साला ये दुःख काहे खतम नहीं होता है बे!

रवीश ने जो गड्ढा खोदना शुरू किया था, और निष्पक्षता से घृणा की पत्रकारिता की ओर रुख़ किया था, वो अब उन्हें अवसाद की ओर ले जा चुका है। अब बस उस अंतिम क्षण का इंतजार है जब यह पत्रकार टूट जाएगा क्योंकि दुनिया इसके हिसाब से नहीं चल रही। जब यह पत्रकार कहेगा कि भले ही भाजपा 41% वोट शेयर से जीत जाए, मैं नहीं मानता इसे जीत।

रवीश कुमार जब राहुल गाँधी के मुँह में जवाब ठूँस कर कुछ ज्ञान की बातें निकलवाने की फ़िराक़ में उनका लाइव इंटरव्यू ले रहे थे, तो राहुल गाँधी ने एक मारक लाइन कही थी कि ‘मैं तो मोदी जी से भी सीखता हूँ… उनसे ये सीखता हूँ कि देश को कैसे नहीं चलाना चाहिए।’ रवीश के गंभीर चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई और उन्होंने दोहरा दिया कि मोदी से यही सीख मिलती है कि देश को कैसे नहीं चलाना चाहिए।

राहुल गाँधी एक ऐसे व्यक्ति हैं जो खुद भी खुद को सीरियसली नहीं लेते, वैसे व्यक्ति को रवीश क्यों सीरियसली लेंगे, ये जानने की कोशिश मैंने नहीं की। राहुल गाँधी ने सायकल ही ठीक से चला ली हो, जो कि अखिलेश के साथ उन्होंने कोशिश की थी, वही भारतीय जनता के लिए जश्न का समय होगा कि चलो ये आदमी कुछ तो चला लेता है, उस व्यक्ति के मुँह से देश चलाने की आकांक्षा और लगभग दो दशक से राज्य और देश की सरकार को चलाने वाले व्यक्ति पर बेतुका कटाक्ष सुन कर उसमें मीनिंग खोज लेना अलग स्तर की बुद्धिमानी है।

खैर, जो लोग रवीश की पिछले पाँच साल की पत्रकारिता टीवी और सोशल मीडिया पर देख रहे हैं, वो भी यह बात आसानी से मान लेंगे कि रवीश जी को पत्रकारिता के कॉलेजों को सिलेबस में केस स्टडी के तौर पर पढ़ाया जाना चाहिए। रवीश जी एक केस स्टडी हैं कि पत्रकारिता को सरकारों के परे, न्यूट्रल होना चाहिए। न कि, सरकार बदलने पर उस सरकार के पीछे हाथ धो कर पड़ जाना चाहिए, और पाँच साल सोने के समय से भी टाइम निकाल कर फेसबुक पर चार बजे सुबह में लेख लिख कर जनता को बरगलाना चाहिए कि असली पत्रकारिता वही कर रहे हैं फर्जी के आँकड़े और सवाल दाग कर।

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रवीश कुमार वही पत्रकार हैं जिन्हें देख कर बच्चों को सीखना चाहिए कि आपकी निष्पक्षता सरकार के आने या जाने पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। रवीश वही पत्रकार हैं जिन्हें देख कर पत्रकारिता के विद्यार्थी यह जान पाएँगे कि खुद को निष्पक्ष कहने वाले, दूसरे हर पत्रकार को तिरस्कार से देखने वाले, स्वयं को ही अंतिम सत्य मानने वाले पत्रकार जब गिरते हैं, तो वो गड्ढा अंतहीन होता है। आप उसमें ट्यूब के एक सिरे पर हाय रेजोल्यूशन कैमरा लेकर, ढकेलते जाइए, गिरता हुआ रवीश आपके कैमरे की जद से बाहर जाता रहेगा, जाता रहेगा…

