महादलितों की मॉब लिंचिंग: TOI की भ्रामक हेडलाइन के पीछे छिपा मीडिया कुचक्र का घिनौना सच

एक ज़िम्मेदार मीडिया संस्थान या तो दोनों की ही जातीय पहचान बताएगा या फिर किसी की भी नहीं। लेकिन, प्रोपेगंडा फैलाने का उद्देश्य रखने वाला 'महादलित मारे गए' हेडलाइन में ही बता देगा। नहीं, 'मारे गए' या फिर 'हत्या' जैसे शब्द अब 'फैंसी' नहीं रहे, इसीलिए 'लिंचिंग' का प्रयोग किया जाएगा ताकि ऐसा लगे कि......

अगर आप ख़बरें पढ़ते हैं और न्यूज़ देखते हैं तो आपको पता होगा कि देश में जबरदस्ती यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि असहिष्णुता का माहौल है। गिरोह विशेष की परिभाषा पर ध्यान दें तो ‘असहिष्णुता अर्थात हिन्दुओं द्वारा मुस्लिमों के लिए बनाया हुआ असुरक्षित माहौल‘। उनकी परिभाषा में थोड़ा और गहरे पैठें तो ‘असहिष्णुता अर्थात ब्राह्मणों द्वारा दलितों पर अत्याचार‘। अगर दोषी ब्राह्मण नहीं है तो उसे ‘ब्राह्मणवादी’ तो लिखा ही जा सकता है। और हाँ, असहिष्णुता अर्थात ‘राष्ट्रवादी भीड़ द्वारा किसी दलित या मुस्लिम की हत्या‘। ख़बरों को परोसने के एंगल पर गौर करें।

जब ‘द क्विंट’, ‘द वायर’ और ‘द स्क्रॉल’ जैसे प्रोपेगंडा पोर्टल अगर ऐसा करते हैं तो चलता है क्योंकि उनका जन्म ही सिर्फ़ इसीलिए हुआ है। अपनी पत्रकारिता से भाजपा के लिए निगेटिव माहौल तैयार करना इनका उद्देश्य है और इसके लिए जहाँ तक हो सके नीचे गिरना इनका परम लक्ष्य। लेकिन, जब ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ जैसा प्रमुख मीडिया संस्थान ऐसा करता है तो यह काफ़ी दुःखद है क्योंकि देश के सबसे बड़े मीडिया नेटवर्क्स में से एक होने के नाते उनकी कुछ ज़िम्मेदारी बनती है, जिसे वे अपने जूतों में गोबर लगा कर रौंद रहे हैं। आइए जानते हैं कि हुआ क्या?

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने ख़बर परोसी कि बिहार के नवादा में दो महादलितों की लिंचिंग कर दी गई। हम हों या आप, ये ख़बर पढ़ कर यही सोचेंगे कि देश में सच में असहिष्णुता का माहौल है क्योंकि महादलितों पर अत्याचार हो रहे हैं। मामला बिहार का होने के कारण पहली नज़र में किसी को भी लगेगा कि ऐसा ‘दबंगों’ ने किया है। यहाँ फिर से गिरोह विशेष की परिभाषा पर ध्यान दें तो ‘दबंग अर्थात कथित ऊँची जाति के लोग‘। जब वार्ड सदस्य खुर्शीद दुष्कर्म में असफल रहने पर किसी ग़रीब माँ-बेटी का सिर मुँड़वा कर सड़क पर घुमाता है तो इसे ‘दबगों के अत्याचार‘ वाला छौंक दिया जाता है।

