2019 नहीं, अब 2024 में ‘पकेंगे’ राहुल गाँधी: BBC ने अपने ‘लाडले’ की प्रोफाइल में किया बदलाव

जिन्होंने राहुल को बोलते देखा है, उनके भाषण और इंटरव्यू वगैरह से जो एक बार भी गुजरा है, उसे पता है कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के पास कितनी विस्तृत और व्यापक राजनीतिक समझ है। अनाम विशेषज्ञों के हवाले से और भी बहुत कुछ लिखा जा सकता था लेकिन गनीमत यह कि बीबीसी इतने पर ही रुक गया।

बीबीसी को राहुल गाँधी से काफ़ी उम्मीदें थी। अभी भी मीडिया संस्थान को राहुल गाँधी से काफ़ी उम्मीदें हैं। अंतर इतना है कि पहले बीबीसी वालों को उनसे 2019 लोकसभा चुनाव में उम्मीदें थी, अब 2024 लोकसभा चुनाव में उम्मीदें हैं। तभी तो बीबीसी ने चुपके से अपनी वेबसाइट पर राहुल गाँधी की प्रोफाइल में उनकी वापसी की तारीख़ बदल दी।

पहले उन्हें 2019 लक्ष्य था, अब 2024 लोकसभा चुनाव को उनके लिए वास्तविक लक्ष्य रखा गया है। एग्जिट पोल्स आने के बाद बीबीसी को भी पता चल गया है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाला राजग पूरी ताक़त के साथ केंद्र में वापसी कर रहा है। अतः, उसने अपनी उम्मीदों की नई समयसीमा तय कर दी। इतना ही नहीं, इस प्रोफाइल में राहुल गाँधी के बारे में और भी कई अन्य रोचक चीजें हैं, जिन्हें जानकार आप थोड़ा-सा मनोरंजनात्मक लुत्फ़ उठा सकते हैं।

राहुल गाँधी को बीबीसी ‘डार्क हॉर्स’ बताता है। उन्हें उम्मीद भी है कि कभी न कभी तो ये घोड़ा दौड़ेगा ज़रूर। लेकिन, यहाँ कुछ ऐसे विशेषज्ञ भी हैं, जिन्होंने बीबीसी को राहुल गाँधी के बारे में कुछ ऐसा बताया है, जो हमें या आपको नहीं पता। बीबीसी के अनुसार, राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा है कि राहुल गाँधी के पास व्यापक राजनीतिक समझ है। जिन्होंने राहुल को बोलते देखा है, उनके भाषण और इंटरव्यू वगैरह से जो एक बार भी गुजरा है, उसे पता है कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के पास कितनी विस्तृत और व्यापक राजनीतिक समझ है। विशेषज्ञों ने उन्हें बैकरूम से ऑपरेट करने वाला नेता बताया। अनाम विशेषज्ञों के हवाले से और भी बहुत कुछ लिखा जा सकता था लेकिन गनीमत यह कि बीबीसी इतने पर ही रुक गया।

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कॉन्ग्रेस में अहमद पटेल बैकरूम से ऑपरेट करते रहे हैं। भाजपा में ये भूमिका अरुण जेटली निभाते आ रहे हैं। लेकिन, राहुल गाँधी के बारे में बैकरूम ऑपरेटर होने की नई बात शायद ही किसी को पता हो। ये भी अच्छा है। कुछ ऐसी तारीफ़ करने की रणनीति में भी दम है क्योंकि इसे कोई देखने नहीं जा सकता। अगर वे लिखते कि ‘राहुल अच्छे वक्ता हैं’ या ‘अच्छा भाषण देते हैं’, तब सबकुछ लोगों के सामने आ जाता। लेकिन, उन्हें ‘Practiced Backroom Operator’ बताकर बीबीसी ने एक ऐसी दक्षता की बात की, जिसका सबूत देने की ज़रूरत ही नहीं है।

इसके अलावा प्रोफाइल में राहुल गाँधी को राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस की सफलता का क्रेडिट भी दिया गया है। हाँ, उनकी अध्यक्षता में किन राज्यों में कॉन्ग्रेस को हार मिली है, इसकी चर्चा करनी ज़रूरी नहीं समझी गई है। बस एक लाइन में लिखा गया है कि कॉन्ग्रेस की स्थिति तो पहले से ही डाँवाडोल थी, कुछ राज्यों में हार मिली। मंद अर्थव्यवस्था, नोटबंदी, राफेल, असहिष्णुता और रोज़गार पर राहुल द्वारा सोशल मीडिया पर लगातार पूछे गए सवालों को उनके स्मार्ट चुनाव प्रचार अभियान के रूप में देखा गया है। शायद बीबीसी ही इसका जवाब दे पाए कि जिन मुद्दों पर राहुल ट्विटर पर सर्वज्ञानी बन जाते हैं, उन्हीं मुद्दों पर इंटरव्यू और भाषणों में उनके पास जवाब क्यों नहीं होते।

