होली: धुरखेल, भरभोलिया, महाश्मशान से लेकर जोगीरा, कबीरा और बुढ़वा मंगल तक

प्रह्लाद की कथा के अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी ढूँढ़ी, राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जुड़ा हुआ है। कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं।

विविधताओं से भरी भारतीय जीवन शैली अपने आम में जीवन के हर रंग समाए हुए है। बात जीवन के रंगों के उत्सव की हो तो होली से ख़ास क्या होगा। वैसे होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या होलाका नाम से मनाया जाता था। वसंत ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे वसंतोत्सव और काम-महोत्सव के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह प्रेम, ताजगी और ऊर्जा का त्यौहार है साथ ही रंगों का त्यौहार कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है। पहले दिन होलिका जलायी जाती है। दूसरे दिन, जिसे प्रमुखतः धुलेंडी व धुरड्डी, धुरखेल या धूलिवंदन इसके अन्य नाम हैं, लोग एक दूसरे को रंग, अबीर-गुलाल से सराबोर कर देते हैं, ढोलक और अन्य वाद्य यंत्रों की ताल पर होली के गीत गाए जाते हैं और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाने के साथ ही होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर प्यार से गले मिल जाते हैं। यह समरसता का प्रतीक भी है।

बनारस में होली की शुरूआत रंगभरी एकादशी से होती है। ऐसी मान्यता है कि रंगभरी एकादशी के दिन बाबा विश्वनाथ माता पार्वती और पुत्र गणेश के साथ गौना करा कर काशी लौटते हैं। उनके काशी लौटने पर तीनों लोकों के लोग उनका स्वागत करते हैं। इस दिन बाबा विश्वनाथ के साथ काशी के लोग रंग-गुलाल खेलते हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर के साथ शहर की गली-गली में मौजूद मंदिर रंग-गुलाल से नहा उठते हैं। 

राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है। राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही पर इनको उत्कर्ष तक पहुँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है। फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं। वैसे होली का त्यौहार वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है। उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है। इस दिन से फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। खेतों में सरसों खिल उठती है। बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा छा जाती है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से परिपूर्ण हो जाते हैं। बनारस में रंग भरी एकादशी से होली का नशा काशी वासियों पर छा जाता है।

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होली के पर्व की तरह इसकी परंपराएँ भी अत्यंत प्राचीन हैं। हालाँकि, इसका स्वरूप और उद्देश्य समय के साथ बदलता रहा है। प्राचीन काल में यह विवाहित महिलाओं द्वारा परिवार की सुख समृद्धि के लिए मनाया जाता था और पूर्णिमा के दिन मनाए जाने के कारण पूर्ण चंद्र की पूजा करने की परंपरा थी। वैदिक काल में इस पर्व को ‘नवात्रैष्टि यज्ञ’ कहा जाता था। उस समय खेत के अधपके अन्न को यज्ञ में दान करके प्रसाद लेने का विधान समाज में व्याप्त था। अन्न को होला कहते हैं, इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा। भारतीय ज्योतिष के अनुसार चैत्र शुदी प्रतिपदा के दिन से नववर्ष का भी आरंभ माना जाता है। इस उत्सव के बाद ही चैत्र महीने का आरंभ होता है। अतः यह पर्व नवसंवत का आरंभ तथा वसंतागमन का प्रतीक भी है। कहते हैं, इसी दिन प्रथम पुरुष मनु का जन्म हुआ था, इस कारण इसे मन्वादितिथि कहते हैं।

होली के पर्व से अनेक कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है प्रह्लाद की। भागवत पुराण के अनुसार  प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था। जो आज के मुल्तान (पाकिस्तान) पर शासन करता था। ब्रह्मा जी उसकी कई वर्षों की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे ऐसा वरदान दिया था जिसने उसे एक प्रकार से अमर बना दिया था। अपने बल के दर्प में वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था। यहाँ तक कि उसने अपने राज्य में भगवान विष्णु का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी। हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद नारायण भक्त था। प्रह्लाद की विष्णु भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकश्यप ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने भगवान की भक्ति का मार्ग न छोड़ा। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती। हिरण्यकश्यप ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है।

