‘मस्जिद में सवाल पूछने गई, मगर इमाम ने इस्लाम कबूल करवाया’: पार्टी की शौकीन लड़की के मुस्लिम बनने का सफर

पर्सिफोन रिजवी (साभार: डेलीमेल)

इंग्लैंड के हडर्सफ़ील्ड शहर की पूर्व पार्टी गर्ल (पार्टी पंसद लड़कियाँ) पर्सीफोन रिजवी ने इस्लाम कबूलने के 7 साल बाद मीडिया को बताया कि कैसे उनके अंधकारमय जीवन में इस्लाम उजाला बनकर आया। 27 साल की रिजवी ने कहा कि इस्लाम को स्वीकारने के बाद उनका लाइफस्टाइल सुधरा और जो उन्हें आत्महत्या के ख्याल आते थे वो भी खत्म हो गए।

इस्लाम मजहब की पैरवी करते हुए रिजवी ने बताया कि पहले उनका समय लड़ने, शराब पीने और सुबह तक जगे रहने में जाता था लेकिन 7 साल पहले जब उन्होंने इस्लाम कबूला तो उनका जीवन बदल गया। अब रिजवी हिजाब पहने और नमाज पढ़ते हुए नजर आती हैं। 

बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री ‘दिस गर्ल चेंज्ड-पर्सीफोन’ में वह बताती हैं कि चाहे बात एटिट्यूड की हो या फिर शब्दों के इस्तेमाल की, उनमें एक तरह का घमंड था। लेकिन इस्लाम ने उनके स्वभाग को बेहतर किया। उनके अनुसार आज वो अच्छे से लोगों से बात करती हैं। उनके स्वभाग में किसी की चुगली करना या गॉसिप करना बिलकुल गायब हो गया है और ये सबका श्रेय वो इस्लाम को देती हैं।

वो याद करती हैं कि एक समय में उनकी रातें कैसे शराब के नशे में धुंधली रहती थीं। पार्टियाँ कम से कम सुबह के 4-5 बजे तक चलती थीं। ऐसे में एक दिन शराब के नशे में धुत किचन की जमीन पर नंगे लेटे हुए एहसास हुआ कि ये सब अब वो और नहीं कर सकतीं और ये उनके लिए नहीं बना है। कई बार तो उन्होंने अपना जीवन समाप्त करने की भी कोशिश की। उन्होंने उस पार्क के बारे में भी बताया जहाँ उन्होंने सुसाइड करने की सोची थी। 

उन्होंने कहा कि उनकी मानसिक हालात बहुत बेकार हो गई थी। लेकिन इस्लाम ने उन्हें बचाया और उनके माता-पिता ने इसमें उन्हें समर्थन भी दिया। रिजवी बताती हैं कि उन्होंने इस्लाम तब कबूला था जब वो यूनिवर्सिटी में थीं। वो उस समय गर्मियों में एक कॉल सेंटर में जॉब कर रही थीं। वहाँ हलीमा नाम की मुस्लिम लड़की थी। उसके साथ उन्होंने रमदान रखने शुरू किए और इस तरह वह इस्लाम के नजदीक पहुँची। 

वह कहती हैं, “मैं उस समय मजहब स्वीकारने पर विचार नहीं कर रही थी। पर, ये एक चुनौती जैसा था। मेरा इगो कह रहा था कि 30 दिन का रोजा, मैं नहीं कर पाऊँग। जब मैंने पहले रोजा रखा मैंने पार्टी करना, शराब पीना नहीं छोड़ा, लेकिन स्वभाव खुद बदल गया। मुझे लगने लगा कि मैं जो हूँ उससे भी कई ज्यादा अच्छी हूँ।”

वह कहती हैं कि उनके माता-पिता ईसाई धर्म को लेकर उनमें समझ विकसित करना चाहते थे लेकिन उसे थोपना नहीं चाहते थे। उनके मुताबिक, “यूनिवर्सिटी के पहले साल में मैंने इस्लाम पर पढ़ा और मुस्लिम बनने का निर्णय लिया। फिर एक दिन घर में हिजाब पहन बताया- अब मैं मुसलमान हूँ।” वह कहती हैं, “माता-पिता हैरान-परेशान थे लेकिन वो नाखुश नहीं थे। उन्होंने मुझसे सवाल किया लेकिन मुझे पता था कि मैं सही हूँ।”

उन्होंने बताया, “मैंने यूनिवर्सिटी में शाहदा (इस्लाम कबूलने के लिए शपथ) ली थी। इसके लिए कोई प्लान नहीं था। मैं अपने सवालों के साथ सैल्फॉर्ड के मस्जिद गई और इमाम ने उसका जवाब दिया। बाद में वह बोले- मेरे पीछे दोहराओ…मैंने भी कहा ठीक है। इसके बाद वह बोले- मुबारक हो! तुम अब मुसलमान बन गई हो! मैं बहुत भावुक हो गई और खुश थी कि आखिरकार ये कर दिखाया।”

ऑपइंडिया स्टाफ़: कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया