‘हैकरमैन अर्थशास्त्री’ ने दी नोट छापकर जनता में बाँटने की राय, मैग्सेसे विजेता ने कहा- सहमत दद्दा

असल में, नोट छापने और उसे लोगों में बाँट देने की यह सारी चर्चा सरकार द्वारा RBI से लिए गए 1.76 लाख करोड़ रुपए लाभाँश और सरप्लस पूँजी के तौर पर देने के बाद चालू हुई है। इसलिए रवीश कुमार का फर्ज तो बनता ही है कि वो इस फैसले को सनसनी बनाकर अपनी प्रासंगिकता जनता के बीच कायम रख सकें।

भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर मीडिया और सोशल मीडिया पर चर्चा गरम है। इसी बीच खुदको पत्रकार मानने वाले अनिंद्यों चक्रवर्ती और एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार के बीच अर्थव्यवस्था पर एक गहरी चर्चा सामने आई है जिसमें वो अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए कुछ ‘अचूक उपाय’ एक दूसरे से साझा करते हुए नजर आ रहे हैं।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रही इस वीडियो क्लिप में पत्रकार अनिंद्यो चक्रवर्ती रवीश कुमार को समझा रहे हैं कि यदि सरकार खूब सारे रुपए छापकर जनता में बाँट दे तो अर्थव्यवस्था तुरंत ठीक हो सकती है। इस पर रवीश कुमार भी अपनी सहमति दर्ज कराते नजर आए रहे हैं। बता दें कि हाल ही में रवीश कुमार को प्रतिष्ठित रैमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

इस वार्ता में अनिंद्यो चक्रवर्ती कह रहे हैं- “सरकार को खुदको एक परिवार के रूप में सोचना चाहिए। जैसे एक परिवार को उतना ही खर्चा करना चाहिए, जितनी कि उस परिवार की आय है।” इसके बाद बेहद गंभीर हाव-भाव में अनिंद्यो चक्रवर्ती कहते हैं – “लेकिन परिवार नोट नहीं छापती (नोट नहीं छापता) है ना, सरकार तो नोट छापती है। इसलिए सरकार को सिर्फ नोट छापने चाहिए। ज्यादातर अर्थशास्त्री आपसे कहेंगे कि इससे कुछ नहीं होता। जी होता है।”

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इसके बाद महान अर्थशास्त्री अनिंद्यो चक्रवर्ती एक उदाहरण के द्वारा इस तर्क को साबित करते हुए कहते हैं- “गाड़ी बनाने की फैक्ट्री बंद हैं क्योंकि लोगों के पास पैसे नहीं हैं खरीदने के लिए।”

इसके बाद अनिंद्यो चक्रवर्ती कालजयी बात कहते हैं- “अगर सरकार लोगों के हाथ में जाकर नोट छापकर पैसे दे दे तो वो जाकर खरीदेंगे।”

अनिंद्यो चक्रवर्ती के इस कालजयी बयान के बाद रवीश कुमार मंद-मंद मुस्कराते हुए अपनी सहमति जताते हुए कहते हैं- “कमाल है।”

अनिंद्यो चक्रवर्ती इसके बाद अपनी राय आगे रखते हुए हाथ झटकते हुए कहते हैं कि लोग इसका मतलब यह लगा लगा लेते हैं कि लोगों के हाथ में पैसे दे देने से महँगाई बढ़ जाएगी, जबकि कभी-कभी ऐसा होता है कि जब आप लोगों के हाथ में पैसे देते हैं, तो दाम बढ़ते नहीं बल्कि घटते हैं। रवीश कुमार यह सब सुनने के बाद अपने परिचित अंदाज में कहते सुने जा सकते हैं- “हम्म्म।”

हालाँकि, महान अर्थशास्त्री अनिंद्यो चक्रवर्ती शायद ये बात न जानते हों लेकिन सत्यान्वेषी पत्रकार रवीश कुमार इस बात पर कई बार ब्लॉग लिख चुके हैं। आखिरी बार उन्होंने नोट की छपाई पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सम्बन्धित एक लेख लिखा था। जिसे पढ़ने के बाद मैं यह मानकर चल रहा हूँ कि शायद वे जानते होंगे कि नोट कि छपाई उतनी आसान नहीं है जितनी गंभीरता से अनिंद्यो चक्रवर्ती के साथ मिलकर वो आज इस पर सहमति जता रहे हैं।

रवीश द्वारा ही लिखा गया एक ब्लॉग NDTV की वेबसाइट पर प्रकाशित है। हालाँकि, ब्लॉग किसने और कब लिखा यह रहस्य है लेकिन लेख की भाषाशैली, अनुभव का जिक्र और दिए गए Tag यही बताते हैं कि यह अनुभव रवीश कुमार ने ही लिखा है।

इस पूरे लेख में रवीश कुमार ने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा जालसाजी से बचने के लिए भारत में ही नोट छापने की बात को ‘सुखद अनुभव’ बताते हुए नोट छपाई की पूरी प्रक्रिया के बारे में लिखा है। इसलिए मैं मानकर चल रहा हूँ कि यह वार्ता और रवीश द्वारा जताई गई सारी सहमति मात्र ‘महान अर्थशास्त्री’ अनिंद्यो चक्रवर्ती का मन रखने भर के लिए ही रही होगी। वरना नोट छापकर उन्हें जनता में बाँट देने के के फायदे और नुकसान हो सकते हैं, यह रवीश कुमार ने अपने ब्लॉग में खूब समझाया है।

दूसरी बात यह भी हो सकती है कि रवीश कुमार ने यह ब्लॉग साल 2014 में चुनाव परिणाम के कुछ ही दिन बाद लिखा होगा। हालाँकि, इससे असहमत होने के लिए उनके हर लेख के अंत में एक अस्वीकरण हमेशा रहता ही है कि इस लेख की जिम्मेदारी किसी की भी नहीं है।

असल में, नोट छापने और उसे लोगों में बाँट देने की यह सारी चर्चा सरकार द्वारा RBI से लिए गए 1.76 लाख करोड़ रुपए लाभाँश और सरप्लस पूँजी के तौर पर देने के बाद चालू हुई है। इसलिए रवीश कुमार का फर्ज तो बनता ही है कि वो इस फैसले को सनसनी बनाकर अपनी प्रासंगिकता जनता के बीच कायम रख सकें। इसीलिए तो सुप्रीम कोर्ट भी आजकल ‘पीत पत्रकारिता अवार्ड‘ बाँट रही है।

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