मुर्शिदाबाद हत्याकांड: बंधु प्रकाश हम शर्मिंदा हैं…

बंधु प्रकाश की मौत सारे ही गलत कारणों से, गलत जगह पर हुई। इसीलिए मीडिया को, एक रसीद की खातिर, एक पहली बार अपराध कर रहे कातिल द्वारा प्रोफेशनल तरीके से की गई हत्या, लाश के पास पासबुक छोड़ने की बात, छः दिनों की चुप्पी, साँतवे दिन सीधा कातिल को दबोच लेने की बात एकदम सामान्य लग रही है।

सप्ताह भर पहले, दशहरा के दिन, बंगाल को मुर्शिदाबाद इलाके में बंधु प्रकाश पाल, उनकी सात माह की गर्भवती पत्नी, तथा आठ साल के बेटे की धारदार हथियार से हत्या कर दी जाती है। हिन्दी मीडिया में खबर नहीं आती। सोशल मीडिया पर तस्वीरें घूमने लगती हैं। हिन्दी मीडिया इस खबर को एक मामूली अपराध की तरह उठाती है, तीन सौ शब्दों की रिपोर्टिंग होती है, मुद्दा खत्म कर दिया जाता है। लेकिन सोशल मीडिया इसे खत्म होने नहीं देता।

जो सवाल मीडिया को उठाना चाहिए था, वो सवाल सोशल मीडिया पर उठने लगे। कत्ल के निर्मम तरीके से ले कर इलाके की जनसांख्यिकी के बारे में बातें होने लगीं। बंगाल का वर्तमान और ममता काल में हुई राजनैतिक, मजहबी और कानून व्यवस्था पर थूकती हत्याओं पर बात होने लगीं। मीडिया चुप्पी साधे रहा क्योंकि किसी परिवार के तीन व्यक्ति और एक अजन्मे बच्चे की हत्या, पूरे शरीर पर लम्बे-लम्बे चीरे के साथ, हलाल की हुई गर्दन, एक सामान्य घटना है। वहाँ चुनाव भी नहीं, न ही वो एक खास पार्टी द्वारा शासित है कि आधे घंटे का भी स्पेशल चले कि हत्या की वजह क्या रही होगी।

जी हाँ, स्पेकुलेशन भी नहीं हुआ कि क्या-क्या हो सकता है। आम तौर पर किसी कार्यक्रम में किसी नेता की शिरकत हो तो मीडिया यह भी बताती है कि गाड़ी कहाँ तक आएगी, किधर छोड़ेगी, पहला पाँव दाहिना होगा, कमांडो चारों तरफ देख कर सुनिश्चित करेंगे, कार्पेट का रंग ये होगा, उनके लघुशंका की व्यवस्था कहाँ होगी… नेता जी को जाना हो या न हो, मीडिया आपको कमोड तक दिखा देगा, यूरिनल तक घुमा देगा ताकि आप महसूस कर सकें।

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इस हत्याकांड में ऐसा नहीं हुआ। हत्या के बाद सोशल मीडिया उबलता रहा, सवाल पूछता रहा और रिपोर्टिंग की खानापूर्ति के बाद मेनस्ट्रीम मीडिया सोया रहा। आप सोचिए कि ये हत्याकांड टीवी पर नहीं दिखा, पेपरों में मुख्य खबर नहीं बन सका, इस पर पुलिस क्या कर रही है, क्राइम बीट रिपोर्टरों ने कोई कोशिश नहीं की जानने की, सम्पादकीय पन्नों पर यह नहीं पूछा गया कि ममता के बंगाल में क्या हो रहा है। कोई ज़रूरत समझी ही नहीं गई क्योंकि हुआ ही क्या है! एक आदमी मरा, उसकी पत्नी मरी, पेट का बच्चा मरा, छोटा बेटा मरा। हुआ ही क्या है!