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क्यों? क्योंकि पहली नज़र में ऐसा लगे कि बिहार की कथित ऊँची जाति के लोगों ने ऐसा किया है। अब वैशाली से लगभग सवा सौ किलोमीटर दूर नवादा में आते हैं। ऊपर जो हमनें ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की ख़बर ‘महादलितों की लिंचिंग’ का जिक्र किया, वह नवादा की ही है। आपने हैडलाइन देख ली, जिसे मात्र 4 शब्दों में समेट दिया गया था। इसमें अतिरिक्त जानकारी दी जा सकती थी क्योंकि 4 शब्दों की हैडलाइन देने का एक ही मकसद था कि ऐसा जानबूझ कर किया गया ताकि ‘महादलित’ और ‘लिंचिंग’- इन दो शब्दों को हाईलाइट किया जा सके। अब आगे बढ़ने से पहले आपको इस घटना के बारे में समझा देते हैं।

नवादा के कौआकोल थाना अंतर्गत स्थित तराउन गाँव में एक 55 वर्षीय महादलित महिला चिंता देवी की हत्या कर दी गई। लोगों का मानना था कि वह डायन है और ‘काला जादू’ करती है, इसीलिए 2 लोगों की ‘भीड़’ ने उसे घर से खींच कर मार डाला। अब आप ही बताइए, 2 लोगों की ‘भीड़’ कैसी होती है? मृत महिला के पति सुखदेव माँझी ने कहा कि लोगों की नज़रों के सामने उनकी पत्नी को मार डाला और वह उसे बख्श देने के लिए दो लोगो की ‘भीड़’ से मिन्नतें करते रहे। ये लोग मुसहर समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, जिन्हें बिहार में महादलित का दर्जा मिला हुआ है। बिहार के बारे में एक दिलचस्प तथ्य यह है कि यहाँ के सारे दलित महादलित हैं।

ऐसा सिर्फ़ बिहार की राजनीति में ही हो सकता है। पासवान जाति को महादलित का दर्जा देने के बाद बिहार में कोई दलित बचा ही नहीं। वापस ख़बर पर आएँ तो भीड़ की गुस्सा का कारण यह था कि रविवार (अगस्त 25, 2019) की शाम एक 11 वर्षीय बच्चे की तबियत ख़राब हो गई थी और मंगलवार को उसकी मृत्यु हो गई। मृतक के पति के अनुसार, उसी लड़के के परिवार ने महिला को लोहे के रॉड से पीटा और मार डाला। अब सवाल उठता है कि दोषी कौन लोग थे? ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने 4 शब्दों में हेडिंग चला कर क्या साबित करना चाहा और क्या छिपाना चाहा?

उपर्युक्त सवालों का जवाब दोषियों के नाम व जाति में छिपा है। अगर वे हैडलाइन में मरने वालों की तरह मारने वालों के भी पहचान उजागर कर देते तो इस ‘हत्या’ को फैंसी ‘लिंचिंग’ में बदलने का स्कोप ख़त्म हो जाता। इसीलिए कहाँ मरने वालों की पहचान उजागर करनी है और कहाँ मारने वालों की, यह इस बात पर निर्भर करता है कि किसकी पहचान उजागर करने से ‘असहिष्णुता’ वाले नैरेटिव को हवा दी जा सके। आपको बता दें कि नवादा में महादलित महिला की हत्या में जो लोग दोषी हैं, वो उसी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं जिस समुदाय की मृतक हैं। अर्थात, सभी आरोपित महादलित हैं।

मृतक महिला का नाम चिंता देवी है। मृतक के पति का नाम सुखदेव माँझी है। गिरफ़्तार आरोपितों में से एक का नाम कैलाश माँझी है तो दूसरे का नाम सोनी माँझी है। अर्थात, मृतक भी महादलित और हत्यारोपित भी महादलित। एक ज़िम्मेदार मीडिया संस्थान या तो दोनों की ही जातीय पहचान बताएगा या फिर किसी की भी नहीं। लेकिन, प्रोपेगंडा फैलाने का उद्देश्य रखने वाला ‘महादलित मारे गए‘ हेडलाइन में ही बता देगा। नहीं, ‘मारे गए‘ या फिर ‘हत्या‘ जैसे शब्द अब ‘फैंसी’ नहीं रहे, इसीलिए ‘लिंचिंग‘ का प्रयोग किया जाएगा ताकि ऐसा लगे कि किसी अन्य समुदाय (कथित ऊँची जाति) के लोगों ने महादलितों की ‘मॉब लिंचिंग‘ कर दी।