एग्जिट पोल पर रवीश का रिएक्शन

कल शाम जब एग्जिट पोल आए तो पत्रकारिता के समुदाय विशेष का मन मुरझा चुका था, लोकिन प्रोग्राम तो करना था, तो खानापूर्ति करते नजर आए कई लोग। इसी पर बात करते हुए रवीश कुमार ने अपने सहयोगी से कई बातें कहीं। एक बात जो उन्होंने कही, वो यह थी कि उनके अनुसार कई एंकरों ने काफी मेहनत की है (भाजपा के लिए) तो उन्हें सरकार में मंत्री बनाना चाहिए।

ये बात रवीश कुमार ने बिलकुल सही कही, लेकिन ये आधा सत्य ही है। आधा सत्य यह है कि मीडिया दो हिस्सों में बँटा हुआ था पिछले पाँच सालों से। एक हिस्से को सब हरा दिख रहा था, दूसरे को पीला और प्राणहीन। एक हिस्सा सरकार के लिए कैम्पेनिंग कर रहा था, तो दूसरा सरकार के विरोध में। रवीश जी भी स्टूडियो से लेकर प्रेस क्लब और सड़कों तक पत्रकारिता के नाम पर कई रैलियाँ करते नजर आए।

कालांतर में उन्होंने ‘हेलिकॉप्टर पत्रकारिता’ से लेकर ‘चार्टर्ड प्लेन पत्रकारिता’ भी की। वो मायावती के साथ स्टेज पर भी चढ़े और खड़े रहे। ऐसे काम जब और पत्रकार करते थे तो रवीश ने मुखर हो कर उन्हें लताड़ा है कि ये लोग पत्रकारिता की जगह कुछ और ही कर रहे हैं। अब रवीश ने जब यह कहा है कि कई एंकरों को मंत्री होना चाहिए तो ज़ाहिर है कि वो यह बात अपने अनुभव से ही कह रहे होंगे। उन्होंने इस चुनाव में तमाम नेताओं से नज़दीकियाँ वैसे ही बढ़ाई जैसे वो बाक़ियों के ऊपर आरोप लगाते दिखे।

यह बात भी जगज़ाहिर है कि रवीश कुमार ने स्क्रीन काली कर के आनन-फानन में आपातकाल का इंडियन एक्सप्रेस बनने की नायाब नौटंकी की थी, और देश में सतहत्तर बार आपातकाल ला चुके हैं। लेकिन आपातकाल नहीं आया। उन्होंने कहा कि डर का माहौल है, और मुसलमानों को जुनैद के नाम पर खूब डराने की कोशिश की। लेकिन उसका भी कुछ फायदा हुआ नहीं। बाद में पता चला जिन-जिन के नाम पर इन्होंने माहौल बनाने की कोशिश की, लगभग सारे नाम उन कारणों से नहीं मरे जो रवीश बता रहे थे।

इन्होंने आइकॉन गढ़ने की कोशिश की, हर सामाजिक अपराध या हत्या पर सीधे सरकार को घेरते नजर आए, लेकिन बाकी समय चुप रहे जब सरकारें भाजपा की नहीं थी। यही आदमी बंगाल पर ममता का नाम तक नहीं लिख पाया था पिछले साल के पंचायत चुनावों की हिंसा पर जिसने हाल के समय में एक प्रदेश में सबसे ज़्यादा हत्यायें देखीं। बंगाल के दसियों दंगों पर ये आदमी चुप रहा, तब इसके ज़मीर ने इसको नहीं ललकारा कि वो कहे कि बंगाल में हर दूसरे जिले में नफ़रत की आग क्यों लगी हुई है?

