प्रिय होम मिनिस्टर, आतंकियों की लाशें परिवार को सौंप कर उन्हें हीरो बनाना कब बंद होगा?

बुरहान वनी को मारोगे तो मूसा आ जाएगा, मूसा को मारोगे तो कोई बिल्ला आ जाएगा, बिल्ला को मारोगे तो कोई टाइगर आ जाएगा। ये अनवरत चलता रहेगा। ये अनवरत इसलिए चलता रहेगा क्योंकि इनकी लाशों को, इनकी क़ब्रों को हमारी मानवीय नीतियों ने पर्यटन स्थल और हीरो का दर्जा दे दिया है।

एक तरफ मजहबी उन्माद है जो मानता है कि एक पीढ़ी खप जाए, दो पीढ़ी खप जाए, तीन खपे, चार हो जाए, दो सौ साल लगें लेकिन हम अपना झंडा गाड़ेंगे। और दूसरी तरफ आपकी लड़ाई है कि कभी आप उन्हें बच्चा समझ कर छोड़ देते हैं, कभी रमज़ान में सीजफायर करके उन्हें फिर से संगठित होने का मौका देते हैं, कभी उनके आतंकी बच्चों की लाशों को सौंपते हैं परिवारों को ताकि आतंकियों को समर्थन देने वाला पूरा समुदाय 20-30 हज़ार की भीड़ बन कर आपको यह संदेश देता रहे कि एक पीढ़ी खप जाए, दो पीढ़ी खप जाए, तीन खपे, चार हो जाए, दो सौ साल लगें लेकिन हम अपना झंडा गाड़ेंगे।

अगर भारतीय सुरक्षा नीति इस हिसाब से चलती रही तो इसी तरह की खबरें हम पढ़ते रहेंगे कि इस साल 101 आतंकी मारे जा चुके हैं लेकिन नई भर्तियों से सुरक्षा बल चिंतित है। ये सुरक्षा नीति नहीं, ये तो प्रोटेक्शन देना है एक क़ातिल, आतंकी विचारधारा को जिसे आप मानवतावाद का पाठ पढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, और वहीं, उसी के मज़हब के तमाम नेता उसे ‘साहब’ कह कर बुलाने से लेकर ‘माटी के सपूत’ और पता नहीं क्या-क्या कहते फिरते हैं।

पहले पाँच साल समझ सकता हूँ कि प्राथमिकताएँ अलग थीं क्योंकि फर्जी मानवाधिकारों की लॉबी को भी देखना था, उनके नैरेटिव को भी काटना था, आतंकियों को रोकना भी था और उन लोगों को मौका भी नहीं देना था जो एक सामाजिक अपराध को राजनीति का रंग देकर वैश्विक मंच पर राष्ट्र की छवि बर्बाद करते हैं। यहाँ तक तो समझा जा सकता है, और उन पाँच सालों तक लोगों ने इंतजार किया, और आपको फिर से वोट देकर सत्ता दी कि कुछ घावों को कैंसर बनने से पहले ही सही दवाई दे दी जाए।

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आतंकियों को लगातार मारते रहना, घर में घुस कर ब्लैकमेल करे तो घर को ही आग लगा देना, पैलेट गन से पत्थरबाज़ों को तितर-बितर करना, आफ्स्पा में ढिलाई न बरतना आदि वो नीतियाँ थीं जो पहले पाँच सालों में दिखीं, और काफी हद तक आतंकी गतिविधियों में कमी आई जिसके कारण कई बार बम विस्फोट से लेकर कई आतंकी घटनाएँ आम हुआ करती थीं। इसका भी क्रेडिट इसी सरकार को जाता है।

