कश्मीर में पंडित सुरक्षित है और मुसलमान आतंक में हैं: भारतीय मीडिया की पाक अकुपाइड पत्रकारिता

ये एक स्थापित सत्य है कि एक ख़ास शांतिप्रिय समुदाय की आबादी जहाँ भी बहुसंख्यक है, चाहे वो कश्मीर हो, पाकिस्तान हो, बंग्लादेश हो, या फिर कैराना या मेरठ, अल्पसंख्यकों का जीना हराम कर देती है। लोग घरों पर 'यह मकान बिकाऊ है' लिख कर निकल जाते हैं।

फातिमा इतनी छोटी है कि उसे पता भी नहीं कि कश्मीर में क्या हो रहा है। वो अपने भाई मूसा से बात नहीं कर पा रही। उसके भाई ने कहा था कि इस बार ईद में आएगा तो उसके लिए गुब्बारे ले कर आएगा। फातिमा हर आहट पर बार-बार दरवाजे तक जाती है और लौट आती है कि शायद मूसा आया होगा। अम्मी और अब्बू जानते हैं कि फोन बंद हैं, और बिटिया इतनी छोटी है कि उसे समझाया नहीं जा सकता कि अनुच्छेद 370 के क्या मायने हैं। वो मासूम यह नहीं जानती कि उसका स्कूल कब खुलेगा, वो वहाँ कब पढ़ने जाएगी और उसके डॉक्टर बनने का सपना कब पूरा होगा।

ये एक फर्जी ‘दुख भरी कहानी’ है जो आपको नाम बदल कर हर पाक अकुपाइड पत्रकार लिखता मिलेगा। ये न लिख पाए, तो दस लोगों का नाम लिख कर यह बताता मिलेगा कि ‘स्थानीय कश्मीरी नवयुवक ने बताई अपनी व्यथा’। वो सारे नवयुवक फर्जी होते हैं, जैसे कि इन लिबरपंथियों का पूरा नैरेटिव है। उन्हें तैयार किया जाता है बोलने के लिए।

ऐसी दुख भरी कहानियों का इस्तेमाल ट्रैफिक वालों के चालान से बचने के लिए बहुत लोग करते हैं। ऐसी कहानी आपको भावुक ज़रूर कर देगीं, लेकिन वो पूरे समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। जिस देश में 95% लोग या तो गरीब हैं, या बहुत गरीब, वहाँ आपको ऐसे दस करोड़ परिवार मिल जाएँगे जिनके सामने दैनिक जद्दोजहद से ले कर शिक्षा, स्वास्थ्य और घर की छत जैसी समस्याएँ होती हैं। सवा अरब जनसंख्या वाले गरीब देश में ये एक सच्चाई है लेकिन इसे ऐसे सामने लाना, जैसे ऐसे बस दस ही परिवार हैं, और उन्हें सरकार सता रही है, बताता है कि कुछ लोगों की पत्रकारिता बियॉन्ड रिपेयर हो चुकी है।

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पत्रकारिता का समुदाय विशेष इस तरह के इंतजाम नेहरू घाटी सभ्यता की शुरुआत से ही करता आ रही है। ‘सूत्रों के हवाले से’ लिख कर इन्होंने इतना मूत्र विसर्जन किया है कि लोगों को इस गिरोह के पोर्टलों से ज्यादा विश्वास व्हाट्सएप्प पर फॉरवर्ड होने वाले मीम पर होने लगा है। पाक अकुपाइड पत्रकारों के गिरोह ने पिछले कुछ सालों में एक ही पक्ष की बड़ाई और एक ही पक्ष की बुराई में जितनी सक्रियता दिखाई है, वो अतुलनीय है।

पिछले दिनों ‘फैक्ट फाइंडिंग टीम’ के नाम पर लम्पट पत्रकारों और एक्टिविस्टों का एक गिरोह कश्मीर गया था। कश्मीर का मतलब क्या है, वो वही जानें, क्योंकि इनके लेख और विडियो में कई गड़बड़ियाँ हैं। पहली बात तो यह है कि जिस राज्य का बँटवारा हुआ उसमें जनसाँख्यिकी के हिसाब से मुस्लिम बहुल कश्मीर, बौद्ध बहुल लद्दाख और हिन्दू बहुल जम्मू आते हैं। तो सिर्फ कश्मीर जा कर लोगों से पूछना कि उनकी क्या राय है, बताता है कि आपने निष्कर्ष पहले से ही तय कर दिया है और बाद में अपनी जासूसी कहानी बना रहे हैं।

