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‘दिल्ली में नहीं हारी ‘सांप्रदायिक भाजपा’: INDI गठबंधन के साथ मजबूती से खड़े हैं, फिर भी BJP की जीत से छलक आया उनका दर्द

दिल्ली की आबादी में मुसलमानों की संख्या लगभग 12.9% है। राजनीतिक अनुमानों के अनुसार उत्तर पूर्व लोकसभा क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं का प्रतिशत 20.7% तक है।

लोकसभा चुनाव के नतीजे भले ही बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए की उम्मीदों के मुताबिक न रहे हों, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उनका प्रदर्शन शानदार रहा है और सभी उम्मीदों से बढ़कर रहा है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी और कॉन्ग्रेस गठबंधन को भगवा पार्टी ने हराया, जिसने राष्ट्रीय राजधानी की सभी सात सीटों पर जीत हासिल की। ​​टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, बीजेपी की भारी जीत मुस्लिम समुदाय के लोगों को पसंद नहीं आई।

लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजे सामने आने के बाद दिल्ली में 35 साल के महफूज आलम ने कहा, “ऐसा लगता है कि हमारे वोटों का कोई खास महत्व नहीं रहा। लोकसभा चुनाव में, बीजेपी के खिलाफ सीधे मुकाबले में समुदाय का प्रभाव सीमित है। हम बीजेपी के झूठे वादों से निराश हैं, जो नफरत और समुदाय को बाँटने का काम करते हैं। हालाँकि, हम आने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर आशावादी नजरिया रखते हैं।”

2011 की जनगणना के अनुसार, दिल्ली की आबादी में मुसलमानों की संख्या लगभग 12.9% है। राजनीतिक अनुमानों के अनुसार उत्तर पूर्व लोकसभा क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं का प्रतिशत 20.7% तक है। चाँदनी चौक (14%), पूर्वी दिल्ली (16.8%), नई दिल्ली (16.8%), उत्तर पश्चिम दिल्ली (10.6%), दक्षिण दिल्ली (7%), और पश्चिमी दिल्ली (6.8%) अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में से हैं जहाँ मुस्लिम आबादी अच्छी खासी है। उत्तर पूर्व विधानसभा में 58.3% वोट के साथ सीलमपुर विधानसभा में सबसे ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं, जो इसके बाद मुस्तफ़ाबाद और बाबरपुर का स्थान रहा, जहाँ मुस्लिम आबादी सबसे ज़्यादा थी। हालाँकि, कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार कन्हैया कुमार को भाजपा के मनोज तिवारी ने 1.3 लाख से ज़्यादा वोटों के अंतर से हरा दिया।

जोहरीपुर निवासी मोहम्मद मुश्ताक ने कहा कि आम जनता का झुकाव बीजेपी के पक्ष में था। नंद नगरी के एक व्यापारी अदनान जैन ने कहा, “कन्हैया कुमार के साथ समस्या यह है कि वह जमीनी स्तर पर लोगों से उतना नहीं मिले, जितना उन्हें मिलना चाहिए था। प्रभाव के लिए ऑनलाइन जोशीले भाषण देना पर्याप्त नहीं है। आप जिस व्यक्ति का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, उसके साथ पारस्परिक संबंध बनाना महत्वपूर्ण है।”

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के एक एक वोटर ने कहा कि मनोज तिवारी का काम खराब था, लेकिन लोगों ने उन्हें नहीं, बल्कि पीएम मोदी की मजबूत ब्रांड वैल्यू की वजह से उन्हें वोट दिया। उन्होंने उम्मीद जताई कि मनोज तिवारी के तीसरे कार्यकाल के दौरान कचरा प्रबंधन, पेयजल और मच्छरों जैसी समस्याओं का समाधान किया जाएगा। चाँदनी चौक लोकसभा क्षेत्र में चाँदनी चौक, मटिया महल और बल्लीमारान विधानसभा सीटें दिल्ली में तीन अन्य महत्वपूर्ण मुस्लिम बहुल इलाके हैं, जहाँ वोट प्रतिशत क्रमशः 56.8%, 67.20% और 64.7% रहा। पूर्वी दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र के मुस्लिम बहुल ओखला में मतदान प्रतिशत 52.2% रहा। साल 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों की तुलना में दिल्ली में कम मतदान प्रतिशत को मुस्लिम समुदाय के लोगों ने लोगों ने बीजेपी की जीत की वजह बताया।

बल्लीमारान के व्यापारी सरीम उल्लाह ने आरोप लगाया कि बहुत सी महिलाएँ घर के अंदर ही रहीं और गर्मी की वजह से वोटिंग ही नहीं की। मटिया महल में एस खान ने कहा, “हम एक ऐसी सरकार चाहते थे, जो लोगों को सुरक्षा दे और सभी के साथ समान व्यवहार करे। ये नतीजे हमारे लिए झटका हैं। अगर वोटिंग प्रतिशत अधिक रहती, तो कॉन्ग्रेस आसानी से जीत जाती।’

पूर्वी दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र के 33 वर्षीय निवासी नसीम ने आप के उम्मीदवार के जीतने की उम्मीद की थी। वहीं, दक्षिणी दिल्ली के गोविंदपुरी निवासी शरीफ अहमद का कहना है कि जीतने वाले उम्मीदवारों को लोगों का ज्यादा साथ मिला, लेकिन इंडी गठबंधन ने पूरे देश में बीजेपी को कड़ी टक्कर दी।

