ईरान-US के बीच मध्यस्थ बनने के चक्कर में बर्बाद हो रहा पाकिस्तान, 15 दिनों से इस्लामाबाद में लॉकडाउन: रोटी-रोजगार के बिना तड़प रहे लोग

पाकिस्तान की अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता करने की चाहत अब खुद उसके गले की फाँस बन गई है। राजधानी इस्लामाबाद और सैन्य मुख्यालय रावलपिंडी पिछले दो हफ्तों से पूरी तरह ठप हैं। आलम यह है कि लोग इसे कोरोना काल के लॉकडाउन जैसा बता रहे हैं, लेकिन फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार कारण कोई वायरस नहीं, बल्कि वह शांति वार्ता है जिसका अभी तक कोई ठिकाना नहीं है।

सड़कों पर सन्नाटा, घरों में कैद लोग

इस्लामाबाद और रावलपिंडी को जोड़ने वाली सड़कें और VVIP जोन पूरी तरह सील कर दिए गए हैं। 10,000 से ज्यादा सुरक्षाकर्मी तैनात हैं। नूर खान एयरबेस के पास के इलाके और रेड जोन बंद होने से दफ्तरों में ‘वर्क फ्रॉम होम’ लागू है।

19 अप्रैल से ही माल ढुलाई और पब्लिक ट्रांसपोर्ट बंद है। यूनिवर्सिटी ऑनलाइन चल रही हैं और बाजार वीरान पड़े हैं। लोगों का कहना है कि उन्हें ऐसा लग रहा है जैसे वे किसी पिंजरे में कैद हैं।

मजदूरों और व्यापारियों पर दोहरी मार

इस ‘पीस लॉकडाउन’ ने दिहाड़ी मजदूरों और छोटे दुकानदारों की कमर तोड़ दी है। हॉस्टलों में रहने वाले हजारों छात्रों और कामगारों को सरकारी आदेश के बाद रातों-रात बाहर निकाल दिया गया, जिससे उन्हें दर-दर भटकना पड़ा।

ड्राइवरों और रेस्टोरेंट मालिकों की कमाई 30% तक गिर गई है। वहीं, ईरान-अमेरिका युद्ध की वजह से तेल और गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे पाकिस्तान में गंभीर ऊर्जा संकट पैदा हो गया है।

बढ़ता जन आक्रोश और सरकार की उम्मीदें

एक तरफ सरकार और पूर्व राजनयिक इस वार्ता को पाकिस्तान की ग्लोबल छवि के लिए बड़ा मौका मान रहे हैं। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और जनरल आसिम मुनीर को नोबेल शांति पुरस्कार देने तक की माँग उठी है।

दूसरी ओर, आम जनता और पत्रकार नाराज हैं। पूर्व मंत्री असद उमर और वरिष्ठ पत्रकारों ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि वार्ता शुरू होने का कोई अता-पता नहीं है, लेकिन जनता का जीना मुहाल कर दिया गया है। लोगों का साफ कहना है कि सरकार को गरीबों की फिक्र नहीं है।