जय श्रीराम का नारा कम्युनल है क्या? – फेसबुक प्रमुख से पूछे गए कई सवाल, 150 से ज्यादा का नहीं मिला जवाब

फेसबुक पर उठे सवाल (फोटो साभार: द न्यूयॉर्क टाइम्स)

सोशल मीडिया के बड़े प्लेटफॉर्म फेसबुक की निष्पक्षता को लेकर हर राजनैतिक दल के मन में बड़ा सवाल है। सत्ताधारी पार्टी को लग रहा है कि फेसबुक विपक्ष से साँठ-गाँठ किए बैठा है और विपक्ष को लग रहा है कि फेसबुक के भाजपा से लिंक हैं। 

ऐसी उठा पटक के बीच में बुधवार (सितंबर 2, 2020) को संसदीय समिति की बैठक हुई। इस बैठक में फेसबुक भारत के प्रमुख अजित मोहन शामिल हुए। समिति की अध्यक्षता शशि थरूर ने की। यह बैठक करीब 3 घंटे चली। इस बैठक में दोनों पक्षों ने अजित मोहन के सामने फेसबुक के झुकाव के बारे में बात की।

एक ओर कॉन्ग्रेस सांसदों की ओर से हेटस्पीच के कई उदाहरण दिए गए। वहीं, दूसरी ओर से भाजपा के सांसदों ने फेसबुक से कई तीखे सवाल कर डाले। भाजपा ने अजित मोहन से जय श्रीराम के नारे से लेकर कश्मीर मुद्दे पर उनकी राय माँगी।

उन्होंने पूछा कि क्या जय श्रीराम कहना फेसबुक की पॉलिसी के हिसाब से सांप्रदायिक है? उन्होंने मोहन से पूछा कि क्या वह मानते हैं कि कश्मीर में सुरक्षा के नाम पर भारत सरकार आतंक फैला रही है, जैसा कि उन्होंने अपने आलेखों में लिखा है?

इसके अलावा चुनावों में फेसबुक की भूमिका और फेसबुक के कॉन्ग्रेस से संबंधों के बारे में खुल कर पूछा गया। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर क्यों फेसबुक अपने को भारत में बिचौलिया कहता है? फेसबुक के अफसरों का कॉन्ग्रेस नेता अहमद पटेल से क्या रिश्ते हैं? फेसबुक के फैक्ट चैकिंग बोर्ड में शामिल कोई पार्टनर क्या कॉन्ग्रेस के डाटा एनेलेटिक्स में काम कर चुका है?

इसके बाद साल 2019 में लोकसभा चुनावों में दक्षिणपंथी अकाउंट्स को हटाने की बात भी भाजपा सांसदों ने उठाई। उन्होंने पूछा कि क्या यह सही है कि राष्ट्रवादी विचारधारा से जुड़े वे 700 पेज हटाए गए, जिनकी कुल फॉलोइंग 26 लाख से अधिक थी। वहीं कॉन्ग्रेस और वामपंथी विचारधारा से जुड़े जो लेख हटाए गए, उनकी कुल फॉलोइंग 2 लाख थी?

सांसदों ने पूछा कि साल 2019 में फेसबुक ने चुनावों को कितना प्रभावित किया? नरेंद्र मोदी के बयानों के कितने फैक्ट चेक हुए और सोनिया गाँधी के बयानों को कितनी बार चेक किया गया। भाजपा सांसदों ने इस दौरान फेसबुक पर ईस्ट इंडिया कंपनी जैसी नीति अपनाने पर भी सवाल किए। उन्होंने पूछा कि क्या 21 वीं सदी की ईस्ट इंडिया कम्पनी फेसबुक है, जो भारतीय कानूनों को नहीं मानती और बाँटो एवं राज करो के नियम में यकीन करती है? 

यहाँ बता दें, इस संसदीय बैठक में दोनों पक्षों ने फेसबुक कार्रवाई के बारे में अजित मोहन से पूछा। भाजपा ने फैक्ट चेक टीम में प्रतीक सिन्हा के अपॉइंटमेंट पर सवाल उठाए। साथ ही यह भी पूछा कि क्या भाजपा, शिवसेना, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल या आरएसएस से किसी की नियुक्ति वहाँ की गई? जिसका कंपनी ने कोई डेटा उपलब्ध नहीं कराया।

समिति बैठक में शामिल मंत्रियों ने पूछा कि ‘फेसबुक फॉर मुस्लिम’ जैसे ग्रपु पर क्या एक्शन लिया गया। जिस पर फेसबुक की ओर से प्रतिनिधि ने कहा कि उनके पास ऐसी कोई पॉलिसी नहीं है कि वह उसे ब्लॉक करें या ऑब्जेक्ट करें।

कमिटी ने फेसबुक से कंंटेंट को हटाने की संपूर्ण जानकारी माँगी। विशेष तौर पर उस कंटेंट को हटाने की, जो साल 2019 में चुनाव के दौरान हटाए गए। उन्होंंने उदाहरण देते हुए पूछा कि सिख फॉर जस्टिस ग्रुप पर भारत का एक विकृत नक्शा दिखाया गया। लेकिन फेसबुक ने उसे नहीं हटाया जबकि जय श्री राम और देवी-देवताओं की तस्वीर हेट पोस्ट कहकर हटा दी गईं।

कुल मिलाकर इस बैठक में 150 से अधिक प्रश्नों के जवाब अजित मोहन से सांसदों को नहीं मिल पाए। इस बैठक में थरूर के अलावा, निशिकांत दुबे, राज्यवर्धन सिंह राठौर, महुआ मित्रा, सन्नी देओल, लॉकेट चटर्जी, नीतिक प्रमाणिक और नसीर हुसैन शामिल हुए। 

इससे पहले याद दिला दें कि कानून मंत्री रविशंकर ने फेसबुक सीईओ को पत्र लिखा था। पत्र में उन्होंने फेसबुक पर एकतरफा होने की बात कही थी। उन्होंने बताया था कि कैसे साल 2019 में फेसबुक ने दक्षिणपंथियों के अकॉउंटस बंद कर दिए थे या फिर उनकी रीच घटा दी थी। जबकि फेसबुक को तो संतुलित और निष्पक्ष होना चाहिए था। उन्होंने यह भी कहा था कि फेसबुक इंडिया टीम में कई वरिष्ठ अधिकारी एक विशेष राजनीतिक विचारधारा के समर्थक हैं।

ऑपइंडिया स्टाफ़: कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया