आपको कोई पढ़ता नहीं, विश्वास आपने खो दिया… तो हम क्या करें: स्वाति चतुर्वेदी की कानूनी नोटिस का जवाब

स्वाति चतुर्वेदी लगातार ऑपइंडिया के विषय में अभद्र टिप्पणियाँ करती रहती हैं। हमारे पास 100 से अधिक उनके सोशल मीडिया पोस्ट्स और किताब के अंशों का उदाहरण है, जिसे हम अदालत में पेश कर सकते हैं।

ऑपइंडिया को हाल ही में मीडिया ट्रोल स्वाति चतुर्वेदी की तरफ से कानूनी नोटिस मिली है। उस नोटिस का हमारा जो जवाब है, वो निम्नलिखित है। लेकिन जवाब देने से भी पहले हम यह साफ कर देना चाहते हैं कि ऐसे दबाव बनाने वाले दाँव-पेंच ऑपइंडिया के साथ नहीं चलेंगे। हम उनके सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं और अगर जरूरी हुआ तो कानूनी लड़ाई के लिए भी तैयार हैं।

हमें आपकी क्लाइंट स्वाति चतुर्वेदी की ओर से मानहानि नोटिस मेसर्स आध्यासी मीडिया एन्ड कंटेंट सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड, OpIndia.com, संपादक नूपुर झुनझुनवाला शर्मा व अन्य के विरुद्ध प्राप्त हुई है। उस नोटिस में आप ने उद्धृत किया है कि आपकी क्लाइंट ‘बहुत ही प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित, प्रख्यात पत्रकार हैं।’ अपने इस दावे के समर्थन में आपने उन तमाम प्रकाशनों का नाम गिनाया है, जिनमें स्वाति चतुर्वेदी ने पिछले 20 वर्षों में काम किया है। आपने इस तथ्य पर भी जोर दिया है कि एक खोजी पत्रकार के तौर पर अपने कैरियर में उन्हें कभी किसी आरोप का सामना नहीं करना पड़ा है। आपने उन्हें 2018 में मिले एक अवार्ड का भी ज़िक्र किया है।

स्वाति चतुर्वेदी की क़ानूनी नोटिस का प्रासंगिक अंश

हालाँकि हम इस बात से इनकार नहीं कर रहे कि स्वति चतुर्वेदी का करियर दो दशकों से भी लम्बा हो सकता है (जो कि उनके लिहाज से एक उपलब्धि है) लेकिन हम विनम्रतापूर्वक इस ओर ध्यान आकर्षित करना चाहेंगे कि महज़ एक अवार्ड जीत लेने भर से किसी को ‘प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित, प्रख्यात’ नहीं माना जा सकता। और अपने इस कथन के समर्थन में स्वाति चतुर्वेदी जी को ही उद्धृत करना चाहेंगे। हम आपका ध्यानाकर्षण इस ओर करना चाहेंगे कि स्वाति चतुर्वेदी ने खुद ही (और विशेषतः सोशल मीडिया पर) कई अवार्डों का मज़ाक उड़ाया है। उदाहरण हैं माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिला फिलिप कोटलर अवार्ड, प्रख्यात अभिनेता अनुपम खेर को मिला पद्म भूषण अवार्ड, प्रख्यात अभिनेत्री रवीना टंडन को मिला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, और यहाँ तक कि अपने साथी पत्रकारों को मिले पुरस्कार। उनके इन शब्दों से यह इंगित होता है कि महज़ एक अवार्ड पा जाना किसी के ‘प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित, प्रख्यात’ होने का प्रमाण नहीं हो सकता।