सनातन में ऐसी कहानियों का बहुत गूढ़ अर्थ था। प्रतीक रूप से ऐसा माना जाता है कि प्रह्लाद का अर्थ आनन्द होता है। वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद (आनंद) अक्षुण्ण रहता है।

प्रह्लाद की कथा के अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी ढूँढ़ी, राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जुड़ा हुआ है। कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था। इसी खु़शी में गोपियों और ग्वालों ने रासलीला की और रंग खेला था।

होलिका दहन

होलिका दहन का पहला काम झंडा या डंडा (रेड़ का पेड़) गाड़ना होता है। पर्व का पहला दिन होलिका दहन का दिन कहलाता है। इस दिन चौराहों पर व जहाँ कहीं अग्नि के लिए लकड़ी एकत्र की गई होती है, वहाँ होली जलाई जाती है। इसमें लकड़ियाँ और उपले प्रमुख रूप से होते हैं। कई स्थलों पर होलिका में भरभोलिए जलाने की भी परंपरा है। भरभोलिए गाय के गोबर से बने ऐसे उपले होते हैं जिनके बीच में छेद होता है। इस छेद में मूँज की रस्सी डाल कर माला बनाई जाती है। एक माला में सात भरभोलिए होते हैं। होली में आग लगाने से पहले इस माला को भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घूमा कर फेंक दिया जाता है। रात को होलिका दहन के समय यह माला होलिका के साथ जला दी जाती है। इसका यह आशय है कि होली के साथ भाइयों पर लगी बुरी नज़र भी जल जाए।

होलिका दहन

लकड़ियों व उपलों से बनी इस होली का दोपहर से ही विधिवत पूजन आरंभ हो जाता है। घरों में बने पकवानों का यहाँ भोग लगाया जाता है। दिन ढलने पर ज्योतिषियों द्वारा निकाले मुहूर्त पर होली का दहन किया जाता है। इस आग में नई फसल की गेहूँ की बालियों और चने के होले को भी भूना जाता है। होलिका का दहन समाज की समस्त बुराइयों के अंत का प्रतीक है। यह बुराइयों पर अच्छाइयों की विजय का सूचक है। गाँवों में लोग देर रात तक होली के गीत गाते हैं तथा संगीत की लय में नृत्य में डूब जाते हैं।

होलीका दहन का मतलब अपने जीवन की सभी गैरजरूरी चीजों को जला देना भी है। इस दिन लोग सभी पुराने कपड़े और आस-पड़ोस के बच्चों के खिलौने और जिन चीजों की जरूरत न हो, उन्हें इकट्ठा करके सड़क पर ढेर लगाते हैं और उसे जलाते हैं।

आध्यात्मिक रूप से होलिका दहन का मकसद पुराने कपड़ों या वस्तुओं को जलाना ही नहीं है, बल्कि पिछले एक साल की यादों को जलाना है ताकि आज से आप एक नए और उल्लासमय जीवन के रूप में शुरुआत कर सकें।

रंग बरसे, उमंग बरसे

प्रेम और सौहार्द का प्रतीक होली से अगला दिन धूलिवंदन भी कहलाता है। इस दिन लोग रंगों से खेलते हैं। सुबह होते ही सब अपने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलने निकल पड़ते हैं। गुलाल और रंगों से सबका स्वागत किया जाता है। लोग अपनी ईर्ष्या-द्वेष की भावना भुलाकर प्रेमपूर्वक गले मिलते हैं तथा एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। इस दिन जगह-जगह टोलियाँ रंग-बिरंगे कपड़े पहने नाचती-गाती दिखाई पड़ती हैं। बच्चे पिचकारियों से रंग छोड़कर अपना मनोरंजन करते हैं। सारा समाज होली के रंग में रंगकर एक-सा बन जाता है। कबीरा और जोगीरा के माध्यम से समाज ने अपने मन की तमाम कुण्ठाओं के विसर्जन और मनोरंजन का भी उपाय कर रखा था।

