डॉक्टर के साथ मारपीट पर हो सकती है 12 साल की जेल, नहीं मिलेगी जमानत

केंद्र सरकार डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर एक बड़ा कानून ला सकती है। इस कानून के अंतर्गत डॉक्टरों के साथ मारपीट या फिर उनके ऊपर हमला करने की घटना संगीन अपराध की श्रेणी में आ सकता है।

पश्चिम बंगाल में दो जूनियर डॉक्टरों पर मरीज के परिजनों द्वारा किए गए हिंसक हमले के बाद से छिड़ा आंदोलन लगातार तेज हो रहा है। दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन (डीएमए) के अध्यक्ष डॉ गिरीश त्यागी ने डॉक्टरों पर हुई हिंसा की कड़ी निंदा करते हुए हड़ताल कर रहे डॉक्टरों के प्रति सहानुभूति व्यक्त की। डीएमए, डॉक्टरों पर हो रही हिंसा के खिलाफ राष्ट्रीय कानून बनाने की माँग कर रहा है।

साथ ही ऑर्गेनाइजेशन ने डॉक्टरों और स्वास्थ्य सेवा प्रतिष्ठानों पर हिंसा के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की बात कही है। वहीं, वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन ने भी स्वास्थ्य सेवा प्रतिष्ठानों पर हिंसा के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया है और इस खतरे के खिलाफ मजबूत कानून लाने का आग्रह किया है।

इण्डिया टुडे से बात करते हुए एक अधिकारी ने इस बारे में बताया कि डॉक्टरों के खिलाफ हो रही हिंसा के खिलाफ ऐसे कानून लाना चाहिए, जिसमें दोषी को कम से कम 7 साल की सजा होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इसमें दोषी के खिलाफ मामले दर्ज करना, उसे दोषी ठहराना और फिर उसे गिरफ्तार करने के अनिवार्य प्रावधान शामिल होना चाहिए, जैसा कि POCSO एक्ट में किया जाता है। अस्पताल को स्पेशल जोन घोषित करना चाहिए और उपयुक्त सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होनी चाहिए।

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जानकारी के अनुसार, केंद्र सरकार डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर बड़े कदम उठा सकती है। डॉक्टरों को सुरक्षा देने के लिए केंद्र सरकार एक बड़ा कानून ला सकती है। इस कानून के अंतर्गत डॉक्टरों के साथ मारपीट या फिर उनके ऊपर हमला करने की घटना संगीन अपराध की श्रेणी में आ सकता है और इस अपराध के लिए दोषियों को कम से कम 12 वर्ष तक की सजा मिल सकती है। इसके साथ ही इस बात पर भी विचार किया जा रहा है कि इस कानून को गैर-जमानती रखा जाए।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्ष वर्धन से सभी राज्य सरकारों से इस पर विचार करने के लिए कहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जल्द ही सभी राज्य सरकारों के साथ बैठक करेंगे और खबर है कि इस बैठक में डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए सख्त कानून के अलावा क्लिनिक्ल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट में भी बदलाव किया जा सकता है। सभी राज्यों से विचार-विमर्श करने और उनके अंतिम प्रस्ताव आने के बाद ही इस पर अंतिम फैसला लिया जाएगा।

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