लेकिन, इस दूसरे कार्यकाल में इन आतंकियों को हीरो बनाने से रोकना एक प्राथमिकता होनी चाहिए। जिसने निर्दोषों को क़त्ल के लिए बंदूक उठा ली, वो मानव नहीं है। जो मानव नहीं है, उसके न तो अधिकार हैं, न परिवार। ऐसे दरिंदों को न सिर्फ बहुत क्रूर सजा मिलनी चाहिए, बल्कि अगर वो मुठभेड़ में मारा जाए तो उसकी लाशों को परिवार को सौंपने की जगह अनाम जगहों पर फेंक दिया जाना चाहिए। हाँ, यह भी ध्यान रहे कि उस आतंकी की लाश का एक टुकड़ा भी किसी जीव के मुँह में न जाए, क्योंकि वो उस जीव के अधिकारों का हनन होगा। उस लाश को नष्ट कर दिया जाना चाहिए। पूरी तरह से जला देना भी एक उचित तरीके हो सकता है।

मेरे इन विचारों से कुछ लोग असहमत हो जाएँगे कि मैं लाशों को जलाने कह रहा हूँ। मुझे इसमें कोई समस्या नहीं दिखती क्योंकि आतंकियों का कोई मज़हब नहीं होता, तो उनकी लाशों को नष्ट करने के लिए जलाना, पानी में डुबाना या किसी निर्जन जगह पर फेंक देना भी एक बेहतर विकल्प है।

प्रश्न यह है कि आखिर ऐसा करना ज़रूरी क्यों है? ज़रूरी इसलिए है कि ये आतंकी रक्तबीज साबित हो रहे हैं। बुरहान वनी को मारोगे तो ज़ाकिर मूसा आ जाएगा, मूसा को मारोगे तो कोई बिल्ला आ जाएगा, बिल्ला को मारोगे तो कोई टाइगर आ जाएगा। ये अनवरत चलता रहेगा। ये अनवरत इसलिए चलता रहेगा क्योंकि इनकी लाशों को, इनकी क़ब्रों को हमारी मानवीय नीतियों ने पर्यटन स्थल और हीरो का दर्जा दे दिया है।

जब एक राष्ट्र के तौर पर हमारी नीति साफ है कि कश्मीर जो हो रहा है वो आतंकी गतिविधि है, हमारे देश की अखंडता पर प्रहार की कोशिश है, तो फिर उसी नीति का हिस्सा नए आतंकियों को पैदा करने में मदद कैसे कर रहा है? आखिर हम इस बात को कैसे नकार रहे हैं कि इनकी लड़ाई कश्मीर या कश्मीरियत की नहीं, बल्कि इस्लामी ख़िलाफ़त की है? क्या इनकी लाशों के साथ चलने वाली भीड़ में आईसिस का काला झंडा नहीं दिखता?

पिछले पाँच सालों में जबसे सेना और सशस्त्र बलों ने, जम्मू-कश्मीर पुलिस के साथ, ऑपरेशन किए हैं, और लगातार आतंकियों को ढेर किया है, तब से इन आतंकियों की योजना बदल गई है। पहले ये कश्मीरी लोगों को नहीं मारते थे। लेकिन, जब इनके पास कुछ और करने को नहीं बचा तो इन्होंने न सिर्फ कश्मीरी सैनिकों को मारा, बल्कि जम्मू-कश्मीर पुलिस के अफ़सरों को भी मारने लगे।

ज़ाहिर है कि ये लड़ाई कश्मीर के नाम तो नहीं ही लड़ी जा रही। ये लड़ाई तो सांकेतिक जीत के लिए है कि भारत के एक हिस्से पर इस्लाम का ‘अल्लाहु अकबर’ लिखा काला झंडा लहराया जा सकता है, बाकी भारत भी तैयार रहे। कश्मीर के आतंकी तो इसलिए लगातार अपनी जान दे रहे हैं ताकि इनके तथाकथित आंदोलन को बाकी लोग, जो दिल में भारत को इस्लामी ख़िलाफ़त के अंदर होते देखना चाहते हैं, एक उदाहरण के तौर पर देखें।

आप कश्मीरी हिन्दुओं को तो कश्मीर दे नहीं सके, कश्मीर को उसके अपने संविधान और दंड विधान से बाहर लाकर भारतीय संविधान और इंडियन पीनल कोड के नीचे तो ला नहीं सके, लेकिन हर वो काम किया है जिससे भारत-विरोधी भावना भड़कती रहे। जब हमारी नीति स्पष्ट है कि कश्मीर में जो हथियार के साथ आंदोलन कर रहे हैं, वो आतंकी हैं, तो फिर उनकी लाशों को परिवारों को किस हिसाब से दिया जाता है?