होली रंगों का त्योहार है, हँसी-खुशी का त्योहार है, लेकिन होली के भी अनेक रूप देखने को मिलते हैं। प्राकृतिक रंगों के स्थान पर रासायनिक रंगों का प्रचलन, भांग-ठंडाई की जगह नशेबाजी और लोक संगीत की जगह फ़िल्मी गानों का प्रचलन इसके कुछ आधुनिक रूप हैं। लेकिन इससे होली पर गाए-बजाए जाने वाले ढोल, मंजीरों, फाग, धमार, चैती और ठुमरी की शान में कमी नहीं आती। अनेक लोग ऐसे हैं जो पारंपरिक संगीत की समझ रखते हैं और पर्यावरण के प्रति सचेत हैं। इस प्रकार के लोग और संस्थाएँ चंदन, गुलाबजल, टेसू के फूलों से बना हुआ रंग तथा प्राकृतिक रंगों से होली खेलने की परंपरा को बनाए हुए हैं, साथ ही इसके विकास में महत्वपूर्ण योगदान भी दे रहे हैं। रासायनिक रंगों के कुप्रभावों की जानकारी होने के बाद बहुत से लोग स्वयं ही प्राकृतिक रंगों की ओर लौट रहे हैं।


मस्तानों की नगरी काशी में रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन महाश्मशान में होली खेली जाती है। यह दुनिया की सबसे अनूठी होली है। ऐसी मान्यता है कि जब भगवान शिव रंगभरी एकादशी के दिन माता पार्वती और पुत्र गणेश के साथ गौना कराकर काशी लौटाते हैं तो उनका स्वागत सभी लोकों के लोग करते हैं। उसमें शिव के भूत-पिशाच भक्त गण और दृश्य-अदृश्य आत्माएँ मौजूद नहीं होतीं। इसलिए रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन महाश्मशान में महादेव अपने भक्तों के साथ भस्म से होली खेलते हैं। यह भस्म कोई साधारण भस्म नहीं होती इंसान के शव जलने के बाद पैदा होने वाली राख होती है।


महाश्मशान में होली

खेले मसाने में होरी दिगंबर, खेले मसाने में होरी
भूत पिसाच बटोरी दिगंबर, खेले मसाने में होरी
लखि सुंदर फागुनी छटा के, मन से रंग-गुलाल हटा के चिता-भस्‍म भर झोरी,
दिगंबर खेले मसाने में होरी
गोपन-गोपी श्‍याम न राधा, ना कोई रोक ना कौनऊ बाधा ना साजन ना गोरी
दिगंबर खेले मसाने में होरी
नाचत गावत डमरूधारी, छोड़ै सर्प-गरल पिचकारी पीतैं प्रेत-धकोरी
दिगंबर खेले मसाने में होरी
भूतनाथ की मंगल-होरी, देखि सिहाएं बिरिज कै गोरी धन-धन नाथ अघोरी
दिगंबर खेलैं मसाने में होरी

बुढ़वा मंगल पर सुर लहरियों से सराबोर करते काशी के धरोहर डॉ. राजेश्वर आचार्य

होली बनारस और बिहार के गया में बुढ़वा मंगल तक चलता है। होली के बाद आने वाले मंगलवार को काशीवासी बुढ़वा मंगल या वृद्ध अंगारक पर्व भी कहते हैं। होली युवाओं के जोश का त्यौहार है लेकिन बुढ़वा मंगल में बुजुर्ग लोगों का उत्साह भी दिखाई पड़ता है। बनारस में बुढ़वा मंगल के अवसर पर गीत-संगीत की महफ़िलों के साथ मेला भी लगता है। बनारस के इस पारम्परिक मेले से प्रमुख साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र भी सम्बद्ध रहे हैं।

चलते एक जोगीरा की बानगी देखिए, जोगीरा मन के उन भावों को भी व्यक्त करने की कला है जो आमतौर पर मन में होती तो ज़रूर है पर कही नहीं जाती। तो चलिए एक जोगीरा हो जाए….


बुरा न मानो होली है।
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