रवीश कुमार सहजता से चुप्पी ओढ़े गोबर से खाद बनाना सिखाते रहे। गौरक्षकों पर इन्होंने चालीस-चालीस मिनट के कई प्राइम टाइम निकाले, लेकिन गौतस्करों द्वारा की जा रही चोरी से लेकर, उनके द्वारा ट्रक आदि चढ़ाकर प्रकाश मेशराम जैसे कई पुलिस वालों की हत्यायों पर ये चुप रहे।

क्योंकि रवीश कुमार जानते हैं कि इस चुप्पी की भी अपनी क़ीमत है। यही तो वो कारण है कि रवीश कुमार इतने आत्मविश्वास से बोल देते हैं कि एंकरो को मंत्री होना चाहिए। बाकी एंकर का पता नहीं लेकिन रवीश कुमार तो गठबंधन में मंत्री पद तो ज़रूर पा जाते। उनकी मेहनत सबको दिखी है। बाक़ियों ने सिर्फ चैनलों के स्टूडियो से पार्टियों के पक्ष में बोला, रवीश ने रात-रात जग कर, झूठ-प्रपंच जुटा कर खूब लिखा। साक्षात्कार दिए, बताया कि उनकी विचारधारा किसने मिलती है और वो क्या कर रहे हैं। इसलिए, जब वो कहते हैं कि एंकरों को मंत्री होना चाहिए, तो उनसे बेहतर कौन जानेगा ये बात! क्या पता डील हो चुकी है!

चुनाव आयोग से उठ चुका है विश्वास

रवीश ने कहा कि उनका चुनाव आयोग पर विश्वास नहीं है। वो पत्रकार हैं, कई सालों से पत्रकार हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला कैसे चुनाव आयुक्त बने थे, उन्हें यह बात याद ही होगी। तब उनका भरोसा चुनाव आयोग पर से नहीं उठा था। उनका भरोसा तब भी नहीं उठा था जब ममता के बंगाल में पंचायत चुनाव की हिंसा ने दसियों जानें लीं और एक तिहाई सीटों पर तृणमूल निर्विरोध जीत गई। इस व्यक्ति ने तब सवाल नहीं उठाए जब कॉन्ग्रेस जीत रही थी।

यही वो अंतिम तर्क है जब रवीश लोकतंत्र की अवधारणा पर ही सवाल खड़ने लगता है। अंतिम तर्क यही होता है कि ‘मैं नहीं मानता’, ‘मेरा तो विश्वास नहीं है’। आपका ये निजी मत हो सकता है, लेकिन आप चैनल के स्टूडियो में ‘निजी’ नहीं सार्वजनिक होते हैं। आप वहाँ जब इस तरह की बातें कैजुअली कहते हैं, तो आप वैसे ही प्रतीक पैदा करते हैं जैसा आपने मायावती की रैली के मंच से किया था। आपने अपनी प्रतिबद्धता दिखाई थी वहाँ खड़े हो कर।

आप जब हारने लगते हैं और खेल के नियमों पर ही सवाल करने लगते हैं तो पता चल जाता है कि आप किस स्तर के खिलाड़ी हैं। रवीश ने जो गड्ढा खोदना शुरू किया था, और निष्पक्षता से घृणा की पत्रकारिता की ओर रुख़ किया था, वो अब उन्हें अवसाद की ओर ले जा चुका है। अब बस उस अंतिम क्षण का इंतजार है जब यह पत्रकार टूट जाएगा क्योंकि दुनिया इसके हिसाब से नहीं चल रही। जब यह पत्रकार कहेगा कि भले ही भाजपा 41% वोट शेयर से जीत जाए, मैं नहीं मानता इसे जीत।

ये व्यक्ति बहुत दुःखी है। भीतर से घुटता हुआ आदमी जब कराहता है, और उसे बदलते माहौल में कुछ समझ में नहीं आता, उसे यह बात घालती हो कि लोग मोदी को क्यों वोट दे रहे हैं, तब उसकी पीड़ा इसी तरह के कुतर्कों के रूप में बाहर आती है। तब पूरी दुनिया गलत हो जाती है। तब वही वोटर गलत हो जाता है जिसने मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस को विधानसभा दी थी, और अब भाजपा को लोकसभा दे रही है। तब पत्रकार यह मानने लगता है कि उसके वोट का मूल्य आम जनता के वोट से 32 करोड़ गुना ज्यादा होना चाहिए ताकि वो जिसे एक वोट दे दे, वो पार्टी सीधा प्रधानमंत्री बना ले। और हाँ, कैबिनेट में उन्हें एक जगह ज़रूर दे।

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