पाकिस्तान में CDF नियुक्ति अधर में, सत्ता और फौज के बीच चल रही सौदेबाजी उजागर: ‘मरी प्लान’ में नवाज शरीफ की वापसी की शर्त, मुनीर को एक्सटेंशन और डुअल पोस्टिंग का समर्थन

पाकिस्तान की राजनीति इस समय बेहद अस्थिर मोड़ पर खड़ी है और इसकी वजह है चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (CDF) के नोटिफिकेशन में हो रही देरी। यह देरी सिर्फ एक औपचारिक प्रक्रिया में अटकाव नहीं है, बल्कि सत्ता के असली खेल का हिस्सा है, जहाँ राजनीति और फौज के बीच समझौते, दबाव और भविष्य की सत्ता संरचना की सौदेबाजी हो रही है।

बताया जा रहा है कि इस देरी के पीछे पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज (PMLN) और फौज प्रमुख जनरल असिम मुनीर के बीच चल रही एक बड़ी डील है, जिसमें आने वाले कई सालों की सत्ता का समीकरण तय हो रहा है।

नवाज-मुनीर डील और ‘मरी प्लान’

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नवाज शरीफ और मरियम नवाज ने जनरल असिम मुनीर के साथ एक सीधी शर्त रखी है, कि अगर असिम मुनीर अपने कार्यकाल को पाँच वर्ष के लिए बढ़ाना चाहते हैं और CDF व COAS दोनों पदों पर बने रहना चाहते हैं, तो बदले में नवाज शरीफ की सत्ता में वापसी सुनिश्चित करनी होगी।

इसी वजह से CDF के नोटिफिकेशन को रोका गया है और इसका इस्तेमाल एक राजनीतिक दबाव तथा सौदेबाजी के औजार के रूप में किया जा रहा है। बताया जा रहा है कि यह पूरा घटनाक्रम एक गुप्त बैठक के बाद शुरू हुआ, जिसे अब ‘मरी प्लान’ के नाम से जाना जा रहा है।

इस बैठक में नवाज शरीफ, शहबाज शरीफ, मरियम नवाज, जनरल असिम मुनीर, मोहसिन नकवी और असीम मलिक जैसे नाम शामिल थे। इसमें एक 10 साल की संयुक्त सत्ता व्यवस्था पर सहमति बनी, जिसमें फौज प्रमुख को पाँच साल का एक्सटेंशन और शरीफ परिवार को सत्ता में सुरक्षित वापसी का रास्ता तैयार किया गया।

अब PMLN का दावा है कि उन्होंने समझौते के तहत अपनी तरफ के कदम उठा लिए हैं और अब जनरल असिम मुनीर की जिम्मेदारी है कि वे नवाज शरीफ को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँचाएँ।

शरीफ परिवार की शर्तें और सियासी बाधाएँ

डील सिर्फ सत्ता वापसी तक सीमित नहीं है, बल्कि शरीफ परिवार अपनी आने वाली राजनीतिक पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित स्पेस चाहता है। मरियम नवाज के करीबी सूत्रों के अनुसार, परिवार ने सेना से कुछ महत्वपूर्ण सैन्य नियुक्तियों पर सलाह और सहमति का अधिकार भी माँगा है।

जिनमें लेफ्टिनेंट जनरल नौमान जकारिया को वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ और लेफ्टिनेंट जनरल असीम मलिक को कमांडर NSC नियुक्त करने की माँग शामिल है। इसके अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण अफसरों की पोस्टिंग पर भी शरीफ परिवार की सहमति की माँग है।

इस बीच, राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या देरी की एक वजह खुद शहबाज शरीफ हैं। उनके हस्ताक्षर के बिना यह नोटिफिकेशन जारी नहीं हो सकता और उनका लंदन में लंबे समय तक रहना कई तरह की अटकलों को जन्म दे रहा है।

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि शहबाज शरीफ जानबूझकर इस मामले से दूरी बनाए हुए हैं ताकि वे इस संवेदनशील फैसले में सीधे तौर पर न फँसें और इससे जुड़ा राजनीतिक जोखिम खुद पर न लादें।

कुल मिलाकर, पाकिस्तान में CDF नियुक्ति की देरी ने सत्ता संघर्ष को खुलकर सामने ला दिया है। यह सिर्फ एक पद की नियुक्ति नहीं, बल्कि पाकिस्तान की भविष्य की सत्ता व्यवस्था, फौज की भूमिका और शरीफ परिवार की राजनीतिक वापसी का जटिल संघर्ष है, जिसका अंतिम स्वरूप अभी बाकी है।