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और एक दिन अचानक सारी गुत्थी सुलझ गई

कल खबर आई कि बंगाल सीआईडी ने केस को क्रैक कर लिया है, कातिल पकड़ा जा चुका है। मीडिया ने फिर से अपना धर्म निभाया। तीन सौ शब्दों की रिपोर्ट बनी और खानापूर्ति हो गई कि भाई, मुख्य आरोपित न सिर्फ पकड़ा गया बल्कि उसने आरोप कबूल भी कर लिया। आप कहेंगे कि समस्या क्या है, जब कातिल पकड़ लिया गया तो आगे क्या?

समस्या है। समस्या आधिकारिक रूप से जारी की गई कहानी में है जो कई सवाल खड़े करता है। बताया गया, और मीडिया द्वारा गर्दन झुका कर लिखा गया, कि एक मिस्री है उत्पल बेहरा, जिसने बंधु प्रकाश से बीमा कराया था। एक बीमा की रसीद बंधु प्रकाश ने दे दी, दूसरी नहीं दी जो कि ₹24,000 का था। वो माँगने गया, बंधु प्रकाश ने उसकी बेइज्जती कर दी, धमकी दी। बेहरा अपने घर आया और उसने तय किया कि उसकी जान ले लेगा।

उसने एक बड़ा चाकू लिया और दीवार फाँद कर मृतक के घर में दाखिल हुआ। वहाँ उसने उन तीनों को मार डाला। उसके बाद वहाँ से वो भाग निकला, उसे भागते हुए एक ग्वाले ने देखा था, जिसकी मदद से पुलिस ने स्केच बनवाया। साथ ही सीआईडी ने बताया कि लाश के पास कातिल ने अपना पासबुक छोड़ दिया था, जो कि हत्याकांड को सुलझाने में अहम साबित हुआ।

अब आप थोड़ा सोचिए कि जब पुलिस के पास पासबुक पहले दिन से ही था, तो क्या उस पासबुक में कातिल का नाम, फोटो, अकाउंट नंबर आदि नहीं रहे होंगे जो उसे स्केच बनवाना पड़ा? इतने दिनों तक पुलिस इस केस पर कुछ भी बोलने से क्यों बचती रही क्योंकि हमने तो अपनी तरफ से काफी कोशिश की थी इस पर विस्तार से जानने की। हो सकता है वो स्केच बनवाने में व्यस्त रहे हों, या पासबुक पर ब्राह्मी लिपि में नाम लिखा हुआ हो तो उसे डिसाइफर कराने में समय लग रहा हो।

यह भी सोचिए कि जो व्यक्ति मारने की नीयत से चाकू ले कर, दीवार फाँद कर घुस रहा है, योजना बना कर आया हो, वो जेब में पासबुक ले कर तो जाएगा ही, क्योंकि कातिल ने सोचा होगा कि हर कातिल से गलती होती है, सुराग नहीं छोड़ने पर उसे कोई गम्भीरता से नहीं लेगा। और फिर पासबुक लाश के पास मिल जाती है, उसके बाद सात दिन लगते हैं पुलिस को उस नाम के व्यक्ति को पकड़ने में। केस सॉल्व!

इस बात को भी रहने दीजिए। अब आप कातिल के बारे में सोचिए कि क्या एक व्यक्ति लगातार एक बड़े चाकू से वार करेगा, तीन लोगों की हत्या होती है, एक आदमी करता है, कोई चीखने की आवाज तो आई होगी? या ऐसा तो नहीं कि कातिल ने बेहोशी की दवा सुँघा दी हो और फिर आराम से गला रेता, हाथ पर चाकू चलाया, चेहरे पर चाकू चलाया, शरीर पर चलाया और चलता बना?

