परिवार न होना, सत्ता का लालच न होने की गारंटी नहीं, यकीन न हो तो पढ़े मलिक काफूर की कहानी

प्रतीकात्मक चित्र

अगर आने वाली पीढ़ियों के लिए सत्ता सुख छोड़ने का लोभ न हो, तो मनुष्य जनहित की सोचेगा और दूसरे कई शासकों की तरह सत्ता-संपत्ति को अपने ही परिवार की बपौती बनाए रखने पर ध्यान नहीं देगा, ऐसा लोग सोचते/मानते हैं। संभवतः इतिहास उलटकर न देखने का ऐसा नतीजा हुआ होगा। इतिहास के हिसाब से देखें तो ऐसा होना जरूरी नहीं है। उदाहरण के तौर पर हम मलिक काफूर को देख सकते हैं।

खम्भात पर हुए 1299 के आक्रमण में अलाउद्दीन खिलजी के एक सिपहसालार ने उसे पकड़ा था। कुछ उस काल के लिखने वाले बताते हैं कि उससे इस्लाम कबूल करवाकर खिलजी को सौंपा गया था। कुछ दूसरे इतिहासकार मानते हैं कि उसे 1000 दीनार की कीमत पर खरीदा गया था, इसीलिए काफूर का एक नाम ‘हजार दिनारी’ भी था। जो भी हो, 1306 आते-आते मलिक काफूर फौज़ी मामलों में अच्छा दखल रखने लगा था।

1309-11 के बीच उसने दक्षिण की ओर कदम बढ़ाए। काकतीय, होयसल और पांड्या जैसे राज्यों पर विजय पाने के बाद उसका दबदबा दरबार में भी काफी बढ़ चुका था। सलीम किदवई जैसे इतिहासकार मानते हैं कि मलिक काफूर और अलाउद्दीन खिलजी में समलैंगिक सम्बन्ध थे। अपने अंतिम दिनों में खिलजी सब कुछ भुला कर काफूर के चक्कर में पड़ा था।

खिलजी के बेटों- खिज्र खान और शादी खान की शादियाँ जिस मनसबदार अलप खान की बेटियों से हुई थी, उससे काफूर की अदावत भी रही। खिलजी की मौत के वक्त जब सत्ता की जंग शुरू हुई तो काफूर ने खबर उड़ाई कि खिज्र खान, उसकी बीवी और उसके ससुर अलप खान ने मिलकर खिलजी को जहर देने की साजिश रची थी। इस अफवाह की वजह से उसे अलप खान का क़त्ल करने का मौका मिल गया।

खिलजी के दो बेटों- ख़िज्र खान और शादी खान को काफूर ने अँधा करवा कर कैद कर दिया। काफूर कुल 30 दिन के आस-पास ही सुल्तान रहा था, वो भी सीधी तरह सुल्तान नहीं! उसने खिलजी के ही बेटे (छह साल के) शिहाबुद्दीन को शासक बनाया और उसकी माँ, यानी खिलजी की विधवा से निकाह रचा लिया। उसके खिलाफ दरबार में ही साजिशें शुरू हो गई थीं।

अलाउद्दीन खिलजी के पूर्व अंगरक्षक मुबश्शिर, बशीर, सालेह और मुनीर, मिलकर काफूर की हत्या की योजना बना रहे थे। शक की वजह से एक रात काफूर ने मुबश्शिर को अपने कमरे में बुलवाया। किस्मत से मुबश्शिर और उसके साथियों के पास बादशाह का अंगरक्षक होने की वजह से काफी पहले से ही हर जगह हथियार ले जाने की इजाजत थी। फ़रवरी, 1316 में किसी रोज जब काफूर ने उसका क़त्ल करने की कोशिश की, तो उल्टा वही मुबश्शिर के हाथों मारा गया।

उसका समलैंगिक और नपुंसक होना उसके खिलाफ जाता था लेकिन फिर भी उसके टूटे-फूटे मकबरे को फ़िरोज़ शाह तुगलक ने ठीक करवाया था। आज उसके मकबरे का भी कहीं पता नहीं चलता। बाकी अगर ऐसा लगता हो कि परिवार, बीवी बच्चों का न होना, लोगों को सत्ता के लालच से दूर रखेगा, तो इतिहास ऐसा नहीं सिखाता। हाँ आपको मानना हो, तो जरूर मान लीजिए।

Anand Kumar: Tread cautiously, here sentiments may get hurt!