भारत ने अपनी वायु शक्ति को मजबूत करने की दिशा में एक और अहम कदम बढ़ाया है। रक्षा खरीद बोर्ड (DPB) ने फ्रांस की विमान निर्माता कंपनी डसॉल्ट एविएशन से 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इस फैसले को भारतीय वायुसेना की युद्धक क्षमता में बड़ा इजाफा माना जा रहा है।
DPB की अध्यक्षता रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह करते हैं। अब यह प्रस्ताव रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) के पास जाएगा, जिसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह करते हैं। वहाँ से मंजूरी मिलने के बाद अंतिम फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) लेगी।
जल्द फाइनल हो सकता है सौदा
रक्षा सूत्रों के अनुसार, भारत और फ्रांस इस समझौते को फरवरी तक अंतिम रूप देने की कोशिश में हैं। इसी दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के बीच उच्चस्तरीय बैठक प्रस्तावित है। माना जा रहा है कि इस बैठक के एजेंडे में राफेल सौदा प्रमुख मुद्दा होगा।
भारतीय वायुसेना ने पिछले साल औपचारिक रूप से रक्षा मंत्रालय से 114 अतिरिक्त राफेल लड़ाकू विमानों की माँग की थी। यह माँग वायुसेना की स्क्वाड्रन संख्या को दोबारा मजबूत करने की व्यापक योजना का हिस्सा है।
स्वदेशी फाइटर प्रोजेक्ट्स पर नहीं पड़ेगा असर
अधिकारियों ने साफ किया है कि राफेल की खरीद से भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रमों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। पाँचवीं पीढ़ी के फाइटर प्रोजेक्ट एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) और तेजस मार्क-2 अपने तय समय और बजट के अनुसार आगे बढ़ते रहेंगे।
रक्षा मंत्रालय पहले ही हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को 180 तेजस मार्क-1A विमानों का ऑर्डर दे चुका है। अधिकारियों का कहना है कि स्वदेशी विमानों की योजनाएँ और राफेल की खरीद, दोनों को अलग-अलग तरीके से आगे बढ़ाया जा रहा है।
वायुसेना ने राफेल को क्यों दी प्राथमिकता?
भारतीय वायुसेना की राफेल के प्रति प्राथमिकता के पीछे कई व्यावहारिक कारण हैं। वायुसेना पहले से ही 36 राफेल विमानों का संचालन कर रही है, जबकि भारतीय नौसेना ने 26 राफेल-मरीन विमानों का ऑर्डर दिया है। एक ही प्रकार के ज्यादा विमान होने से रखरखाव और संचालन की लागत कम होती है।
इसके अलावा अंबाला स्थित वायुसेना बेस पर राफेल के लिए ट्रेनिंग और मेंटेनेंस, रिपेयर व ओवरहॉल (MRO) सुविधा पहले से मौजूद है। वायुसेना के पास जरूरी जगह, उपकरण, स्पेयर पार्ट्स और प्रशिक्षित स्टाफ भी उपलब्ध है, जिससे बिना किसी देरी के कम से कम दो स्क्वाड्रन यानी करीब 36 से 38 विमानों को शामिल किया जा सकता है।
मेक इन इंडिया, तकनीक हस्तांतरण और भारतीय हथियार
ये 114 राफेल विमान अंतर-सरकारी समझौते (IGA) के तहत खरीदे जाएँगे और ‘मेक इन इंडिया’ मार्ग पर आगे बढ़ेंगे। डसॉल्ट एविएशन भारतीय कंपनियों के साथ साझेदारी करेगा और विमान के अहम हिस्सों के निर्माण के लिए तकनीक का हस्तांतरण करेगा।
फ्रांस की कंपनियाँ सफ्रान और थेल्स भी इस तकनीक हस्तांतरण प्रक्रिया का हिस्सा होंगी। इसमें एयरफ्रेम, इंजन और एवियोनिक्स शामिल होंगे। इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद विमानों में स्वदेशी सामग्री की हिस्सेदारी 55 से 60 प्रतिशत तक पहुँचने की उम्मीद है।
सभी 114 राफेल विमानों में भारतीय हथियार, मिसाइलें और गोला-बारूद लगाए जाएँगे। डसॉल्ट सुरक्षित डेटा लिंक भी उपलब्ध कराएगा, जिससे भारतीय रडार और सेंसर के साथ डिजिटल रूप से बेहतर तालमेल बनेगा और जमीन पर मौजूद कंट्रोलर्स के साथ रियल टाइम में तस्वीरें और डेटा साझा किया जा सकेगा।
निर्माण क्षेत्र को मिलेगा बड़ा बढ़ावा
जून में डसॉल्ट एविएशन और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL) ने भारत में राफेल के फ्यूजलाज सेक्शन के निर्माण के लिए चार उत्पादन हस्तांतरण समझौतों पर हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत हैदराबाद में एक नई हाई-टेक फैक्ट्री स्थापित की जाएगी, जहां विमान के आगे, मध्य और पीछे के फ्यूजलाज हिस्सों का निर्माण होगा।
वित्त वर्ष 2028 से पहले फ्यूजलाज सेक्शन का उत्पादन शुरू होने की उम्मीद है। यह संयंत्र हर महीने दो पूरे फ्यूजलाज बनाने में सक्षम होगा। इससे भारत के एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मजबूती मिलेगी और वैश्विक सप्लाई चेन में देश की भूमिका और मजबूत होगी।
पिछले साल अप्रैल में भारत ने भारतीय नौसेना के लिए 26 राफेल-मरीन लड़ाकू विमानों की खरीद को लेकर फ्रांस के साथ करीब 63,000 करोड़ रुपए का सौदा किया था। इस ऑर्डर में 22 सिंगल-सीटर लड़ाकू विमान और चार ट्विन-सीटर ट्रेनर विमान शामिल हैं। इन विमानों की डिलीवरी 2031 तक पूरी होने की योजना है।

