क्या भारत की राजनीति का सबसे बड़ा बदलाव चुनावी नतीजों में नहीं, बल्कि राजनीतिक बहस के केंद्र में हुआ है? PM मोदी मजबूत हों या कमजोर, सत्ता में BJP रहे या विपक्ष आए, क्या हिन्दू पहचान और हिन्दू समाज से जुड़े सवाल अब भारतीय राजनीति के केंद्रीय विमर्श का हिस्सा बन चुके हैं?
चिदंबरम की भारत और विकास विरोधी मानसिकता उनके हर फैसले में साफ झलकती है। कभी उन्हें डिजिटल इंडिया से समस्या हुई कभी उन्होंने भगवा आतंक का नैरेटिव गढ़ा।
कॉन्ग्रेस कार्यालय में वंदे मातरम के तीसरे स्टेंजे पर राहुल-सोनिया और खरगे की सावधान मुद्रा खत्म हो गई और आपस में बात कर सेवा दल के व्यक्ति को बुला लिया।