एक विडियो शेयर किया गया है जिसमें लोगों के पैर दिख रहे हैं, और वो कह रहे हैं कि मोदी का इतना खौफ है कि वो चेहरा नहीं दिखाना चाह रहे। ये आइडिया बहुत सही है क्योंकि आप किसी भी चार आदमी से कुछ भी बुलवा कर पूरे जम्मू-कश्मीर-लद्दाख के लोगों का प्रतिनिधित्व करवा सकते हैं। ये आइडिया ज्यादा से ज्यादा क्यूट कहा जा सकता है, तार्किक तो ये बिलकुल नहीं है।

पत्रकारिता में सिर्फ एक पक्ष को दिखाना ही सही नहीं होता। अपनी सहूलियत के हिसाब से आप चार जगह जाते हैं, जो कि घोषित रूप से आंतक ग्रस्त हैं और अलगाववाद की आवाज वहीं से सबसे ज्यादा उठती रही है। सरकार का फैसला भी इलाके को अलगाववाद और आतंक से मुक्त करने को लिए है। जाहिर है कि ऐसे इलाके में आपको आपके मन के लायक दसियों लोग बयान देते मिल जाएँगे।

लेकिन, जिस इलाके में ये लोग गए गए हैं वहाँ के नवयुवक तो हजारों की संख्या में आतंकियों के जनाजे में शामिल होते हैं, पत्थरबाजी करते हैं, और चेहरा दिखाने में बिलकुल संकोच नहीं करते। फिर अपनी बात कहने का मौका ये लोग कैसे छोड़ रहे हैं? ये तो आजादी के परवाने हैं न, तो कैमरे पर आ कर पूरी दुनिया को अपनी बात बताने में डर गए? इसका मतलब तो यही है कि भारतीय सेना देशविरोधी आतंकियों के खिलाफ अपने अभियान में सफल हो रही है क्योंकि ये वही इलाके हैं जहाँ आतंकी की लाश देख कर बाप बोलता है कि और बेटे होते तो उसे भी शहीद कर देता।

ये कुछ नहीं है, बस जहर भरने की कोशिश है। कश्मीर का मसला अव्वल तो सिर्फ चार जिले के मुसलमानों का मसला नहीं है। अगर उनके भी हिसाब से देखें तो पूर्व राज्य के तीनों भूभागों, जम्मू, कश्मीर, लद्दाख, के लोगों से राय ली जानी चाहिए न कि दस-पचास आतंकियों या अलगाववादियों को पकड़ लाए और कहा कि हम तुम्हारे चप्पल पर कैमरा रखेंगे, तुम बोलते रहो। ये सब भावनात्मक उबाल लाने के लिए सही लगता है, लेकिन इसे पत्रकारिता तो बिलकुल नहीं कहते।

कश्मीर का मसला या मुसलमानों का मसला?

आप इस गैंग की ताकत देखिए कि ये वाशिंगटन पोस्ट में नैरेटिव छापने से लेकर लंदन स्थित भारतीय दूतावास तक में सैकड़ों मुसलमानों की भीड़ ले आते हैं। और जब मुसलमानों की भीड़ जमा होती है तो आपको पता ही क्या होता है: पत्थरबाजी। चूँकि हर जगह पत्थर उपलब्ध नहीं होते तो लंदन में जुटे मुसलमानों ने अंडे, पानी की बोतल और बाकी चीजों को भारतीय स्वतंत्रता दिवस के आयोजन पर फेंकने का निर्णय लिया।

इसलिए, यह बात कश्मीर की रहने ही नहीं दी गई। यह बात मुसलमानों की बना दी गई है। इस बात पर व्हाइट हाउस के बाहर किसी मुसलमान की ईसाई पत्नी हाथ में पोस्टर लेकर पागल हो रही है कि कश्मीर में गलत हो रहा है। ऐसे में, आज के समय में कश्मीर के कुछ हिस्सों के कुछ मुसलमानों से चार बातें कहलवाना मुश्किल नहीं है।