साथ ही, ध्यान रहे कि हत्यारा कोई अपराधी नहीं था। पहली बार में इतनी सफाई से काम किया। एक मिस्त्री है उत्पल बेहरा, रसीद नहीं मिलती है बीमा की (कुछ जगह चिटफंड कह रहे हैं) और वो इतना गुस्सा हो जाता है कि पति, गर्भवती पत्नी और बच्चे की हत्या कर देता है! सवाल यह भी उठता है कि क्या कोई पहली बार अपराध कर रहा हो, इस क्रूर तरीके से कर रहा हो, और उसकी जड़ में एक रसीद का न देना हो, क्या ये विश्वसनीय दलील है?

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कड़े सवाल पूछने वाले आलू दम के दही में मिल जाने पर लिख रहे हैं

गम्भीर हो कर कहते हैं कि संजय ने घोटाला किया नहीं, संजय की मौत हो गई। ऐसा नहीं है कि मैं संवेदनहीन व्यक्ति हूँ लेकिन जिस जस्टिस लोया की मौत का कोरस आज भी रवीश कुमार गा लेते हैं, और बात-बात पर उनके समर्थक ‘मेले बाबू ने नौतली थिलीद की’ (मेरे बाबू ने नौकरी सीरीज की) कह कर अघाते नहीं, उनके लिए ये हत्याकांड खबर क्यों नहीं है? अखलाख, गौरी लंकेश, से ले कर तबरेज तक उन्होंने कई प्राइम टाइम किए हैं, कई बार वकील, इन्सपेक्टर और पता नहीं जज तक बन गए हैं, वो बंगाल के मामले पर उसे बांग्लादेश क्यों मान लेते हैं?

रवीश कुमार बंगाल पर हमेशा चुप रहे हैं। हमेशा का मतलब है, हमेशा। जब सोशल मीडिया पर लोगों ने खूब कोसा, तब जा कर चार लाइन निकला था कि ये गलत हो रहा है। लेकिन ममता का नाम, ममता की पुलिस का नाम नहीं ले पाए थे रवीश कुमार। क्या 81 भाजपा कार्यकर्ताओं की मौत रवीश कुमार के लिए खबर नहीं है? तृणमूल के भी कार्यकर्ता मारे गए हैं, तो बंगाल की कानून व्यवस्था खबर क्यों नहीं है?

ज्ञान देते हुए हर चैनल को एक ही चलनी में छान देने वाले रवीश बिहार और बंगाल की बेकार कानून व्यवस्था पर चुप क्यों हो जाते हैं? क्या बिहार में कोई परिचित फँसा हुआ है किसी केस में कि इधर नीतीश को घेरेंगे, उधर वो जेल पहुँचेगा? बंगाल में ऐसा क्या रह गया है रवीश कुमार का कि पीएमसी बैंक, अभिजीत बनर्जी के लिए चालीस मिनट हैं, लेकिन बंधु प्रकाश पाल के परिवार की नृशंस हत्या पर कुछ भी नहीं? आकाश गुलाबी है कि नीला, आलू दम का रस पसर कर दही में मिलने की बात, महान अर्थशास्त्री अनिंद्यो की गूढ़ बातें करने, कहाँ टीचर की स्ट्राइक हो रही है, रविशंकर प्रसाद ने क्या कहा, सब मिलेगा रवीश कुमार की वाल पर, बंधु प्रकाश पाल नहीं मिलेगा।

राजनैतिक और मजहबी एंगल भी निकाल दिया जाए, निजी दुश्मनी ही मकसद था और उत्पल बेहरा ने ही हत्या किया, तब भी इस हत्याकांड पर चर्चा क्यों नहीं हो रही? फिर जब सोशल मीडिया पर इन नैरेटिव बनाने वाले, बिके हुए पत्रकारों को कमेंट में गालियाँ पड़ती हैं, लोग सीधे सवाल पूछते हैं तो पत्रकार शिरोमणि चिटक जाते हैं, कहते हैं कि अरे-अरे, तुम लोग सब आईटी सेल वाले हो न, सब ट्रोल हो!

