कोरोना की आड़ में विस्तार कर रहे इस्लामी आतंकी संगठन, लॉकडाउन का फायदा उठा कर रची जा रही साजिश

इस्लामी आतंक (सांकेतिक चित्र)

मजहबी कट्टरता पर नज़र रखने वाले संगठनों ने आशंका जताई है कि बोको हराम जैसे आतंकी संगठन कोरोना वायरस आपदा की आड़ में अपना प्रभाव बढ़ा रहे हैं। साथ ही 2014 में सीरिया और इराक में कत्लेआम मचाने वाला दाएश भी कोरोना की आड़ में अपने संगठन का विस्तार कर रहा है। वहाँ भी नॉन-मुस्लिमों को निशाना बनाया जा रहा है। इन हमलों को नरसंहार की श्रेणी में रखा जा सकता है।

फिलहाल देश-दुनिया लॉकडाउन से उबरने की कोशिश में लगी है और लोग चहारदीवारी के भीतर बंद रह कर उकता गए हैं। धीरे-धीरे जनजीवन सामान्य बनाने के लिए सभी प्रकार के प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसी आपदा की स्थिति में भी आतंकी संगठनों को चैन नहीं है और वो अपना विस्तार करने में लगातार लगे हुए हैं। बोको हराम और दाएश जैसे आतंकी संगठनों ने कोरोना को अपने लिए एक मौका के रूप में देखा है।

बोको हराम के सबसे बड़े सरगना अबूबकर शेकाउ ने हाल ही में बयान दिया था कि कोविड-19 या कोरोना वायरस संक्रमण आपदा शैतानों द्वारा लाई गई है और इस वायरस की काट के लिए एक ही एंटी-वायरस है और वो है इस्लाम। कई लोग कह रहे हैं कि कोरोना आपदा के बीच दुनिया के सभी देशों को आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में ढील नहीं देनी चाहिए, नहीं तो ‘न्यू ऑर्डर वर्ल्ड’ में इससे निपटने के लिए कोई रणनीति नहीं होगी।

आतंकी संगठन बोको हराम ख़ुद को एक जिहादी संगठन बताता है। इसके बारे में पहली बार 2003 में चर्चा हुई थी। उसके द्वारा किए गए अपराधों में कुछ भी बाकी नहीं रहा है और इसके धीरे-धीरे अपना ख़ासा प्रसार किया है। कहने को तो ये नॉर्थ-ईस्ट नाइजीरिया में आधारित है लेकिन इसने आसपास के सभी पड़ोसी देशों को अपने आतंक से हलकान कर रखा है। एक बात जानने लायक है कि इसके आतंकी हमलों के पीछे इनका मकसद क्या होता है।

जैसे, जो भी पश्चिमी विचारधारा का समर्थन करते पाए जाते हैं या फिर बोको हराम की आलोचना करते हैं, इसके आतंकी उन लोगों के दरवाजे पर दस्तक देने में देर नहीं करते। ये ज्यादातर ईसाइयों को निशाना बनाता है। बताया जाता है कि इसके पीछे उन्हें काफिर मानने वाली सोच है क्योंकि ईसाई अल्लाह को नहीं मानते। महिलाओं और बच्चों पर हमला करना इसका ट्रेंड रहा है। महिलाओं और लड़कियों का यौन शोषण, उनसे जबरन मजदूरी करवाना और उनका बलात्कार करना इसके लिए आम बात है।

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‘इस्लामिक स्टेट वेस्ट अफ्रीका प्रोविंस (ISWAP)’ भी इससे सम्बद्ध आतंकी संगठन ही है। ये बुर्किना फासो, कैमरून, चाड, नाइजर और नाइजीरिया में आतंकी हमले करता है। ज्यादातर हमले नॉन-मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर होते हैं। मजहबी अत्याचार पर नज़र रखने वाले संगठन ‘ओपन डोर्स’ ने बताया है कि बोको हराम अपने संगठन विस्तार के लिए बेचैन है। इसने मार्च 2020 में चाड में हमला बोल कर 98 सैनिकों को मार डाला।

अफ्रीका के सब-सहारा क्षेत्रों में ये अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। वहीं अगर दाएश की बात करें तो उसके अपराधों में हजारों लोगों को मार डालना, महिलाओं और लड़कियों को यौन दासता के लिए मजबूर करना और लड़कों को जबरदस्ती अपने संगठन में भर्ती करना शामिल है। 6 साल पहले किए गए अपराधों के कई पीड़ित अभी तक मिसिंग हैं। अल्पसंख्यक समुदायों की जनसंख्या वहाँ आधी रह गई है। जो बचे हैं, वो डर के जी रहे हैं।

हालाँकि, दाएश के ख़िलाफ़ सफलता जरूर मिली है लेकिन अमेरिका का कहना है कि युद्ध अभी ख़त्म नहीं हुआ है। हाल ही में उसने इराक में कुछ सैनिकों को मार डाला था। विशेषज्ञों का कहना है कि दाएश भी इराक के लिए एक बड़ा खतरा बना हुआ है। इसने अपने आतंकियों को पश्चिमी देशों और उनके लोगों पर हमले करने को कहा है। पश्चिम की कमजोरियों का फायदा उठाया जा रहा है क्योंकि वो फ़िलहाल कोरोना से निपटने में व्यस्त हैं।

अगर भारत की बात करें तो यहाँ भी जम्मू कश्मीर में आतंकियों की गतिविधि बढ़ गई है। हाल ही में घाटी में सरपंच अजय भारती पंडिता की हत्या कर दी गई। सुरक्षा बलों ने 2 सप्ताह में 22 आतंकियों को मार गिराया है, जिनमें से 6 बड़े सरगना थे। इससे पता चलता है कि यहाँ भी वो कोरोना की आड़ में सक्रियता बढ़ा रहे हैं लेकिन सेना पहले से सख्त थी।

ऑपइंडिया स्टाफ़: कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया