कश्मीर में स्कूली नाबालिग बच्चों को बनाया जा रहा है स्लीपर सेल: जाँच एजेंसियों का खुलासा

फोन टैपिंग के जरिए जो बातें सामने आई हैं, उसके मुताबिक इस नेक्सस में स्कूल के अध्यापक, चतुर्थ श्रेणी स्टाफ और 5 सरकारी विभाग, वन, लोक निर्माण, श्रम विभाग, मंडी और परिवहन शामिल हैं। नाबालिगों को भारतीय सुरक्षाबलों के खिलाफ भड़का कर उन्हें पहली किश्त के तौर ₹1,500 भी देते हैं।

पुलवामा आतंकी हमले के बाद सुरक्षाबलों ने कश्मीर में बड़ा सर्च ऑपरेशन शुरू किया था। चप्पे-चप्पे पर नजर रखी गई, उसके बाद भी आतंकी घटनाएँ होती रही। सुरक्षाबलों को यह समझ नहीं आ रहा था कि उनकी आवाजाही और सर्च ऑपरेशन की सूचनाएँ आतंकियों तक कैसे पहुँच रही हैं। इन सबके अलावा आतंकियों को हथियार-गोला बारुद और दूसरी मदद भी लगातार मिल रही हैं।

NIA ने पुलवामा हमले की जाँच के दौरान पता लगाया कि जम्मू कश्मीर में पाकिस्तानी आतंकियों के बड़े पैमाने पर स्लीपर सेल मौजूद हैं। हालाँकि, लश्कर-ए-तैयबा, हिजबुल मुजाहिदीन, जैश-ए-मोहम्मद और हरकत-उल-जिहाद अल-इस्लामी, जैसे आतंकी संगठनों व उनके स्लीपर सेल का अंदेशा तो जाँच एजेंसियों को पहले भी था, लेकिन स्कूली बच्चों का इस्तेमाल, यह एक राज ही बना हुआ था। दो सप्ताह पहले जाँच एजेंसियों ने इस सम्बन्ध में गृह मंत्रालय को एक रिपोर्ट भी सौंपी है।

₹1,500 है नाबालिग बच्चों को स्लीपर सेल बनाने की कीमत

पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठनों ने जम्मू-कश्मीर में नाबालिग स्कूली बच्चों का सहारा लेना  दिया है। सुरक्षा एवं जाँच एजेंसियों ने इस मामले में एक बड़े गिरोह का पर्दाफाश किया है। जम्मू-कश्मीर के 178 हायर सेकेंडरी स्कूल और 41 हाईस्कूल ऐसे मिले हैं, जहाँ आतंकी संगठन अपने स्लीपर सेल के जरिए बच्चों को गुमराह कर आतंक के रास्ते पर ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। फोन टैपिंग के जरिए जो बातें सामने आई हैं, उसके मुताबिक इस नेक्सस में स्कूल के अध्यापक, चतुर्थ श्रेणी स्टाफ और 5 सरकारी विभाग, वन, लोक निर्माण, श्रम विभाग, मंडी और परिवहन शामिल हैं। आतंकी संगठनों ने सभी स्कूल में स्लीपर सेल के लिए अलग-अलग कोड जारी किए हैं। नाबालिगों को भारतीय सुरक्षाबलों के खिलाफ भड़का कर उन्हें पहली किश्त के तौर ₹1,500 भी देते हैं।

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जाँच एजेंसियों के अधिकारियों का कहना है कि आतंकी संगठन स्कूली बच्चों को नाबालिग होने की वजह से अपना स्लीपर सेल बना रहे हैं। वे जानते हैं कि अगर 100 बच्चों में से 20 बच्चे भी लंबे समय तक आतंकी संगठन के साथ जुड़े रहे तो वे सुरक्षाबलों को भारी नुकसान पहुँचा सकते हैं। स्कूली बच्चों पर किसी को शक नहीं होगा और ये पकड़े गए तो जुवेनाइल एक्ट में जल्द छूट जाएँगे, इन्हीं वजहों से इन बच्चों को आसान हथियार बनाया जा रहा है।

