Wednesday, August 4, 2021
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लिबरलों ने दी BJP में शामिल होने की सलाह तो कॉन्ग्रेस ने बताया डर से मजबूर: मायावती पर चालू हुए चौतरफा हमले

आरफा ने मायावती पर तंज कसते हुए कहा कि 'बहन जी' द्वारा इस तरह राजस्थान सरकार को बर्ख़ास्त करने की माँग जँच नहीं रही है। उन्होंने ट्विटर पर लिखा कि अच्छा यही रहेगा कि मायावती आधिकारिक रूप से भाजपा में शामिल हो ही जाएँ। उन्होंने सवाल दागा कि मायावती आखिर कब तक भाजपा का सिर्फ़ ‘बाहर से समर्थन’ करेंगी?

बसपा सुप्रीमो मायावती ने अशोक गहलोत की आलोचना क्या कर दी, लिबरल गैंग उन पर बिफर पड़ा है। कॉन्ग्रेस ने तो यहाँ तक कह दिया कि वो भाजपा के डर के कारण मजबूर हैं। वहीं पत्रकार आरफा खानुम शेरवानी ने उन्हें भाजपा में शामिल होने की सलाह भी दे डाली। राजस्थान फोन टैपिंग विवाद के बीच राज्य में मायावती द्वारा राष्ट्रपति शासन की माँग करने से कॉन्ग्रेस को काली मिर्ची लग गई है।

आरफा ने मायावती पर तंज कसते हुए कहा कि ‘बहन जी’ द्वारा इस तरह राजस्थान सरकार को बर्ख़ास्त करने की माँग जँच नहीं रही है। उन्होंने ट्विटर पर लिखा कि अच्छा यही रहेगा कि मायावती आधिकारिक रूप से भाजपा में शामिल हो ही जाएँ। उन्होंने सवाल दागा कि मायावती आखिर कब तक भाजपा का सिर्फ़ ‘बाहर से समर्थन’ करेंगी? इस पर आरफा को भी कई लोगों ने कॉन्ग्रेस में शामिल होने की सलाह दे डाली।

कॉन्ग्रेस ने आरोप लगाया कि मायावती की कुछ मजबूरियाँ हैं, जिनके कारण वो निःसहाय होकर भाजपा की मदद करने के लिए ऐसे-ऐसे बयान दे रही है। कॉन्ग्रेस प्रवक्ता पवन खेरा ने आरोप लगाया कि भाजपा ने ये स्वीकार किया है कि राजस्थान में उसने ‘हॉर्स ट्रैडिंग’ की है। उन्होंने हरियाणा सरकार पर राजस्थान की एजेंसी को जाँच से रोकने का आरोप लगाया। मायावती ने गहलोत पर आरोप लगाते हुए कहा था:

“जैसा कि विदित है कि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पहले दल-बदल कानून का खुला उल्लंघन व बसपा के साथ लगातार दूसरी बार दगाबाजी करके पार्टी के विधायकों को कॉन्ग्रेस में शामिल कराया और अब जग-जाहिर तौर पर फोन टेप कराके इन्होंने एक और गैर-कानूनी व असंवैधानिक काम किया है। इस प्रकार, राजस्थान में लगातार जारी राजनीतिक गतिरोध, आपसी उठा-पटक व सरकारी अस्थिरता के हालात का वहाँ के राज्यपाल को प्रभावी संज्ञान लेकर वहाँ राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश करनी चाहिए, ताकि प्रदेश में लोकतंत्र की और ज्यादा दुर्दशा न हो।”

बता दें कि सितंबर 2018 में राजस्थान में इतिहास ने एक दशक बाद अपनेआप को दोहराया था क्योंकि 2009 में भी अशोक गहलोत ही मुख्यमंत्री थे और तब भी उन्होंने बसपा के 6 विधायकों को कॉन्ग्रेस के पाले में लाया था। तब भी बसपा के खाते में 6 सीटें ही थीं। सोमवार (सितम्बर 16, 2019) देर रात राजस्थान के राजनीतिक पटल पर काफ़ी उठापटक हुई थी और विधानसभा में बसपा 6 से सीधा शून्य पर आ गई थी।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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