‘द वायर’ वालो, JNU-छाप माओवंशी वामभक्तों के ज़हर को छाप कर कब तक दुकान चलाओगे?

आप वरिष्ठों के होते हुए कनिष्ठ और युवा प्रोफ़ेसर को स्कूल ऑफ़ सोशल साइंसेज का डीन बनाए जाने का विरोध करते हैं। क्यों? केवल इसलिए कि वह युवा है? वामपंथ तो युवा खून का समर्थक रहा है न? उम्र और वरिष्ठता जैसे चीज़ें तो बूढ़े और दकियानूसी दक्षिणपंथ की परिचायक हैं न?

‘Subjective’ का मतलब होता है विषयनिष्ठ, यानी जो हर इंसान के लिए अलग-अलग हो। ‘Objective’ होता है वस्तुनिष्ठ, यानी जिसे कोई भी इंसान, किसी भी दृष्टिकोण से देखे, तो वह एक जैसा ही दिखे। जेएनयू के अध्यापक अविजित पाठक The Wire में छपे लेख ‘JNU: The Story of the Fall of a Great University’ में अपने सब्जेक्टिव ‘दर्द’ के ऑब्जेक्टिव कारण गिनाते हैं। माने उनके दर्द से भले आप सहमत हों या न हों (क्योंकि वह ऑब्जेक्टिव नहीं है, निजी है), लेकिन उसका कारण ऑब्जेक्टिव है- उससे असहमति की गुंजाईश ही नहीं हो सकती।

अपने लेख की शुरूआत में ही अविजित स्टाइलिश ओपनिंग देने और सहानुभूति लूटने के लिए बताते हैं कि जेएनयू टीचर्स एसोसिएशन के द्वारा किए गए प्रदर्शन में हिस्सा लेने के लिए उनका नाम चार्जशीट में है। लेकिन इसमें शायद वह सिक्के का दूसरा पहलू वह भूल गए कि जब उनके खिलाफ चार्जशीट फाइल है, तो ज़ाहिर सी बात है चार्जशीट फाइल करने वालों के खिलाफ कही गई उनकी किसी बात में पूर्वग्रह की गुंजाईश से इंकार नहीं किया जा सकता। और यह पूर्वग्रह, यह पक्षपात उनके पूरे लेख में दिखता है।

अपना ‘डर’ डर है, अपनी बेइज़्ज़ती चुभती है…

लेख के पहले खंड की शुरूआत अविजित उसी “डर का माहौल” टेम्पलेट से करते हैं, जो आजकल चरम-वामपंथियों का आखिरी सहारा बचा है। आँकड़े उनके खिलाफ हैं, जनता का मूड उनके खिलाफ है, दशकों की मेहनत से खड़े किए नैरेटिव झूठ के पुलिंदे साबित हो रहे हैं, चारु मजूमदार और किशनजी से लेकर माओ और लेनिन तक उनके हीरो देश के ही नहीं, इंसानियत के भी विलेन निकल रहे हैं। तो ऐसे में हवाई “डर का माहौल” ही उनके पास सबसे ठोस आधार बच रहा है।

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वह बताते हैं कि “डर का माहौल” इसलिए है क्योंकि ‘एकतरफ़ा’ अकादमिक काउन्सिल में वरिष्ठ प्रोफ़ेसरों की कथित बेइज़्ज़ती हो रही है। इस एक वाक्य में कितने सारे विरोधभास हैं! आप तो वामपंथी हैं न, अविजित साहब? या कम-से-कम एंटी-राइट? तो आप तो हायरार्की, वरिष्ठ-कनिष्ठ जैसी चीज़ों के खिलाफ हुए न? आपके हिसाब से तो यह शोषकों द्वारा शोषण के लिए गढ़े गए फ़र्ज़ी वर्गीकरण हैं! तो वरिष्ठता का हवाला कैसे दे सकते हैं?

और अगर बात बेइज़्ज़ती की करनी है तो जेएनयू में, जो वामपंथियों का गढ़ है, ज़रा दक्षिणपंथी, एंटी-वामपंथी, ABVP/संघ-परिवार समर्थक शिक्षकों और छात्रों से मिलकर पूछिए उन्हें कितनी ज़िल्लत आपके वामपंथी देते हैं, और कितने पहले से देते थे। आप तो इतनी जल्दी घबरा गए, उन लोगों की सोचिए जो सालों नहीं, दशकों से ऐसे ही माहौल में आते थे, किसी तरह पढ़-लिखकर निकल जाते थे।

आप वरिष्ठों के होते हुए कनिष्ठ और युवा प्रोफ़ेसर को स्कूल ऑफ़ सोशल साइंसेज का डीन बनाए जाने का विरोध करते हैं। क्यों? केवल इसलिए कि वह युवा है? वामपंथ तो युवा खून का समर्थक रहा है न? उम्र और वरिष्ठता जैसे चीज़ें तो बूढ़े और दकियानूसी दक्षिणपंथ की परिचायक हैं न?

आप उद्धरण चिह्नों (‘ ‘) के भीतर competent authority को रखते हैं। केवल authority (प्राधिकार) नहीं, competent authority को। यानी आप competence (योग्यता) को भी प्रश्नचिह्नों में रखते हैं, जो कि आपकी वामपंथी विचारधारा है- कि योग्यता महज़ एक सामाजिक छलावा है। तो अगर योग्यता छलावा है, प्राधिकार के खिलाफ वामपंथी होने के कारण अंध-विरोध में खड़े ही रहना है, तो बन जाने दीजिए किसी को भी! क्या दिक्कत है?

बदरंग दीवारें और हत्यारा शे गुवेरा ही हैं आपके ‘aesthetics’?

आप अगला मुद्दा दीवारों से पोस्टर हटाने का उठाते हैं, और बताते हैं कि वह पोस्टर बड़े ही एस्थेटिक (कलात्मक) थे। इससे बड़ी हास्यास्पद विडंबना क्या हो सकती है कि एक तरफ़ आप बात ‘कलात्मकता’ और सुरुचिपूर्णता की कर रहे हैं, और दूसरी ओर आपके ही लेख में जो मुख्य तस्वीर लगी है, उसमें घोर अरुचि पैदा करने वाली, बदरंग दीवार की तस्वीर है। और उसे बदरंग किसी पोस्टर ने ही किया है।

इसके अलावा आप शे गुवेरा का पोस्टर लगाते हैं। वही शे, जो समलैंगिकता को ‘बुर्जुआओं की नौटंकी’ मानता था और समलैंगिकों को नाज़ियों जैसे लेबर कैम्प में भेज देता था। वही जो शेखी बघारता था कि क्रांति के लिए बंदूक चलाते समय बेगुनाहों के बारे में नहीं सोचा जा सकता, जो सामने हो भून दो। जो आपके पसंदीदा नारे ‘free speech’ और आज़ाद प्रेस का दुश्मन था। इसी ‘रुचिपूर्ण’ कलात्मकता के खो जाने का मातम मना रहे हैं?

बायोमेट्रिक से डर क्यों?

आप बताते हैं कि बायोमेट्रिक हाजिरी से जेएनयू के अध्यापक डरे हुए हैं? क्यों? क्या इसलिए कि आप लोग अभी तक अपनी मनमर्जी से कभी मन हुआ तो क्लास लेने आए, नहीं मन हुआ तो छात्रों को पार्ट-टाइम एक्टिविस्ट बना कर किसी भी मुद्दे पर धरना देने भेज दिया? यह तो कामचोरी है, हराम का खाना यानी हरामखोरी है! और अगर आप यह नहीं कर रहे, अगर आप हराम की सैलरी नहीं ले रहे, तो बायोमेट्रिक से किस चीज़ का डर?

ऑब्जेक्टिव और MCQ आपका भेदभाव रोकने के लिए हैं

इसे विडंबना ही कहेंगे कि एक ओर आप अपने सब्जेक्टिव डर के कारणों को सत्यता देने के लिए उन्हें ‘ऑब्जेक्टिव कारण’ बताते हैं, और दूसरी ओर आप आगामी फ्रेशर्स के बैच के लिए छद्म-रूप से अपमानजनक ‘MCQ generation’ का इस्तेमाल करते हैं। आपको MCQ से दिक्क्त है, समझ में आता है। वामपंथी नैरेटिव गेम में स्ट्रॉन्ग हैं, लेकिन तथ्यों के मामले में कमज़ोर पड़ जाते हैं।

आज तक आप सब्जेक्टिव इम्तिहान लेकर (शायद) केवल अपनी राजनीतिक सोच से मेल खाने वाले या वैचारिक रूप से ढाले जा सकने वाले लोगों को ही प्रवेश देते थे। अब MCQ के ज़रिए वो छात्र भी प्रवेश पाएँगे जो वामपंथियों के झूठे नैरेटिव, और झूठे तथ्यों को चुनौती देंगे। इसीलिए आप दुःखी हैं?

आपका काम पढ़ाना है, एक्टिविस्ट तैयार करना नहीं

अविजित पाठक दुःख जताते हैं कि अब वह होने छात्रों में एक्टिविस्ट तैयार नहीं कर सकते। 29 साल (उनका ही दिया हुआ आँकड़ा) पढ़ाने के बाद भी उन्हें समझ नहीं आया कि शिक्षक का काम शिक्षा देना होता है, उस शिक्षा को किसी एक राह पर ही इस्तेमाल करने के लिए छात्र को धकेलना या बरगलाना नहीं। और जेएनयू ने यही किया है- ईमानदार विचारक और बौद्धिक कम, बौद्धिकता और विचारधारा को हथियार बनाकर एक्टिविज़्म करने वाले एक्टिविस्ट, या नक्सली आतंकी, ज़्यादा तैयार किए हैं।

और अंत में आपको उसी इंसान का लेखन याद दिलाना चाहूँगा, जिसे आप उद्धृत करते हैं- दोस्तोवस्की। ‘नोट्स फ़्रॉम द अंडरग्राउंड’ से लेकर ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ और ‘द डेविल्स’ तक अपने हर मशहूर उपन्यास में वह ‘एक्टिविस्ट-टाइप’, यूटोपिया के पुजारी आदर्शवादियों का खोखलापन ज़ाहिर करते हैं। केवल उन्हें उद्धृत करने की बजाय अविजित पाठक और उनके एक्टिविस्ट अकादमिक साथी दोस्तोवस्की को पढ़ना और ईमानदारी से उनके लेखन के आलोक में आत्म-चिंतन करना शुरू कर दें तो बेहतर होगा।

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यू-ट्यूब से

बड़ी ख़बर

जाधवपुर यूनिवर्सिटी अक्सर वामपंथी छात्र संगठनों की करतूतों से चर्चा में रहता है। 2016 में जेएनयू की तरह यहॉं के भी छात्रों ने अफजल के समर्थन में नारे लगाए थे। 2014 में सरेआम एक-दूसरे को चुंबन लेकर अपनी अभिव्यक्ति का इजहार किया था। अब विरोध के नाम पर न केवल केंद्रीय मंत्री के साथ बदतमीजी की गई है, बल्कि राज्यपाल को भी परिसर में प्रवेश करने से रोकने की कोशिश की गई ।

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