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ को भी पता है कि सोशल मीडिया पर गिरोह विशेष के कई ऐसे लोग दाँत पिजाए बैठे हैं, जो ख़बर को खोल कर पढ़ने की हिमाकत नहीं करते और उनमें से किसी ने पढ़ भी लिया तो वे भी ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की तरह आरोपितों की पहचान छिपा कर हूबहू पेश कर देंगे। सोशल मीडिया में इसपर प्रतिक्रियाएँ आएँगी। लोग गुस्सा होंगे। लोगों को लगेगा कि महादलित इस देश में सुरक्षित नहीं हैं। लोगों को इस बात का एहसास दिलाने की कोशिश की जाएगी कि देश में सचमुच असहिष्णुता का माहौल बन पड़ा है। आख़िर ख़बर तो सच्ची है, हैडलाइन भी झूठा नहीं है- लोग विश्वास तो करेंगे ही।

अगर भीख माँग कर पेट पालने वाली ग़रीब माँ-बेटी के साथ दुष्कर्म का प्रयास करने वाला और उनका सिर मुँड़वा कर जबरन सड़क पर घुमाने वाला मुस्लिम है तो उसे ‘दबंग‘ लिखा जाएगा। अगर शिवरात्रि के दौरान काँवरियों पर हमले करने वाला मुस्लिम है तो उसे ‘दो समुदायों के बीच विवाद‘ बताया जाएगा। अगर महादलित ही महादलित को मार डालते हैं तो इसे ‘लिंचिंग‘ बताया जाएगा। मीडिया का यही रुख है कि आज कोई भी असली समस्या पर बात करने से हिचकिचाता है। नवादा वाले मामले में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने जो किया, उससे भी असली समस्या छिप गई। उस पर कोई बात क्यों करेगा जब उसे हाईलाइट ही नहीं किया गया?

ये समस्या है ‘डायन-जोगन’ वाली। ये समस्या है तांत्रिकों और फकीरों द्वारा ‘झाड़-फूँक’ वाली। बिहार के कई परिवारों में ऐसा होता है कि आस-पड़ोस के ही किसी व्यक्ति को ‘काला जादू’ करने वाला मान लिया जाता है और परिवार में कोई भी अनहोनी होने पर उसे ज़िम्मेदार ठहरा दिया जाता है। अगर अत्यधिक ग़रीब व अशिक्षित परिवारों की बात करें तो कभी-कभार ख़ुद के ही परिवार में किसी व्यक्ति पर ऐसे आरोप लगा दिए जाते हैं।

मान लीजिए एक परिवार में दो भाई हैं। दोनों की पत्नियाँ हैं लेकिन इनमें से एक को बेटा हुआ लेकिन एक की तीन बेटियाँ हैं। तो बेटे वाली माँ को ऐसा लग सकता है कि बेटियों वाली माँ उससे जलती है और उसके बेटे का बुरा कर सकती है। (यह देखते हुए कि कई परिवारों में अब भी बेटे देने वाली माँ को ‘भाग्यशाली’ और बेटी देने वाली माँ को ‘बदकिस्मत’ माना जाता है। यह सच्चाई है। ऐसा नहीं होता तो मोदी सरकार को ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान न चलाना पड़ता।)

ध्यान दीजिए, यह समस्या सचमुच होती है। ऐसे में, बेटियों वाली माँ द्वारा किए गए सामान्य पूजा-पाठ भी बेटे वाली माँ को अखर सकता है। यह बिहार के ग़रीब या यूँ कह लें कि अशिक्षित परिवारों में एक बड़ी समस्या है। अब आप जरा बताइए, इस समस्या में जाति कहाँ है? इसमें जाति श्रेणी कहाँ है? एक सामाजिक समस्या को जातीय समस्या बना दिया गया और इसे फैंसी ‘मॉब लिंचिंग‘ से जोड़ दिया गया। इसमें महादलित, कथित ऊँची जाति, या फिर अनुसूचित जाति-जनजाति, यह सब कहाँ हैं? क्या किसी औरत पर डायन होने का आरोप लगाने वाली दूसरी औरत ने उसकी जाति देख कर ऐसा किया? नहीं।