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आगे, हम यह मान कर चलते हैं कि जब आप कहते हैं कि स्वाति चतुर्वेदी को ‘कभी किसी आरोप का सामना नहीं करना पड़ा है।’ तो आपका तात्पर्य है कि उनके खिलाफ किसी अदालत में कोई कानूनी मामला लंबित नहीं है। लेकिन यह सच नहीं है। उन्होंने एक व्यक्ति पर ‘यौन उत्पीड़न के लिए गिरफ्तार’ होने का आरोप लगाया था जो मिथ्या था। उन व्यक्ति ने स्वाति चतुर्वेदी पर मानहानि का मुकदमा किया था

अगर क़ानूनी मामलों को परे भी हटा दें तो स्वाति चतुर्वेदी पर और भी बहुत से आरोप हैं- भले ही वह सामान्य भाषा में हों और क़ानूनी रूप में नहीं। उन पर अभद्र भाषा के प्रयोग, खराब पत्रकारिता, तोड़-मरोड़ कर खबर प्रस्तुत करना। इनमें से कुछ को उदाहरण के तौर पर उल्लेख हम नीचे आपकी नोटिस का उत्तर देते हुए करेंगे।

अपनी नोटिस में आप एक “Swati Chaturvedi may be delusional: Sources” शीर्षक वाले लेख का विशेष उल्लेख करते हैं। आप OpIndia.com पर आरोप लगाते हैं कि हमने “यह मिथ्या वर्णन किया कि स्वाति चतुर्वेदी वामपंथी प्रोपेगैंडा वेबसाइट The Wire के साथ काम करतीं हैं, और (हमारा) इरादा उनकी मानहानि का था।” चूँकि स्वाति चतुर्वेदी ने कई मौकों पर The Wire के लिए लेख लिखे हैं, अतः हमें नहीं लगता कि यह कहना कि वह The Wire के साथ काम करतीं हैं, किसी भी प्रकार से मानहानि करने वाला कथन होगा। बल्कि आपकी नोटिस में तो खुद ही The Wire का नाम उन प्रकाशनों में है जिनके साथ उन्होंने “काम किया हुआ है।”

स्वाति चतुर्वेदी की क़ानूनी नोटिस का प्रासंगिक अंश

पर अगर स्वाति चतुर्वेदी को लगता है कि The Wire के साथ जुड़ा होना उनकी प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुँचाता है, तो हम उनके साथ सहानुभूति प्रकट करते हुए क्षमायाची हैं।

आपने अपनी कानूनी नोटिस में आगे यह लिखा है कि हमारे लेख में कहा गया वह कथन जो कहता है कि उन पर साहित्यिक चोरी (plagiarism) का आरोप लगता है और उनकी स्पष्ट झूठ और मनगढ़ंत बातों के लिए आलोचना होती है, पूरी तरह गलत है, और हमारे पास इस कथन का कोई आधार नहीं है, और हमारा इरादा आपकी मुवक्किल को उनके साथियों की नज़रों में गिराने का था। आपने यह भी उल्लेख किया कि हमारे अनुसार स्वाति चतुर्वेदी का धमकीबाज गिरोह (extortion racket) चलाना भी गलत है।

इन सभी बातों का अलग-अलग खंडन निम्नलिखित है:

1. साहित्यिक चोरी (plagiarism)

The Economist पत्र से संबद्ध Stanley Pignal नामक एक पत्रकार ने स्वाति चतुर्वेदी पर उनके ट्वीट्स के हिस्से चुराने का आरोप लगाया था। Pignal ने अपने दावे के समर्थन में सबूत पेश करते हुए ट्वीट भी किया था। (विस्तृत जानकारी यहाँ पढ़ी जा सकती है) दिलचस्प बात यह है कि स्वाति चतुर्वेदी ने कथित तौर पर चोरी उस लेख में की जो पत्रकारों की ईमानदारी के बारे में था। हमने महज़ Stanley Pignal द्वारा लगाए गए आरोपों का समाचार प्रस्तुत किया है, न कि उस पर निर्णय करने बैठे हों। इसके अलावा इससे यह भी साबित होता है कि जब हमने लिखा कि स्वाति चतुर्वेदी पर plagiarism का आरोप लगा, तो वह आधारहीन कथन नहीं था।

