिकल पढ़ने में कतराते हैं। वह इस बात को समझ जाएँ कि आखिर खबरों का वास्तविक मतलब क्या है? और क्यों वामपंथी संस्थान इस तरह की रिपोर्टिंग कर रहे हैं, उसका लिंक क्या है, उनकी मंशा क्या है?

विशाल हिंदुत्व का पताका लहराने के लिए और अपने इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए युवाओं के लिए फ्री वॉलपेपर भी तैयार करते हैं। ताकि हमारे नायकों की छवि, उनकी महानता की गाथा, हमेशा युवाओं को प्रेरित करे और उन्हें मालूम रहे- हमारा अपना वास्तविक इतिहास और हमारी पहचान क्या है।

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