सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (22 जुलाई 2026) को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के उस फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया जिसमें शिवसेना (UBT) के 6 सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को मान्यता दी गई थी। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने लोकसभा स्पीकर को नोटिस जारी करते हुए उनसे जवाब माँगा है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह इस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर दो सप्ताह बाद सुनवाई करेगा। कोर्ट ने कहा, “हमने नोटिस जारी कर दिया है। हम इस पर विचार करेंगे। जवाब दाखिल किया जाए। दो सप्ताह बाद सुनवाई होगी।”
शिवसेना (UBT) की ओर से वरिष्ठ वकील देवदत्त कामत ने स्पीकर के फैसले का विरोध किया। उन्होंने कहा कि स्पीकर के सामने किसी भी सांसद के खिलाफ अयोग्यता की कोई याचिका लंबित नहीं है। ऐसे में विलय का आदेश पारित करने की जरूरत ही नहीं थी। उन्होंने यह भी कहा कि विलय का आदेश लोकसभा स्पीकर ने नहीं बल्कि एक संयुक्त सचिव ने हस्ताक्षर करके जारी किया है।
कामत ने कोर्ट में कहा, “ये 6 सांसद मेरी पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुने गए थे। कोई अयोग्यता की कार्यवाही लंबित नहीं है। ऐसे में विलय पर फैसला लेने का सवाल ही नहीं उठता। कृपया जारी किए गए सर्कुलर को देखिए।” उन्होंने आगे कहा, “इन 6 सांसदों ने एकतरफा फैसला कर लिया कि अब शिवसेना (UBT) का विपक्षी राजनीतिक दल के साथ विलय हो जाएगा। वास्तव में कोई विलय हुआ ही नहीं है।” उन्होंने कहा कि यह मामला संवैधानिक नैतिकता से जुड़ा हुआ है।
देवदत्त कामत ने आगे कहा, “पूरा मामला पहले से तय किया गया है। मामला बेहद जरूरी है। समय बीतने के साथ ऐसी प्रक्रियाएँ अपना महत्व खो देती हैं। हम संविधान की दसवीं अनुसूची के मुद्दे पर नहीं हैं। स्पीकर के पास विलय का आदेश देने का अधिकार ही नहीं था।”
इससे पहले मंगलवार को भी सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा स्पीकर के विलय संबंधी आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया था। वरिष्ठ वकील देवदत्त कामत ने मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने इस मामले को जल्द सूचीबद्ध करने की माँग की थी लेकिन कोर्ट ने तत्काल सुनवाई नहीं की।
लोकसभा स्पीकर ने 18 जुलाई को आदेश जारी कर शिवसेना (UBT) के 6 सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को मान्यता दी थी। ये छह सांसद संजय जाधव, भाऊसाहेब वाकचौरे, संजय देशमुख, नागेश पाटिल अष्टीकर, ओमराजे निंबालकर और संजय पाटिल हैं। इन सभी सांसदों ने जून महीने में एकनाथ शिंदे की मौजूदगी में शिवसेना का दामन थामा था।
याचिका में कहा गया है कि इन छह सांसदों को जनता ने शिवसेना (UBT) के चुनाव प्रचार और नेतृत्व पर भरोसा करके चुना था। लेकिन चुनाव के दो साल के भीतर ही उन्होंने विरोधी शिवसेना गुट में विलय की माँग करके मतदाताओं के भरोसे को तोड़ दिया।
याचिका में यह भी कहा गया है कि यह विलय संविधान और कानून के मुताबिक वैध नहीं है क्योंकि यह केवल इन सांसदों के एकतरफा दावे के आधार पर किया गया है। इसमें उनकी मूल राजनीतिक पार्टी की सहमति नहीं ली गई।

