‘Self-Styled Godman’ या ‘धर्मगुरु’ जैसे शब्दों से मजहब नहीं मीडिया की बदनीयत पता चलती है

ऐसा भी नहीं है कि यह गलती पहली बार हो रही हो। पहले भी पत्रकारिता का समुदाय विशेष यही 'गलती' न जाने कितनी बार कर चुका है। और पकड़े जाने, लताड़े जाने पर माफ़ी माँगने और गलती का अहसास होने का ढोंग करने के बाद फिर से, बार-बार लौट कर चला आता है।

‘Self-Styled godman’ या ‘धर्मगुरु’ शब्द चाहे आप कहीं सुनें, या फिर गूगल इमेज सर्च में ढूंढ लें, केवल हिन्दू बाबाओं की ही तस्वीर आपके दिमाग में भी कौंधेगी (क्योंकि न जाने कितनी पुश्तें मीडिया में यही सुनते-पढ़ते बड़ी हुईं हैं), और गूगल में भी दिखेगी (क्योंकि गूगल की algorithms भी उन्हें लिखने वालों की तरह वामपंथी और मुसलमानों के कुकर्मों को छिपाने वाली हैं, और वह जिन वेबसाइटों से ‘सीखतीं’ और चित्र लेतीं हैं, उनमें भी ‘Self-Styled godman’ शब्द के साथ हिन्दुओं के ही चित्र लगे हुए हैं)। कुल मिलाकर ‘Self-Styled godman’ शब्द हमेशा हिन्दू धर्मगुरुओं के लिए इस्तेमाल होता है, यह मीडिया का आम सत्य है। लेकिन इंडिया टुडे समेत पत्रकारिता का समुदाय विशेष इस शब्द का इस्तेमाल उस हेडलाइन में करता है, जिसमें खबर आज़म नामक मौलवी द्वारा हैदराबाद में एक किशोरी के साथ बलात्कार की है।

झाड़-फूँक के बहाने किया बलात्कार

हैदराबाद के बोरबंदा में रहने वाले आज़म को पुलिस ने उसी इलाके में रहने वाली 19-वर्षीया किशोरी के साथ बलात्कार के आरोप में गिरफ़्तार किया है। आरोप है कि उसने पहले कर्नाटक की दरगाह ले जाकर, और फिर लड़की के खुद के घर में उसके साथ बलात्कार किया। उसने घर में बुरी ताकतों के घर करने का हवाला देकर माँ-बाप का ऐसा विश्वास जीता कि बेटी के साथ कर्नाटक की दरगाह में जाकर भी उसे आज़म के भरोसे उतनी देर के लिए अकेला छोड़ दिया जितनी देर आज़म को अपने मंसूबों को पूरा करने के लिए चाहिए थी, और वापिस आने पर भी उन्होंने बेटी को आज़म के हुक्म पर उसके हवाले कर दिया और घर के बाहर निकल आए।

यह एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना है, इसमें कोई संदेह नहीं- अल्लाह के नाम पर बलात्कार करने वाला पीड़िता से इहलोक और परलोक दोनों में सुरक्षा का विश्वास छीन लेता है। अगर आरोप साबित हो जाए तो इसके लिए कानून को आज़म पर बिलकुल रहम नहीं दिखाना चाहिए। लेकिन इसमें प्रायः हिन्दू बाबाओं के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द ‘Self-Styled godman’ घुसाने का क्या अर्थ है?

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यह शब्द मीडिया न जाने कब से हिन्दू धर्मगुरुओं को ‘एक्सपोज़’ करने के लिए इस्तेमाल करता रहा है। और ऐसा भी नहीं कि यह केवल नकारात्मक अर्थ में, नकली झाड़-फूँक करने वाले, आज़म के हिन्दू समकक्ष ढोंगियों के लिए इस्तेमाल होता आया हो। जब मर्ज़ी आती तब मीडिया इसे असली ठगों और ढोंगियों के लिए इस्तेमाल करता है (जैसे रामपाल, राम रहीम इंसां आदि), और जब सुविधा होती है तो यही शब्द बाबा रामदेव, रमन महर्षि, सद्गुरु जग्गी वासुदेव और श्री श्री रविशंकर जैसे सम्मानित और सच्चे हिन्दू आध्यात्मिक व्यक्तित्वों के लिए इस्तेमाल होता है। यकीन न हो तो यह देखिए:

वही शब्द रमण महर्षि के लिए, और वही शब्द रामपाल के लिए- और इस लिंक पर यदि आप जाएँ तो वही शब्द गुरमीत राम रहीम सिंह के लिए

और इतिहास से लौटकर यदि वर्तमान में आएं तो पत्रकारिता का समुदाय विशेष इस घटना की हेडलाइनें लिखता है:

मुसलमानों में कब से ‘स्वयंभू बाबा’ और ‘धर्मगुरु’ होने लगे? स्वयंभू भी संस्कृत शब्द है, जो हिन्दुओं में उन ‘शिवलिंगों और विग्रहों’ के लिए इस्तेमाल होता है जिनकी उत्पत्ति के बारे में कोई स्पष्टता नहीं है, और ‘धर्म’ और ‘गुरु’ दोनों ही हिन्दुओं के शब्द हैं। हेडलाइन में आज़म को या तो आज़म ही लिखते, या फिर ‘मौलवी’, ‘मौलाना’, ‘दरवेश’, ‘पीर’ या और कोई इस्लामी शब्द इस्तेमाल करते

हिन्दुओं ने क्या सबकी गंदगी अपने माथे ढोने का ठेका ले रखा है?

पहली बार नहीं हो रहा है

ऐसा भी नहीं है कि यह गलती पहली बार हो रही हो। पहले भी पत्रकारिता का समुदाय विशेष यही ‘गलती’ न जाने कितनी बार कर चुका है। और पकड़े जाने, लताड़े जाने पर माफ़ी माँगने और गलती का अहसास होने का ढोंग करने के बाद फिर से, बार-बार लौट कर चला आता है हिन्दुओं के मुँह पर थूकने। और हिन्दू हर बार उनके थूकने, कालिख मलने के लिए अपने चेहरे तैयार रखते हैं। कब खौलेगा इस देश के हिन्दू का खून इतना कि इनके सब्सक्रिप्शन रद्द कर दिए जाएंगे, इनकी वेबसाइट पर विज्ञापन देने वाले उत्पाद निर्माताओं पर ईमेल/सोशल मीडिया से यह दबाव बनाया जाएगा कि हिन्दूफ़ोबिक मीडिया में विज्ञापन देने वालों के उत्पाद हिन्दू शब्द प्रयोग नहीं करेंगे?

आजकल नेटफ्लिक्स के हिन्दूफ़ोबिक शो लीला पर हिन्दुओं के खून में बासी कढ़ी वाला उबाल आया हुआ है। अभी गुस्सा है, 24 घंटे में फुस्स हो जाएगा। ‘लीला’ बनाने वाले भी यह जानते हैं, अख़बारों में हिन्दूफ़ोबिक हेडलाइन लगाने वाले एडिटर भी यह जानते हैं। कहीं न कहीं अपना आउटरेज टाइप करते हुए अपने दिल में आप भी यह जानते है- हिन्दू पाँच मिनट भड़केगा, सोशल मीडिया पर आउटरेज करेगा, सोचेगा कि सरकार मोदी-भाजपा की होते हुए ऐसा क्यों हो रहा है, और मन मसोस कर बैठ जाएगा। लेकिन हिन्दुओं को सम्मान मिलना, या कम-से-कम यह अपमान होना तभी बंद होगा, जब उनके इस अनुमान, इस ‘विश्वास’ की धज्जियाँ उड़ाते हुए आप और हम उनके आर्थिक हितों की पाइपलाइन काट कर यह याद दिलाएंगे (एक बार नहीं, बार-बार, हर बार) कि हिन्दुओं का अपमान करने वालों को हिन्दुओं से बिज़नेस नहीं नसीब होगा।

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