2. स्पष्ट झूठ और मनगढ़ंत बातें

आपकी मुवक्किल ने अभिनेता लियोनार्डो डि केप्रिओ को RSS के एक कार्यक्रम में बुलाए जाने की खबर छापी थी, जिसका कोई वास्तविक आधार नहीं था। उम्मीद के अनुसार वह गलत निकली। उन्होंने यह भी असत्य दावा किया था कि ठुकराए हुए आदमी से पिटती हुई एक लड़की की तस्वीर असल में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हुई हिंसा की तस्वीर है। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर के एक नेता के भी मनगढ़ंत कथन बनाए हैं, वह भी राष्ट्रीय स्तर पर देखे जाने वाले टेलीविजन चैनल पर।

उन्होंने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के सामान्य-से भाषण के बारे में भी झूठ फैलाए हैं। उन्होंने फेक न्यूज़ को विश्वसनीयता प्रदान की है। उन्होंने इससे पहले फेक न्यूज़ फैलाई थी कि कन्हैया कुमार पर हमला करने वाला भाजपा का पदाधिकारी था

अतः यह सत्य है कि उन पर स्पष्ट झूठ और मनगढ़ंत बातों का आरोप अक्सर लगता रहता है, हालाँकि हम यह मानने को तैयार हैं कि इनमें से अधिकाँश आरोप कानूनी प्रकृति के नहीं हैं क्योंकि प्रभावित पक्षों ने या तो उन रिपोर्टों या खुद स्वाति को क़ानूनी नोटिस भेजने लायक महत्वपूर्ण नहीं समझा।

3. धमकीबाज गिरोह (extortion racket)

यह आरोप OpIndia ने नहीं, PGurus नामक एक वेबसाइट ने लगाया था। PGurus का इस बाबत लेख अप्रैल, 2018 में प्रकाशित हुआ था और हमारी वह मूल रिपोर्ट जिसमें इस आरोप का समाचार था, वह भी उसी समय के आस-पास प्रकाशित हुई है। यह आरोप OpIndia का नहीं है, और हम यह दोहराना चाहेंगे कि हम अन्य पोर्टल द्वारा लगाए गए आरोप का केवल समाचार प्रकाशित कर रहे थे।

हमारी रिपोर्ट यहाँ, और PGurus की मूल रिपोर्ट यहाँ पढ़ी जा सकती है (उसे अभी तक हटाया नहीं गया है)। बल्कि कई अन्य लोगों, जिनमें फिल्म डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री शामिल हैं, ने PGurus के लेख को ट्वीट किया था और इंगित किया था कि स्वाति चतुर्वेदी का नाम सूची में है। लेकिन इनमें से किसी भी पक्ष के खिलाफ कोई क़ानूनी कार्रवाई नहीं की गई। हम अपने लेख को मूल स्रोत (PGurus) के लेख के अपडेट होने पर अपडेट कर देंगे।

4. स्वाति के साथियों की नज़रों में उनकी मानहानि

स्वाति चतुर्वेदी के साथियों में से कुछ ने गुप्त रूप से हमें बताया है कि उन्हें हिंदुस्तान टाइम्स से पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस का नकली साक्षात्कार करने के लिए निकाला गया था। अगर हमारा इरादा उनकी साख को नुकसान पहुँचाने का होता तो हम अपनी रिपोर्टों में हमेशा ‘सूत्रों के हवाले से’ यह दावा संलग्न कर देते, जैसा आपकी मुवक्किल अपनी पत्रकारिता में अक्सर करती रहती हैं। लेकिन हमने ऐसा नहीं किया क्योंकि हमारा इरादा उनकी मानहानि का नहीं था। इसके अलावा इससे यह भी पता चलता है कि उनकी साख अपने साथियों में उतनी अच्छी थी भी नहीं, और OpIndia को उस (साख) के किसी भी कथित नुकसान के लिए आपकी मुवक्किल द्वारा जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