जब नीरव मोदी को नरेन्द्र मोदी के साथ तस्वीर में देख कर संबंध तय किए जा सकते हैं, तो फिर इस हत्याकांड को केन्द्र में रख कर, बंगाल में हुए दंगे जो बर्धमान, धूलागढ़, कालियाचक (मालदा), इल्लमबाजार, हाजीनगर, जलांगी, मिदनापुर, पुरुलिया, रानीगंज, मुर्शीदाबाद, आसनसोल से ले कर बंगाल के लगभग हर जिले तक पहुँच गए, इस पर कोई प्राइम टाइम क्यों नहीं हो रहा? आपको सीरीज चलाना है, चलाइए लेकिन बंगाल के मामले में इतनी ममता क्यों दिखाते हैं आप?

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बंधु प्रकाश अगर बिलाल होता, बंगाल अगर गुजरात होता

बंधु प्रकाश गलत राज्य में पैदा हुआ, गलत जाति-धर्म का था, गलत राज्य में मारा गया। जैसे भारत यादव गलत राज्य में, गलत जाति-धर्म में पैदा हुआ, गलत लोगों के द्वारा मारा गया। मरने के बाद की चर्चा में बने रहने के लिए आपको निर्दोष होना मात्र ‘सही’ नहीं होता। आपको किसी खास जाति में होना होता है, किसी खास मजहब में होना होता है, किसी खास तरह के हत्यारे का शिकार बनना पड़ता है, और सबसे ज़रूरी वहाँ सत्तारूढ़ पार्टी कौन सी है, इसका भी असर पड़ता है।

बंधु प्रकाश हिन्दू था, ममता बनर्जी की सत्ता है, बंगाल राज्य में मारा गया, मारने वाले ने भी उसे इस बात पर नहीं मारा कि वो गाय का मांस खाया करता था। बंधु प्रकाश अगर गोमांस भी खाता होता, तो ममता स्वयं उसकी मौत पर ट्वीट करती, और बताती कि बंधु प्रकाश को मारने वाले भले ही उसके राज्य के लोग हैं, जहाँ उसी की पुलिस है, लेकिन जिम्मेदार मोदी है। तब बंधु प्रकाश हीरो बन जाता, उसके नाम पर केरल में बीफ ईटिंग फेस्टिवल का आयोजन होता, वो लिबरल गिरोह का पोस्टर ब्वॉय बन जाता, जेएनयू में उसकी माताजी को स्टूडेंट यूनियन में आख्यान देने बुलाया जाता…

लेकिन बंधु प्रकाश की मौत सारे ही गलत कारणों से, गलत जगह पर हुई। इसीलिए मीडिया को एक रसीद की खातिर, एक पहली बार अपराध कर रहे कातिल द्वारा प्रोफेशनल तरीके से की गई हत्या, लाश के पास पासबुक छोड़ देने की बात, छः दिनों की चुप्पी के बाद, साँतवे दिन सीधा कातिल को दबोच लेने की बात एकदम सामान्य लग रही है।

इसलिए, आइए और गर्दन शर्म से झुका लीजिए कि एक के बाद एक, ऐसे ही भारत यादव, अंकित सक्सेना, प्रशांत पुजारी, डॉक्टर नारंग आदि की हत्या होती रहेगी, हमारा मीडिया श्रीदेवी के बाथटब की तलाशी लेता रहेगा, राहुल गाँधी की मूर्खतापूर्ण बातों पर गम्भीरता से चर्चा करता रहेगा, मोदी जी की रैलियों की लाइव कवरेज के बाद उस पर स्पेशल प्रोग्राम बनाता रहेगा… ये सब भी ज़रूरी हैं, लेकिन इस हत्याकांड का गायब हो जाना, एक व्यवस्थित तरीके से इसका मीडिया ब्लैकआउट बताता है कि इस चमकीले प्रतिबिंब बनाने वाले शांत जल की तलछट में सड़ांध मारता कीचड़ है, जिसमें किसी को हाथ मारने की ज़रूरत है, पानी कितना साफ है यह पता चल जाएगा।

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