आज किसी को जम्मू के लोगों की आशाओं की बात नहीं करनी, लद्दाख की बात नहीं करनी, कश्मीर में हिन्दुओं का क्या हुआ, इस पर बात नहीं करनी। कश्मीर में दलितों की क्या हालत है, इस पर दलित विचारक भी नहीं बोल रहे। कोई यह बताने में सक्षम नहीं है कि क्या हमारे देश की जियो-पोलिटिकल स्थिति ऐसी है कि हम कश्मीर के चार जिलों के लोगों की राय ले कर उनकी बात मान लें? फिर तमिलनाडु के लोगों को, बिहार के मिथिला के लोगों को, गोवा के लोगों को, मणिपुर के लोगों को भी यही आजादी दे दी जाए?

लम्पट मंडली कहेगी कि ‘हाँ, दे दी जाए’। ये हमेशा चिल्लाते हैं कि भारत राष्ट्र नहीं, संघ है। जैसे कि ऐसा बोलने से वास्तवकिताएँ बदल जाती हैं। संघ तो अमेरिका भी है, वो हमसे बड़ा भी है, विकसित भी है, विविध भी है। वहाँ तो सब ठीक चल रहा है, फिर यहाँ ‘संघ’ वाली बात ला कर हर बात पर अमेरिका का मुँह ताकने वाले गिरोह के लोग भारत के मामले में इसे ऐसे कैसे देखते हैं कि सारे राज्यों को, हर व्यक्ति को ‘सेल्फ डिटर्मिनेशन’ का अधिकार होना चाहिए।

मेरे ख्याल से वो अधिकार मिला हुआ है। हर राज्य के लोग लोकसभा चुनावों से लेकर पंचायत चुनावों तक अपना मत, यानि अपना विचार, वोट के रूप में प्रकट करते रहे हैं। उन्होंने कभी ऐसी बात नहीं की कि उन्हें भारत का हिस्सा नहीं बनना है। ये ‘भारत एक यूनियन’ है, नक्सलियों और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ वालों की बेहूदी हरकत है, जिसका कोई खरीदार नहीं है।

आजादी दे भी दें तो होगा क्या? एक तरह से कश्मीर तो अलग देश था ही अब तक। वहाँ बाकी देश के लोगों पर तमाम तरह की पाबंदियाँ थीं, अपना कानून था, अपना संविधान और झंडा था। इसका हासिल क्या रहा? आतंकवाद और अलगाववाद जिसे पाकिस्तान हवा देता रहा। जब उस अलगाववाद और इस्लामी आतंक के दंश को भारतीय सेना ने प्रत्यक्ष और भारतीय जनता ने अप्रत्यक्ष रूप से, आतंकी हमलों के रूप में झेला है, तो फिर कश्मीर पर बोलने का हक सिर्फ कश्मीरियों का वैसे भी नहीं रहा।

वहाँ के अल्पसंख्यकों की हालत पर कौन बोलेगा?

कश्मीर को नेहरू की मनमानी से कुछ भी नहीं मिला। इसका लाभ पाकिस्तान ने उठाया और इस्लामी आतंकियों ने हिन्दुओं को वहाँ से भगा कर अपने इरादे जाहिर कर दिए। और इन चिरकुट पत्रकारों की हिम्मत तो देखिए कि ये कश्मीर और जम्मू में बसे दो-एक कश्मीरी पंडितों से पूछ लेते हैं कि वो कैसे रह रहे हैं, और वो अचानक से सारे हिन्दुओं के प्रतिनिधि हो जाते हैं। वहाँ ये लॉजिक नहीं लगाते कि मुसलमानों के बीच बसे दो हिन्दू परिवारों के पास उनके खिलाफ बोलने में कितना डर लग रहा होगा।

ये एक स्थापित सत्य है कि एक ख़ास शांतिप्रिय समुदाय की आबादी जहाँ भी बहुसंख्यक है, चाहे वो कश्मीर हो, पाकिस्तान हो, बंग्लादेश हो, या फिर कैराना या मेरठ, अल्पसंख्यकों का जीना हराम कर देती है। लोग घरों पर ‘यह मकान बिकाऊ है’ लिख कर निकल जाते हैं। तो क्या लद्दाख के बौद्ध लोगों का डर नाजायज है कि जब कश्मीरी आतंकी मुसलमान वहाँ लहसुन-ए-हिन्द चिल्लाकर नारा-ए-अदरक लगाते आएँगे तो उन्हें वहाँ से भाग कर कहीं और नहीं जाना पड़ेगा?

