पश्चिम ने पुरानी सभ्यताओं को खून और बलि के नाम पर बर्बर कहा। ईसाई परंपरा को आध्यात्मिक ऊँचाई बताया। लेकिन चर्च के केंद्र में भी रोटी और वाइन के जरिए शरीर और रक्त का अनुष्ठान बैठा है। सभ्यता की कहानी इतनी साफ नहीं।
लोकतंत्र इंसान की कमियों को स्वीकार कर समझौतों से चलता है। लेकिन सोशल मीडिया का अनियंत्रित दौर हर छोटी कमी को भ्रष्टाचार बताकर लोकतंत्र की बुनियाद पर चोट कर रहा है। कैसे आज का सोशल मीडिया और डिजिटल यूटोपियनवाद हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है।
सवाल उनसे है जो गाय, गोबर और गौमूत्र का नाम सुनते ही मजाक बनाने लगते हैं- जब यही व्यवस्था किसान का खर्च घटाकर उसकी आय बढ़ा रही है और तो उपहास किस बात का है?