जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान महिला को उसके पार्टनर से अंतरिम भरण-पोषण (इंटरिम मेंटेनेंस) मिलने की मान्यता पर संदेह जताया है। महिला ने अपने पार्टनर के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज कराया था।
महिला का तर्क था कि वे विवाहित नहीं थे, लेकिन लगभग दस साल तक पति-पत्नी जैसे जीवन व्यतीत किया और उनके बीच 2016 में एक बच्चा भी हुआ। महिला का कहना था कि इस आधार पर उसे पति के रूप में मानकर भरण-पोषण का अधिकार है।
कोर्ट ने कहा कि यदि दोनों ने वास्तव में पति-पत्नी जैसी सहजीवन संबंध में जीवन बिताया है, तो उस सहजीवन को बलात्कार का आधार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 376 आईपीसी के तहत अपराध तब ही बनता है जब सहजीवन संबंध मौजूद न हो।
महिला ने दावा किया कि उसके पार्टनर ने उसे विवाह का झांसा देकर संबंध बनाए और खुद को अविवाहित बताया। इसके बाद जब उसने विवाह की माँग की तो पुरुष ने इसे ठुकरा दिया। महिला ने बलात्कार का मामला दर्ज कराया, जिसमें पुरुष को धारा 376 आईपीसी के तहत दोषी करार दिया गया और जेल की सजा सुनाई गई।
इस घटना के बाद महिला ने अपने और बच्चे के लिए भरण-पोषण की माँग की। प्रारंभिक अदालत ने महिला और उसके बच्चे के लिए ₹2,000 और ₹1,000 का अंतरिम भरण-पोषण निर्धारित किया। इसके विरोध में पुरुष ने सेशंस कोर्ट में चुनौती दी, हालाँकि ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया।
महिला ने हाई कोर्ट में अपील की। उनके वकील ने तर्क दिया कि उन्होंने लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में जीवन व्यतीत किया, बच्चे को जन्म दिया और उसे परित्यक्त साथी के रूप में संरक्षण मिलने का अधिकार है। उन्होंने धारा 125 CrPC के तहत संरक्षण पाने के लिए पहले के न्यायिक निर्णयों का हवाला दिया।
उच्च कोर्ट ने कहा कि यदि दोनों ने सच में पति-पत्नी जैसा जीवन व्यतीत किया है, तो सहजीवन का आधार बलात्कार का आरोप नहीं बन सकता। चूंकि पुरुष धारा 376 IPC के तहत दोषी है, इसलिए उसे महिला का अंतरिम भरण-पोषण देने का दायित्व नहीं ठहराया जा सकता।
कोर्ट ने सेशंस कोर्ट का निर्णय बनाए रखा और कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अंतरिम भरण-पोषण देने में गलती की।