अब भारत की जनता ने दोबारा बहुमत देकर मोदी सरकार को कुछ वैसे वायदे पूरे करने की उम्मीद जताई है जो किन्हीं कारणों से पिछले पाँच सालों में पूरी नहीं हो सकी। 370 एक बेकार और मरी हुई चर्चा है, उसे ख़त्म करना आवश्यक है। 35A कई मायनों में राष्ट्रीयता और ‘एक भारत’ के विचार से बुनियादी तौर पर ही उल्टा है। इन्हें ख़त्म करके कश्मीरियों को मुख्यधारा में लाया जाए। अगर ऐसे कानून वहाँ रहेंगे तो आप खूब आईआईटी और आईआईएम खोल दीजिए, सेंट्रल यूनिवर्सिटी बना दीजिए, वहाँ जाएगा कौन?

आशा है कि नई सरकार, अपने इरादे स्पष्ट करते हुए, आतंकी को आतंकी कहे और उनके साथ वही व्यवहार करे जिससे वो जनमानस में कुछ भी बन जाएँ, हीरो तो न बनें। आज विरोध में खड़ी मीडिया पर से लोगों का विश्वास उठ चुका है और उनके नैरेटिव को अब कोई सीरियसली लेता नहीं। उन्हें पढ़ने और देखने वालों में से भी एक बड़ा हिस्सा उन्हें या तो बरनॉल देने जाता है, या फिर वहाँ दिल खोल कर उन्हें लताड़ता है।

इस लिहाज से भी यह मौका उचित है कि इस तरह की मीडिया की पूर्ण उपेक्षा करते हुए, मजबूत क़दम उठाए जाएँ ताकि लोकतांत्रिक भारत का लोकतंत्र सही मायनों में हर जगह स्थापित हो सके और इसकी अखंडता सुनिश्चित रहे। इसके लिए आतंकियों को आयकॉनिफाय करने की जगह, उन्हें लगातार गायब किया जाए। बस एक संख्या बता दी जाए कि इतने लोग आज मारे गए। वो लोग कौन थे, यह बात कम से कम तीन दशक तक क्लासिफाइड सूचना बन कर रहे। उनकी लाश कहाँ है, उसके साथ क्या किया जाए, ये सारी सूचना सार्वजनिक न की जाए।

इससे ‘गजवा-ए-हिंद’ का नारा लगाती, आतंकियों के जनाजों के चारों तरफ सफ़ेद टोपियों की मातमी भीड़ चिल्लाते हुए भारत-विरोधी नारे लगाने की बजाए सफ़ेद तख़्तियों पर गायब आतंकियों की फोटो के साथ किसी चौक पर कभी-कभार इकट्ठे दिखेंगे। वो दृश्य उन परिवारों का, उन समुदायों का, उन गाँवों का मनोबल तोड़ेगा जिसके लोग यह सोचते हैं कि एके सैंतालीस उठा कर किसी की हत्या कर देना नेक काम है। ये उनका मनोबल नीचे करेगा जो सोचते हैं कि आतंकियों के मानवाधिकार होते हैं, जो कॉलम लिखते हैं, जो इनके हिमायती बन कर कोरस में विलाप करते हैं।

अगर इन आतंकियों को सिर्फ एक संख्या के रूप में, साल के अंत में जारी किया जाएगा, और इनकी लाशों को ऊपर बताए तरीक़ों से निपटा जाएगा, तो रक्तबीज का रक्त ज़मीन पर नहीं गिरेगा। वो सेना के खप्पर में ही रहेगा, जिसे सेना जैसे चाहे निपट लेगी। हमारी सेना दुश्मनों की भी लाशों का सम्मान करती है, कश्मीरी तो फिर भी अपने हैं। उनके परिवारों को बता देगी आपका लड़का आतंकी था, वो अपनी तय जगह पहुँचा दिया गया है, आप अपने आप को संभालिए।

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