पाकिस्तान से कोड वर्ड्स में आता है बच्चों को जिहाद की शिक्षा देने का सन्देश

आतंकियों की ऐसी सोच है कि बच्चों को जो भी काम सौंपा जाएगा, वे उसे आसानी से पूरा कर देंगे। पिछले माह जम्मू में बस अड्डे पर जो ग्रेनेड फेंका गया था, उसमें ऐसे ही बच्चों का इस्तेमाल किया गया था। हालाँकि, पुलिस अभी उनके दस्तावेज जाँच रही है। जम्मू-कश्मीर में स्लीपर सेल को धन की मदद देने वाले कथित अलगाववादी एवं दूसरे असामाजिक तत्व बच्चों के आधार कार्ड की फोटो प्रति उनके बैग में डलवा देते हैं। जो कॉल इंटरसेप्ट की गई, उसमें पाकिस्तान से आतंकी संगठन का एक सदस्य कह रहा है कि बच्चों को जिहाद की जानकारी देनी शुरू करो। स्कूल के बाद उन्हें खेल के बहाने जंगल या दूसरी किसी सुनसान जगह पर बुलाओ। अगर पैसे कम पड़ रहे हों तो स्लीपर सेल कोड वर्ड (साहबजादा) को बोल देना। बच्चों को जेहाद के यंत्र (कोड वर्ड) यानी हथियारों की जानकारी भी दे दो।

अनंतनाग-25 स्कूल, बांदीपोरा-15 हाई और 8 हायर सेकेंडरी स्कूल, बारामुला में 34 हाई और 14 हायर सेकेंडरी स्कूल, बड़गांव में 18 हायर सेकेंडरी स्कूल, डोडा में 11, कठुआ में 5, किश्तवाड़ में 13, कुलगांव में 8, कुपवाड़ा में 17 हाई व 21 हायर सेकेंडरी, शोपियां में 21 और पुलवामा में 11 हायर सेकेंडरी स्कूल शामिल हैं। इसके अलावा कई हाईस्कूलों में भी स्लीपर सेल अपनी गतिविधियाँ संचालित कर रहे हैं।

जो स्टूडेंट हायर सेकेंडरी स्तर पर हैं, उन्हें हर माह एक तय राशि दी जाए। बच्चों को एक छोटी सी पुस्तिका भी दी जाती है, जिसमें आतंकी संगठन खुद के बारे में बताते हैं। वे खुद को कश्मीर के लोगों का साथ देने वाले बताते हैं। जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक अधिकारी का कहना है कि पाकिस्तान का इन बच्चों को आतंक की राह पर ले जाने का मकसद बड़ा साफ है। अगर कभी इन बच्चों ने किसी बड़ी वारदात को अंजाम दिया या आतंकियों की मदद की तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह कहा जा सकेगा कि इसमें पाकिस्तान का हाथ नहीं है, ये सब भारतीय बच्चे हैं।

स्कूल और स्टाफ है आसान निशाना

जाँच एजेंसियों के अनुसार, स्कूलों में चतुर्थ श्रेणी स्टाफ को स्लीपर सेल के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। कई जगहों पर अध्यापक भी आतंकी संगठनों के संपर्क में हैं। इसके अलावा कुछ ड्राइवर-कंडक्टर स्लीपर सेल बने हैं। स्कूलों से बाहर, लोक निर्माण विभाग, वन विभाग, परिवहन, श्रम विभाग और मंडी जैसे विभागों में बड़े स्तर पर स्लीपर सेल बनाए जा रहे हैं। आतंकियों को सबसे बड़ी मदद परिवहन विभाग से मिल रही है।

अलगाववादी नेता इन विभागों और आतंकी संगठनों के बीच की कड़ी का काम करते हैं। NIA, जम्मू-कश्मीर पुलिस, सेना, अर्धसैनिक बल, आईबी, RAW, एनटीआरओ और ईडी जैसी एजेंसियों को संयुक्त तौर से इस ऑपरेशन में लगाया गया है। गौरतलब है कि ऐसी खबरें पिछले साल भी आई थीं।

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