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युवाओं का सपना, मोदी सरकार के सुधार: जानें कैसे ‘विक्रम-1’ ने रच दिया भारत के स्पेस सेक्टर का नया इतिहास

स्काईरूट एयरोस्पेस की शुरुआत 2018 में दो युवा पूर्व ISRO वैज्ञानिकों पवन कुमार चंदाना और नागा भरत डाका ने रखी थी। दोनों के सामने सुरक्षित नौकरी, बेहतर वेतन और विदेश में करियर बनाने जैसे कई विकल्प थे, लेकिन उन्होंने आसान रास्ता चुनने के बजाय भारत में ही ग्लोबल लेवल स्पेस-टेक कंपनी खड़ी करने का जोखिम उठाया।

एक तरफ दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले एक महीने से युवाओं का एक धड़ा ‘क्रांति की राजनीति’ के जरिए व्यवस्था बदलने की बात कर रहा है। वहीं, युवाओं के दूसरे धड़े ने बिना शोर-शराबे के देश के इतिहास में ऐसा कीर्तिमान दर्ज कर दिया, जिसकी गूँज सिर्फ भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के स्पेस सेक्टर में सुनाई दे रही है। हैदराबाद के कुछ युवा इंजीनियरों ने नौकरी के सुरक्षित रास्ते छोड़कर जोखिम चुना, भारत में ही कंपनी बनाई और आखिरकार भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ सफलतापूर्वक अंतरिक्ष की कक्षा तक पहुँचा दिया।

यह सिर्फ एक रॉकेट लॉन्च नहीं, बल्कि उस नए भारत की कहानी है, जहाँ युवा अब दुनिया के लिए तकनीक बनाने के बजाय उसका नेतृत्व करने का सपना देख रहे हैं।

क्यों ऐतिहासिक है विक्रम-1 की सफलता?

18 जुलाई 2026 को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से स्काईरूट एयरोस्पेस का विक्रम-1 सफलतापूर्वक लॉन्च हुआ। यह भारत का पहला ऐसा ऑर्बिटल रॉकेट है, जिसे किसी निजी भारतीय कंपनी ने डिजाइन, विकसित और लॉन्च किया। मिशन ‘आगमन’ के तहत रॉकेट के कई तकनीकी पेलोड को लो-अर्थ ऑर्बिट तक पहुँचाया। इसके साथ ही भारत उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल हो गया, जहाँ निजी कंपनियाँ भी ऑर्बिटल लॉन्च करने में सक्षम हैं।

करीब 22 मीटर ऊँचा विक्रम-1 छोटे सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजने के लिए बनाया गया है। इसकी क्षमता 350 किलोग्राम तक के पेलोड को लो-अर्थ ऑर्बिट में पहुँचाने की है। इसमें कार्बन-कम्पोजिट संरचना और 3D-प्रिंटेड इंजन जैसी अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है।

कैसे दो युवाओं ने स्काईरूट की शुरुआत की?

स्काईरूट एयरोस्पेस की शुरुआत 2018 में दो युवा पूर्व ISRO वैज्ञानिकों पवन कुमार चंदाना और नागा भरत डाका ने रखी थी। दोनों के सामने सुरक्षित नौकरी, बेहतर वेतन और विदेश में करियर बनाने जैसे कई विकल्प थे, लेकिन उन्होंने आसान रास्ता चुनने के बजाय भारत में ही ग्लोबल लेवल स्पेस-टेक कंपनी खड़ी करने का जोखिम उठाया।
उस समय निजी क्षेत्र के लिए रॉकेट बनाना और उसे अंतरिक्ष की कक्षा तक पहुँचा लगभग असंभव माना जाता था।

इसके बावजूद दोनों ने देश के प्रतिभाशाली युवा इंजीनियरों को साथ जोड़ना शुरू किया और देखते ही देखते एक ऐसी टीम तैयार कर दी, जिसने भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट बनाने का सपना साकार कर दिखाया। ‘विक्रम-1’ की सफल लॉन्चिंग सिर्फ स्काईरूट की उपलब्धि नहीं, बल्कि उन सैंकड़ों युवा भारतीय इंजीनियरों की मेहनत, नवाचार और आत्मविश्वास का नतीजा है, जिन्होंने साबित कर दिया कि भारत के युवा अब वैश्विक तकनीक का केवल हिस्सा नहीं, बल्कि उसका नेतृत्व करने की क्षमता भी रखते हैं।

कैसे मोदी सरकार के फैसलों से सपना हुआ साकार?

अगर 2020 के बाद भारत में स्पेस सेक्टर के लिए बडे़ सुधार नहीं हुए होते, तो शायद स्काईरूट जैसी कंपनियों का यह सपना इतनी जल्दी पूरा नहीं हो पाता। केंद्र की मोदी सरकार ने 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने का फैसला लिया। इसके बाद IN-SPACe (Indian National Space Promotion and Authorization Centre) की स्थापना हुई, जिसने निजी कंपनियों को ISRO की परीक्षण सुविधाएँ, लॉन्च पैड और तकनीक सहयोग उपलब्ध कराया।

इसके साथ ही Newspace India Limited (NSIL) के जरिए व्यावसायिक अवसर भी बढ़ाए गए। इन सुधारों ने भारतीय स्टार्टअप्स के लिए वह रास्ता खोला, जिस पर चलकर स्काईरूट जैसी कंपनियाँ ग्लोबल स्पेस मार्केट में उतर सकीं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विक्रम-1 मिशन को भारत के अंतरिक्ष इतिहास का नया अध्याय बताया। लॉन्च से पहले उन्होंने कहा कि यह मिशन भारत के युवाओं की प्रतिभा, नवाचार और उद्यमशीलता का प्रतीक है तथा स्पेस सेक्टर में किए गए सुधारों का प्रत्यक्ष परिणाम है।

क्यों कहा जा रहा ‘मील का पत्थर’?

विक्रम-1 की सफलता स्काईरूट की मंजिल नहीं, बल्कि शुरुआत है। कंपनी पहले ही अधिक पेलोड क्षमता वाले विक्रम-2 जैसे अगले लॉन्च व्हीकल पर काम कर रही है। लक्ष्य है अंतरिक्ष तक पहुँच को सस्ता, तेज और नियमित बनाना ताकि भारत वैश्विक लॉन्च मार्केट में बड़ी हिस्सेदारी हासिल कर सके।

भारत ने पहले ही अंतरिक्ष विज्ञान में चंद्रयान और मंगलयान जैसी ऐतिहासिक सफलताएँ हासिल की हैं, लेकिन वे सरकारी एजेंसियों के नेतृत्व में थीं। विक्रम-1 ने पहली बार यह साबित किया है कि भारतीय निजी क्षेत्र भी ऑर्बिटल रॉकेट बनाकर उसे सफलतापूर्वक अंतरिक्ष तक पहुँचाने की क्षमता रखता है।

यही वजह है कि इस लॉन्च को सिर्फ एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत के स्पेस सेक्टर के नए दौर की शुरुआत माना जा रहा है। आने वाले वर्षों में यदि भारत ग्लोबल स्पेस इकोनॉमी का बड़ा केंद्र बनता है, तो इतिहास में 18 जुलाई 2026 और विक्रम-1 के इस मिशन को उसी शुरुआत के रूप में याद किया जाएगा।

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पूजा राणा
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