The Quint की झूठी पत्रकारिता से त्रस्त हुआ मुंबई का वो हिन्दू, जिसकी दिवाली मुस्लिमों ने की बर्बाद

"पुलिस मेरे घर आई, मुझे दोबारा लाइट्स लगाने और दिवाली पर धूमधाम करने के लिए मजबूर किया क्योंकि मैंने ट्विटर पर प्रधानमंत्री मोदी को टैग कर सहायता माँगी थी।"

मलाड पश्चिम के रहने वाले और मुंबई के फिल्म उद्योग से जुड़े कलाकार विश्व भानु उस समय सुर्ख़ियों में आ गए जब उनकी एक फेसबुक पोस्ट वायरल होने लगी। उसमें उन्होंने लिखा था कि दिवाली के मौक़े पर सोसायटी के लोग (मुस्लिम) उन्हें और उनकी पत्नी को घर में दीये जलाकर रोशनी करने और रंगोली बनाने की अनुमति नहीं दे रहे हैं। भानू ने अपनी पोस्ट में लिखा कि उनकी सोसायटी के लोगों ने न सिर्फ उनके घर की लाइट्स को नष्ट किया बल्कि बाक़ी लगी लाइट्स को हटाने के लिए मजबूर भी किया।

उन्होंने इसकी पुलिस में शिकायत भी की थी।

लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह स्तब्ध कर देने वाला है। न केवल पत्रकारिता के समुदाय विशेष ने उनके बयान को तोड़ना मरोड़ना और उन्हें पब्लिसिटी की भूख में झूठ बोलने वाला बताना शुरू कर दिया, बल्कि मुंबई पुलिस ने भी उनके ऊपर दबाव डालकर फेसबुक पर अपनी शिकायती पोस्ट डिलीट करने और मामले के सुलट जाने की झूठी पोस्ट लिखने के लिए उन्हें मजबूर किया।

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इसके बाद पुलिस के बयान के आधार पर उन्हें हर किसी मीडिया हाउस ने झूठा बताना शुरू कर दिया, जिसमें एनडीटीवी से लेकर के टाइम्स ऑफ़ इंडिया और रिपब्लिक तक शामिल हैं।

और विश्व भानु से इस मामले को लेकर किसी ने भी बात नहीं की- सिवाय क्विंट के पत्रकार मेघनाद बोस के, जिसने इसमें राजनीतिक ‘विंग’ का एंगल निकाल लिया।

क्विंट की हैडलाइन से ही साफ़ है कि असल में यह साम्प्रदायिक शत्रुता, हिन्दू-मुस्लिम विवाद की घटना नहीं थी, और ‘राइट विंग’ इसे ऐसा बना रहा है। मेघनाद बोस की रिपोर्ट में भानु के हवाले से कहा गया, “मैं कम्युनिस्ट हूँ और हमेशा से संघ, भाजपा और हिन्दूवादी दक्षिणपंथियों का विरोधी रहा हूँ। उदाहरण के तौर पर, मैं गायों की रक्षा के नाम पर भारत में होने वाली मॉब लिंचिंग का विरोधी रहा हूँ। जैसे मैं हिन्दू कट्टरपंथ का विरोधी हूँ, वैसे ही मैं मुस्लिम कट्टरपंथ के भी खिलाफ हूँ।”

बोस की रिपोर्ट में इसके बाद पड़ोसियों के बच्चों को झालरों (फेयरी लाइट्स) से बिजली का झटका लगने और यह बात भानु द्वारा खुद भी माने जाने की बात कही गई है। इसके बाद रिपोर्ट में मामले के मुख्य आरोपित इमरान खान का बयान है, जिनका कहना है कि उन्होंने भानु से केवल या तो झालरों को ऊपर उठा लेने या जहाँ से तार कटा था वहाँ पर टेप लगा देने के लिए कहा था। बकौल क्विंट की रिपोर्ट, प्रियंका (भानू की पत्नी) ने इसके लिए मना कर दिया, जिससे बात बढ़ी।

इस मुद्दे पर भानु का कहना है कि क्विंट ने उनकी बात को तोड़-मरोड़ कर पेश किया है। क्विंट ने रिपोर्ट ऐसी लिखी है मानो भानु ने इमरान के आरोप को स्वीकार ही कर लिया हो, जबकि असल में, बकौल भानु, उन्होंने इसकी संभावना से इंकार भले नहीं किया, लेकिन इसे स्वीकारा भी नहीं। उन्होंने यह सवाल पूछा था कि अगर बच्चों को वहाँ झटका लगा तो उसके बाद भी बच्चे वहाँ खेल क्यों रहे थे।

अपने कम्युनिस्ट होने को लेकर भी विश्व भानु ने कहा कि वे एक कलाकार हैं, और वामपंथी थियेटर जैसे जन नायक मंच के साथ उनका सालों पहले जुड़ाव था। लेकिन इसके आधार पर उन पर ‘वामपंथी’ या ‘कम्युनिस्ट’ का ठप्पा लगा देना गलत होगा। “अगर मैं लेफ्ट वाले लोगों के साथ कोई थियेटर कर लूँ, या मुस्लिमों के साथ होने वाले अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठा दूँ, तो इससे मैं वामपंथी कैसे हो गया?” उन्होंने कहा कि उनका संघ की विचारधारा से विरोध 20 साल पहले के थियेटर के दिनों में था, लेकिन वे कभी राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं रहे।