आपकी नोटिस में आगे हमारे एक लेख (शीर्षक: “The Wire and its ‘star journalist’ peddles another absurd lie about RSS and it’s not the first time”) का उल्लेख करते हुए यह भी लिखा है कि इसका प्रकाशन निश्चित तौर पर आपकी मुवक्किल की मानहानि के लिए किया गया है।

स्वाति चतुर्वेदी की क़ानूनी नोटिस का प्रासंगिक अंश

हम यह स्पष्ट रूप से कहना चाहेंगे कि हम अपने लेख के साथ हैं, और मकसद लेख की आलोचना था, लेखक की मानहानि नहीं। ऊपर उल्लिखित लेख में आपकी मुवक्किल ने लिखा है:

“RSS को मोदी और शाह द्वारा बताया गया है कि जब भाजपा वापस आएगी, तो संविधान में संशोधन कर नए बहुसंख्यकवादी चरित्र को प्रतिबिंबित किया जाएगा, और जिस सेक्युलरिज़्म से वे सभी नफरत करते हैं, उसे हटा दिया जाएगा।” शब्दाडम्बर और कथित ‘सूत्रों’ के अतिरिक्त आपकी मुवक्किल ने इसका कोई सबूत पेश नहीं किया है। अगर हमारे लेख में, एक क्षण के लिए, मान भी लिया जाए कि मानहानि के तत्व हैं, तो भी वह आपकी मुवक्किल के मूल लेख में जितनी मानहानि की गई है, उससे कम ही हैं। आपकी मुवक्किल का लेख एक प्रतिष्ठित सामाजिक संस्था पर बड़े-बड़े षड्यंत्र रचने का आरोप लगाता है। हमारे विपरीत दावे (कि आपकी मुवक्किल ने झूठ बोला) का पता इस तथ्य से चल जाता है कि मोदी सरकार के इस कार्यकाल के सबसे पहले फैसलों में से एक अल्पसंख्यक कल्याण के बारे में था, जो कि किसी भी बहुसंख्यकवादी चरित्र के विपरीत है।

हमने जो “और यह पहली बार भी नहीं है” लिखा, वह भी सच है, और हम उसके भी साथ हैं। 2018 में आपकी मुवक्किल ने लिखा था कि RSS में दूसरे नंबर की वरिष्ठता रखने वाले सुरेश जोशी का मार्च में कार्यकाल खत्म होने पर उनकी जगह प्रधानमंत्री मोदी के करीबी दत्तात्रेय होसबोले को लाए जा सकने की संभावना है।

अपने निष्कर्षीय विश्लेषण में आपकी मुवक्किल ने दावा किया था कि इस बदलाव के ‘बहुत बड़े’ मायने हैं भाजपा और RSS के लिए। ऐसा दावा किया गया था कि संघ प्रमुख मोहन भागवत और सुरेश जोशी का मानना है कि संघ भाजपा के ‘नीचे’ रह कर काम नहीं कर सकता, लेकिन अगर होसबोले द्वितीय वरीयता पर काबिज हो गए तो शक्ति-संतुलन प्रधानमंत्री मोदी की ओर झुक जाएगा। लेखिका ने यह भी दावा किया था कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद संघ में होसबोले की पदोन्नति बहुत तेजी से हुई है।

जैसा कि अब हम सभी जानते हैं कि 2018 में जोशी का संघ के महासचिव या ‘सरकार्यवाह’ के तौर पर पुनर्निर्वाचन अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने कर दिया, जोकि संघ का उच्चतम निर्णयात्मक समूह है।

आपकी कानूनी नोटिस में आपने उल्लेख किया है कि इस लेख में भी हमने plagiarism के आरोप दोहराए हैं। हम दोहराते हैं कि plagiarism के आरोप दूसरे पत्रकार ने लगाए थे, और हमने केवल उनका समाचार प्रकाशित किया था।