जैसे, राफेल पर उन्होंने ट्विटर पर कई सवाल पूछे, वहाँ उन्हें राफेल की सर्विस और उपकरणों सहित सभी चीजों के मूल्य पता होते हैं, उन्हें अदालत द्वारा सुनाए गए निर्णयों के छोटे से छोटे विवरणों की भी जानकारी होती है, लेकिन इंटरव्यू के दौरान वह वायुसेना से पूछने की बात करते हैं और कहते हैं कि उनके पास details नहीं है। सोशल मीडिया पर सर्वज्ञानी और कैमरे के सामने डिटेल्स पता नहीं होना- ये दोनों ही बातें विरोधाभाषी हैं और बीबीसी को इन्हीं में स्मार्टनेस की गूँज सुनाई दे जाती है।

इससे भी ज्यादा बीबीसी ने प्रियंका की तारीफ़ों के पुल बाँधे हैं। प्रियंका ने आज तक अपनी लोकप्रियता साबित नहीं की है, एक भी चुनाव नहीं जीता है, अपनी देखरेख में पार्टी को भी एक भी चुनाव नहीं जितवाया है, फिर भी बीबीसी उन्हें चमत्कारिक और लोकप्रिय बताता है। प्रियंका ने कौन सा चमत्कार किया है और उनकी लोकप्रियता का पैमाना क्या है, ये तो शायद बीबीसी उनके लिए 2029 का लक्ष्य तय कर के ही बता सकता है। प्रियंका ‘Popular & Charismatic’ हैं- किनके बीच हैं, किस क्षेत्र में हैं, इस बारे में कोई ख़ास जानकारी नहीं दी गई है। बस विशेषण ठूँस दिए गए हैं।

बीबीसी ने ठीक लिखा है कि चुनाव प्रचार अभियान के मामले में राहुल गाँधी ने इस बार ख़ासी मेहनत की है। जहाँ पीएम मोदी ने इस लोकसभा चुनाव के चुनाव प्रचार अभियान के दौरान 144 रैलियाँ की, राहुल 125 रैलियों के साथ ज्यादा पीछे नहीं रहे। अगर इतने के बाद भी कॉन्ग्रेस की बुरी हार हो रही है (एग्जिट पोल्स के अनुसार), तो ज़िम्मेदारी किसकी बनती है? क्या इसके बाद बीबीसी एक लेख लिखेगा, जिसमें कॉन्ग्रेस अध्यक्ष को कॉन्ग्रेस की विफलता के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा? वो भी उस दौर में, जब एक पंचायत चुनाव हारने को सीधा पीएम की लोकप्रियता कम होने से जोड़ दिया जाता है।

बीबीसी की हमेशा से आदत रही है कि उसने राहुल गाँधी के मामले में ‘Nepotism’ या वंशवाद को ‘Royalty’ या राहुल को ‘Royal Scion’ कहा है। ऐसे शब्द इसीलिए चुने जाते हैं, ताकि राहुल को और ‘Glorify’ किया जा सके। चूँकि बीबीसी ऐसे फैंसी अंग्रेजी शब्द चुनता है, इसीलिए हमनें यहाँ अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग किया। मोदी के ख़िलाफ़ बीबीसी द्वारा चलाया जा रहा दुष्प्रचार अभियान किसी से छिपा नहीं है। हाल ही में गिरोह विशेष के अन्य मीडिया संस्थानों का अनुसरण करते हुए बीबीसी ने भी एक लम्बी-चौड़ी रिपोर्ट के माध्यम से समझाया कि कैसे ‘मोदी के भारत’ में मुस्लिमों को डर लग रहा है और उनके पूरे मज़हब पर ही आक्रमण किया जा रहा है। इस रिपोर्ट में विश्लेषकों के नाम पर अरुंधति रॉय जैसे प्रोपेगंडाबाज़ों की राय ली गई थी।

अगर मोदी के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार करना है तो उनके विरोधी, जैसे कि राहुल गाँधी का महिमामंडन तो करना ही पड़ेगा, भले ही उनकी सफलता का वास्तविक लक्ष्य 2029 से होकर 2034 ही क्यों न पहुँच जाए। कभी बीबीसी की रिपोर्ट में प्रियंका को कॉन्ग्रेस का ‘Mythical Weapon‘ बताया जाता है तो कभी मीडिया द्वारा राहुल को नकारात्मक अटेंशन देने को लेकर नाराज़गी जताई जाती है। इससे पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल भी अपने ‘क्रन्तिकारी’ दौर में मीडिया के लाडले रह चुके हैं लेकिन राहुल पर लम्बे समय तक दाँव खेलना ज्यादा सुरक्षित है क्योंकि वो एक स्थापित पार्टी के नेता हैं। उसी पार्टी के, जिसमें वंशवाद मीडिया के लिए रॉयल्टी हो जाता है।

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