Winnie the pooh की तरह दिखते हैं चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग! बैन करने के पीछे क्या रही वजह?

जैसे-जैसे ये मीम्स लोकप्रिय होते गए, चीनी सेंसर बोर्ड ने इन्हें इंटरनेट पर प्रतिबंधित करना शुरू कर दिया। यहाँ तक ​​कि कॉमेडियन जॉन ओलिवर द्वारा कार्टून के ज़रिए चीनी शासन की संवेदनशीलता का मजाक उड़ाने पर...

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत के दौरे पर हैं। इस बीच चीनी राष्ट्रपति सोशल मीडिया पर छाए कुछ मीम्स को लेकर चर्चा में बने हुए हैं। यह चर्चा किसी इंसान या वस्तु विशेष की नहीं है बल्कि एक कार्टून कैरेक्टर को लेकर की जा रही है।

चीन एक ऐसा देश है, जो अपने तानाशाही रवैये के लिए जाना जाता है। चीन की हरक़तें कभी-कभी अमानवीय तो कभी हास्यास्पद भी होती है, जिससे वो मखौल या उपहास का पात्र भी बन जाता है।

उदाहरण के लिए, एक लोकप्रिय कार्टून विनी द पू (Winnie the pooh) को सिर्फ़ इसलिए प्रतिबंधित कर दिया गया क्योंकि उसके साथ शी जिनपिंग की तुलना की जाने लगी थी, मीम्स बनने लगे थे। नीचे की तस्वीर में आप इसका उदाहरण देख सकते हैं।

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जापानी प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे के साथ शी की बैठक के दौरान भी सोशल मीडिया पर एक मीम छाया रहा, जिसमें शी जिनपिंग को पू कार्टून के रूप में चित्रित किया गया, जबकि शिंज़ो आबे को एक निराशावादी गधे के रूप में।

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चीनी राष्ट्रपति को कार्टून के रूप में चित्रित करने का सिलसिला यहीं नहीं थमा। एक अन्य मीम में, हॉन्गकॉन्ग की नेता कैरी लैम को पिगलेट यानी सुअर के बच्चे के रूप मेें चित्रित किया गया जबकि शी जिनपिंग को फिर से पू कार्टून के ज़रिए चित्रित किया गया।

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जैसे-जैसे ये मीम्स लोकप्रिय होते गए, चीनी सेंसर बोर्ड ने इन्हें इंटरनेट पर प्रतिबंधित करना शुरू कर दिया। यहाँ तक ​​कि कॉमेडियन जॉन ओलिवर द्वारा कार्टून के ज़रिए चीनी शासन की संवेदनशीलता का मजाक उड़ाने पर HBO वेबसाइट को भी चीन में प्रतिबंधित कर दिया गया था।

चीन के इस रवैये से साफ़ पता चलता है कि उसे इन कार्टून्स से काफ़ी चिढ़ है, तभी तो वो बिना देरी किए इसे गंभीरता से लेता है और तुरंत प्रतिबंधित कर देता है। वैसे भी चीन के तानाशाही शासन से तो पूरी दुनिया वाक़िफ़ है। चीन के मामले में यह कहना ग़लत नहीं होगा कि चीन का यह तानाशाही रवैया इसलिए भी है क्योंकि वो आर्थिक रूप से मज़बूत है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उसकी धाक है, फिर भले ही उसने अपने यहाँ लाखों मुसलमानों को क़ैद करके उन पर अत्याचार किया हो, इससे कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता।

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