अब दूसरी घटना पर आते हैं। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के उसी लेख में एक और घटना का जिक्र है, जिससे यह लेख और भी ‘फैंसी’ हो जाता है और इससे 2 महादलितों की ‘मॉब लिंचिंग’ की ख़बर एक साथ परोसने में आसानी होती है। लालपुर मुसहरीटोला में एक व्यक्ति को मार डाला गया। हेडलाइन से ही मृतक की पहचान हो जाती है कि वह महादलित था। मृतक का नाम राजेंद्र माँझी है। ‘मुसहरीटोला’ का अर्थ हुआ कि गाँव में बसी ऐसी बस्ती, जिसमें मुसहर रहते हैं। ध्यान दीजिए, ऐसा सिर्फ़ महादलितों के मामले में ही नहीं होता। लोग ब्राह्मणों की टोली को ‘बाभनटोली’ भी कहते हैं।

एक जाति के लोग एक जगह बसे और उस जगह को लोग उसी जाति की पहचान वाले नाम से जानने लगे, भले ही उस टोले में और भी जाति के लोग रहते हों। अब वापस ख़बर पर आते हैं। मृतक राजेंद्र माँझी के अवैध संबंधों के कारण उसकी हत्या कर दी गई। राजेंद्र माँझी का कैलाश माँझी की पत्नी के साथ अवैध सम्बन्ध था। इस मामले में 2 आरोपितों को गिरफ़्तार किया गया। गिरफ़्तार आरोपित हैं- मसाफिर माँझी और संजय माँझी। अर्थात इस मामले में भी मृतक और सभी आरोपित समान जाति से ताल्लुक रखते हैं। इस केस में भी मरने वाला महादलित और मारने वाला भी महादलित।

हमने ‘काला जादू’ के कारण महादलितों द्वारा महादलित महिला की हत्या वाली ख़बर देखी और ‘अवैध संबंधों’ के कारण महादलितों द्वारा ही महादलित व्यक्ति की हत्या वाली ख़बर भी देखी। जैसा कि हम जानते हैं, अगर पीड़ित दलित समुदाय से होता है तो एससी-एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई की जाती है। लेकिन, इन दोनों ही मामलों में एससी-एससी एक्ट नहीं लगेगा, ख़ुद पुलिस ने इस बात की पुष्टि की है। ऐसा इसीलिए नहीं होगा क्योंकि मृतक और सभी आरोपित समान महादलित जाति से हैं। लेकिन, ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ जैसे मीडिया संस्थान इसमें अलग-अलग ‘एक्ट’ लगा कर एक बनी-बनाई फेक नैरेटिव को जरा हवा तो दे ही सकते हैं।

इसीलिए कृपया कभी भी सिर्फ़ भ्रामक हेडलाइंस पर न जाएँ। अगर ख़बरों को भ्रामक तरीके से पेश किया जाता है तो ऐसे मीडिया संस्थानों को मौके पर ही लताड़ना शुरू कर दें। जागरूक जनता को ऐसी किसी ख़बर को देखते ही उस मीडिया संस्थान के दोहरे रवैये पर सवाल खड़ा करना चाहिए। ऐसा इसीलिए, क्योंकि ऐसी ही छोटी-छोटी ख़बरों पर कोई टुच्चा पत्रकार किसी अंतरराष्ट्रीय पोर्टल पर भी लिख देता है कि भारत अब ऐसा हो गया है, वैसा हो गया है। देश-दुनिया में माहौल बिगाड़ने की साज़िश की शुरुआती हिस्सा होती हैं ऐसी ख़बरें।

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