आगे आपने उल्लेख किया है कि OpIndia.com पर छपे लेख पढ़ने के बाद स्वाति चतुर्वेदी को यह जान कर दुःख हुआ कि उनके साथी उनकी प्रमाणिकता पर संदेह करते हैं, और यह कि हमारे लेख के चलते उनके पाठकों की संख्या गिर गई है। हम स्वाति चतुर्वेदी को इसकी पुष्टि करने के लिए धन्यवाद देते हैं कि उनके साथी OpIndia.com को पढ़ते और उस पर विश्वास करते हैं।

स्वाति चतुर्वेदी की क़ानूनी नोटिस का प्रासंगिक अंश

जहाँ तक ₹50,00,000 (पचास लाख) की आपकी मुवक्किल की माँग का सवाल है, ‘मानसिक कष्ट’ और ‘प्रतिष्ठा की हानि’ के ‘मुआवजे’ के तौर पर, तो जब तक कि हम अपने लेख हटा न दें, तब तक के लिए हम यह स्पष्ट रूप से कहना चाहेंगे कि चूँकि हम पर लगाए गए आरोप वैध नहीं हैं, अतः हम इसे किसी औचत्य का नहीं मानते कि हम आपकी मुवक्किल को कोई धनराशि दें।

स्वाति चतुर्वेदी की क़ानूनी नोटिस का प्रासंगिक अंश

हमें ऐसा विश्वास दिलाया गया कि स्वाति चतुर्वेदी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की स्वतंत्रता में विश्वास करती हैं और यह नहीं मानतीं कि किसी पत्रकार के लिखे लेख से किसी की साख खो सकती है। हाल ही में एक पूर्व पत्रकार को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ अपमानजनक कमेंट करने के लिए गिरफ्तार किए जाने के विरुद्ध स्वाति चतुर्वेदी ने उत्तर प्रदेश सरकार की आलोचना की थी।

हम उनके द्वारा सोशल मीडिया पर डाली गई मशहूर कहावत दोहराना चाहेंगे, “अगर आज़ादी का कोई भी अर्थ है, तो वह लोगों को वह सुनाने का अधिकार है जो वह नहीं सुनना चाहते।” हम निश्चित तौर पर आपकी मुवक्किल स्वाति चतुर्वेदी और कई अन्य पत्रकारों को वह सुनाने के दोषी हैं जो वह नहीं सुनना चाहते। जैसा कि आपकी मुवक्किल के द्वारा प्रदर्शित किया गया, यह मानहानि नहीं आज़ादी है।

अंत में हम यह दोहराना चाहेंगे कि हमारा स्वाति चतुर्वेदी के खिलाफ कोई निजी एजेंडा नहीं है, लेकिन यही बात निश्चित तौर पर पलट कर स्वाति के बारे में नहीं कही जा सकती। वह लगातार ऑपइंडिया और ऑपइंडिया से जुड़े लोगों के विषय में अभद्र तरीके से टिप्पणियाँ करती रहती हैं, सोशल मीडिया पर भी और अपनी किताब में भी। हमारे पास 100 से अधिक (गिनती अभी भी चालू है) उनके सोशल मीडिया पोस्ट्स और किताब के अंशों का उदाहरण है, जिसे हम अदालत में अपने समर्थन में पेश कर सकते हैं।

हमारे सभी लेखों में, जिनमें उनका उल्लेख है, हमने केवल उनके पाखंड (खुद अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए दूसरों पर ‘ट्रोल’ का ठप्पा लगाना) और उनकी रिपोर्टों के साथ समस्याओं (अक्सर उनकी रिपोर्टें गलत निकल आती हैं) और उनके ऑनलाइन व्यवहार के बारे में लिखा है, और उनका आधार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सामग्री है।

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