उन्होंने यह भी बताया कि उनके मामले में सहायता करने के लिए आगे आए हिंदूवादी कार्यकर्ताओं से उन्होंने कहा था कि वे उनकी विचारधारा से इत्तेफाक नहीं रखते। इसके बावजूद ‘जगाओ हिन्दू’ समेत हिंदूवादी संगठनों ने उनकी सहायता की, क्योंकि हिन्दू धर्म में पैदा हुए हर इंसान को वे अपना भाई मानते हैं, और उनकी सहायता करने को वे तैयार हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि बालकृष्ण नामक एक हिन्दू कार्यकर्ता 60 साल की उम्र होने के बावजूद चेम्बूर से मलाड तक उनका हाल जानने आए, जबकि भानु के पड़ोसियों ने उन्हें पता तक बताने से मना कर दिया। जब भानु ने बाहर आकर उन्हें खुद घर ले आने की बात की, तो बालकृष्ण ने मना किया और कहा कि वे घर के भीतर सुरक्षित रहें, वे खुद उनका मकान ढूँढ़ लेंगे।

मुंबई पुलिस को लेकर भानु का कहना है कि पुलिस ने कई तरह से उन पर मामले से पीछे हटने का दबाव डाला। न केवल उन पर मामले के आपसी सुलह से सुलझ जाने की झूठी पोस्ट लिखने का, बल्कि उन्हें धमकी भी दी गई कि उनकी फेसबुक पोस्ट से मुंबई में हिन्दू-मुस्लिम दंगे हो सकते हैं। उनसे कहा गया कि उनकी पोस्ट से संभावित दंगों की आग मुंबई से आगे कर्नाटक तक भी जा सकती है। पुलिस ने उनसे कहा था, “अगर आप ऐसे करेंगे तो कितने मुस्लिमों को मार दिया जाएगा, जहाँ हिन्दू बहुसंख्या में हैं।”

इसके अलावा भानु का दावा है कि उन पर ऐसा दबाव बनाने के बाद पुलिस ने उनके घर आ कर उन्हें दोबारा लाइट्स लगाने और दिवाली पर धूमधाम करने के लिए मजबूर किया क्योंकि भानु ने ट्विटर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टैग कर सहायता माँगी थी, और अब उनसे जवाब माँगा जाएगा कि भानु दिवाली मना पाए या नहीं।

अगर भानु की बात को सही माना जाए तो, अपनी जवाबदेही से बचने के लिए पुलिस ने बिना कोई कार्रवाई किए ही भानु को हुक्म दिया कि वे ऐसा दिखाएँ कि कार्रवाई हुई है और भानु कार्रवाई से संतुष्ट होकर दीवाली मना रहे हैं, ताकि पुलिस वाले अपना कोरम पूरा कर सकें।

बिल्डिंग में रहे रहे अन्य हिन्दुओं के असहयोग के बारे में भानु का कहना है कि उन्होंने सहयोग इसलिए नहीं किया है, क्योंकि या तो वे किराए पर रह रहे हैं और उनके मकान मालिक मुस्लिम हैं, इसलिए वे चुप हैं, या फिर वे मुस्लिम प्रभुत्व वाले इलाके में डर के कारण चुप हैं।

क्विंट की रिपोर्ट में जिस बिल्डिंग सचिव गुंडु राडेकर का ज़िक्र है और उनके हवाले से घटना को हल्का करके दिखाने की कोशिश हुई है, उनके बारे में भी भानु का कहना है कि वे खाली नाम भर के सचिव हैं। उनकी कोई सुनता नहीं है, और उन्हें ‘मुस्लिम प्रभुत्व वाली सोसाइटी का हिन्दू सचिव’ का कोरम पूरा करने के लिए ही रखा गया है।

इसके अलावा उन्होंने यह भी ज़िक्र किया है कि कैसे उनके खुद के मुस्लिम और ‘सेक्युलर’ थियेटर वाले दोस्त सोशल मीडिया पर उन्हें वे आर्टिकल भेज रहे हैं, जिनमें उन्हें झूठा बताया गया है। वे भानु से पूछ रहे हैं कि उन्होंने झूठ क्यों बोला। उन्हें ऐसा भी इशारा किया जा रहा है कि थियेटर मुस्लिम प्रभुत्व वाली इंडस्ट्री है, जहाँ उन्हें अब काम नहीं मिलेगा। हालाँकि भानु को ऐसा लगता है कि यह सब बकवास है और थियेटर को इसकी परवाह नहीं है।

उनका कहना है कि उन्हें झूठा कहने वाले एनडीटीवी में उन्हीं के कई दोस्त काम करते हैं, जो उन्हें भी जानते हैं और यह भी कि भूतकाल में भानु कई बार मुस्लिमों के हक के लिए खड़े हुए थे, लेकिन वे दोस्त उनके साथ खड़े नहीं हुए। जिस भानु को कम्यूनिस्ट बताया जा रहा है, उसी कम्युनिस्ट पार्टी के बृंदा करात और सीताराम येचुरी भी उनके नाटक देख चुके हैं, लेकिन वहाँ से भी सहायता नहीं आई। अगर वे ‘लेफ्टिस्ट’ हैं, तो उनके समर्थन में और कोई लेफ्टिस्ट क्यों नहीं आ रहा?

ऑपइंडिया से बात करते हुए भानु ने कहा, “अगर मैं लेफ्टिस्ट हूँ, तो मैं आज से छोड़ देता हूँ लेफ़्टिज्म।”

(मूलतः अंग्रेजी में प्रकाशित नूपुर शर्मा की इस रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद मृणाल प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव ने किया है।)

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