फिर लद्दाख के लोगों की चिंता कौन करेगा? उनके पैरों को दिखाते हुए विडियो कौन बनाएगा कि वो क्या चाहते हैं और वो चेहरा इसलिए नहीं दिखा रहे कि कश्मीर से कुछ आतंकी आएँगे और उनके घर पर बम फेंक देंगे। याद कीजिए कि जस्टिस नीलकंठ गंजू, सब इंस्पेक्टर अमर चंद, पंडित टिकाराम जैसे लोगों को किसने मारा था और क्यों मारा था। इनकी हत्याओं के बाद जब दसियों कश्मीरी पंडितों के हत्या का सिलसिला चला, उसके बाद क्या हुआ ये भी याद दिलाना जरूरी है।

इसलिए, ये मसला कश्मीर का अब रहेगा भी नहीं। ये मसला पूरी दुनिया के मुसलमानों के सर पर फेंका जा रहा है। इसे ऐसे दिखाया जा रहा है जैसे कि ये बात मुसलमानों पर अत्याचार की है जबकि बगल के पाक अधिकृत कश्मीर में क्या हो रहा है, उसकी चिंता इन्हीं मुसलमानों की नहीं है। बात मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार की नहीं है, बल्कि कोई भी विवेकशील व्यक्ति इस निर्णय को कश्मीर के लोगों की बेहतरी का ही मानेगा। हाँ, ये बात और है कि बेहतरी की परिभाषा बदल कर पाँच सौ रुपए के लिए पत्थर फेंकना, और साल भर में आतंकी बन कर सेना की गोलियों का शिकार होना कर दिया जाए, तो वाकई ये निर्णय गलत है।

किस बात की आजादी?

इसलिए, सहूलियत से सैंपल उठा कर, अपने मतलब की बातें बुलवा कर, चार लोगों को पूरे कश्मीर के लिए बोलने वाला नहीं माना जा सकता। उसके लिए चुनाव होंगे, और कश्मीरियों को उसी हिसाब से चलना होगा। वहाँ वो बेशक ऐसे लोगों को वापस चुन लें जिन्होंने अपनी पारिवारिक संपत्ति में वृद्धि जरूर की और अपने परिवार के बच्चों को बाहर पढ़ने को भेजा।

कश्मीरी मुसलमान ये बात तो भूल जाएँ कि उनकी ‘आजाद कश्मीर’ जैसी वाहियात कल्पना को सुना भी जाएगा क्योंकि ये भारत की संप्रभुता पर हमला है। भारत के भीतर कश्मीर है, और कश्मीर में भारत विरोध में उठे स्वर का विरोध हर भारतीय करेगा क्योंकि कश्मीर से जो आता है, वो सिर्फ़ कंबल नहीं होता। वहाँ के रास्ते से मुसलमान आतंकी भी आते हैं, उनके बमों से कश्मीर के मुसलमान नहीं मरते, भारत के हर कोने के लोग मारे जाते हैं।

इसलिए कश्मीर का मसला कश्मीर तक ही सीमित नहीं है। कश्मीर का मसला मुसलमानों का नहीं है इसलिए वो पूरी दुनिया में अपनी बीवियों को दूतावासों और राष्ट्राध्यक्षों के निवास पर बुर्के में पोस्टर ले कर भेजते रहें, उससे होगा कुछ भी नहीं। लंदन वालों को भारत की नहीं सोचनी चाहिए, उन्हें यह देखना चाहिए कि बर्मिंघम के पार्कों में नमाज पढ़ी जा रही है, जो कि लंदन की सड़कों पर भी फैलेगी। तब उसका सामना कैसे करोगे। हम तो कश्मीर संभाल लेंगे। जब 370 के साथ संभाल लिया, तो अब तो हालात बिलकुल बदल गए हैं।

कश्मीर का मसला पूरे भारत का है, और हर भारतीय को उस पर बोलने का उतना ही हक है जितना कश्मीर के लोगों का। और हाँ, भारत का कोई एक हिस्सा आजाद नहीं है, भारत पूरी तरह से आजाद है।

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