मुस्लिमों के वोट के अधिकार बनाम हिंदू सांप्रदायिकता का अजीब मामला

आँकड़े साफ बताते हैं कि मुस्लिमों ने बीजेपी को हराने के लिए विपक्षी गठबंधन को एकमुश्त समर्थन दिया। उन्होंने इंडी गठबंधन की सरकार बनाने के लिए इंडी गठबंधन के पक्ष में मास वोटिंग की, हालाँकि उनकी इच्छा पूरी नहीं हुई। खास बात ये है कि जिसे मुस्लिम समुदाय विभाजनकारी मोदी सरकार कहती है, उस मुस्लिम समुदाय को मोदी सरकार की पीएम आवास योजना, पीएम जन धन जैसी योजनाओं का बहुत लाभ हुआ है । इसके अलावा मोदी सरकार अल्पसंख्यकों के लिए तमाम अन्य कल्याणकारी योजनाएँ चलाई। हालाँकि, मुस्लिमों ने बीजेपी के लिए वोट नहीं किया और अपने पुराने पैटर्न के हिसाब से बीजेपी के विरोध में ही वोटिंग की।

बड़ी विडंबना ये है कि मुस्लिमों ने कॉन्ग्रेस और टीएमसी जैसी पार्टियों का पूर्ण समर्थन सिर्फ धार्मिक आधार पर किया, जो समाज के अन्य कमजोर समुदायों की जगह मुस्लिम तुष्टिकरण की राह पर चलते हैं। हालाँकि देश का दूसरा सबसे बड़ा वोटिंग ग्रुप सिर्फ इसलिए पहले को सांप्रदायिक कहता है, क्योंकि उनके धार्मिक रीति-रिवाज अलग हैं।

लोकतंत्र में हर किसी को वोट देने का अधिकार है, चाहे वे धर्म, जाति या किसी अन्य कारण से वोट क्यों न दें। लेकिन सवाल यह है कि यही शिष्टाचार बीजेपी के वोटर को क्यों नहीं दिया जाता? मुस्लिम वोट को समुदाय के हितैषी दलों के साथ धर्मनिरपेक्ष क्यों माना जाता है, जबकि भाजपा और उसके वोटर और समर्थकों को नफरती कट्टरपंथी क्यों कहा जाता है? इसके लिए अलग-अलग पैमाने क्यों हैं? मुसलमानों को धार्मिक चश्मे से एक समूह के रूप में वोट देने का लोकतांत्रिक अधिकार है, फिर भी वही लोग भाजपा का समर्थन करने वाले अन्य लोगों की निंदा और उन्हें शर्मिंदा करते हैं।

तमाम शिकायतों और शिकायतों के बावजूद मोदी सरकार में मुस्लिमों या किसी अन्य धार्मिक समुदाय के खिलाफ भेदभाव का कोई सबूत पेश नहीं मिला है, जबकि ऐसे कई मामले मिले हैं, जहाँ ‘धर्मनिरपेक्ष’ दलों की सरकारों ने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों सहित हिंदुओं के खिलाफ पक्षपात किया है। अदालतों और अन्य संवैधानिक निकायों के पास इस स्पष्ट भेदभाव को चुनौती देने के लिए कदम उठाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

सच तो यह है कि विपक्ष मुस्लिम समुदाय को तरजीह दे रहा है और समुदाय इस बात से खुश नहीं है कि मोदी सरकार सभी के साथ समान व्यवहार करती है। भारत में मुस्लिम असहज और बेचैन महसूस कर रहे हैं क्योंकि उन्हें विपक्ष के गुलाबी चश्मे के बिना देखे जाने की आदत नहीं है और उन्हें अन्य भारतीय नागरिकों के समान ही देखा जाता है जो उनकी नज़र में “सांप्रदायिक” है। यह “जब आप विशेषाधिकार के आदी हो जाते हैं, तो समानता उत्पीड़न की तरह लगती है” का एक क्लासिक मामला है।

लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजे

गौरतलब है कि 4 जून 2024 को भारतीय चुनाव आयोग (ECI) ने 2024 के लोकसभा चुनाव में 543 निर्वाचन क्षेत्रों में से 542 के परिणाम घोषित किए। बीजेपी ने 240 सीटें जीती हैं, और कॉन्ग्रेस ने 99 सीटें जीती हैं। बीजेपी ने 2014 में जीती गई 282 सीटों और 2019 में जीती गई 303 सीटों की तुलना में हाल के चुनाव में काफी कम सीटें जीती हैं। दूसरी ओर, कॉन्ग्रेस ने 2019 में 52 और 2014 में 44 की तुलना में 99 सीटें हासिल करते हुए काफी बढ़ोतरी की है। इंडी गठबंधन 230 के आँकड़े को पार करने में सफल रहा, इसके बावजूद वो पीएम नरेंद्र मोदी को तीसरे ऐतिहासिल कार्यकाल से वंचित करने में असफल रहा और पीएम मोदी 9 जून को तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के लिए तैयार हो चुके हैं।

यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में लिखा गया है। मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

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Rukma Rathore
Rukma Rathore
Accidental journalist who is still trying to learn the tricks of the trade. Nearing three years in the profession.

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