उज्जैन के महाकाल मंदिर में ‘VIP दर्शन’ पर रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, जानिए- शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में क्या कहा

उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में ‘VVIP दर्शन’ की व्यवस्था जारी रहेगी। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (27 जनवरी 2026) को इस वीआईपी कल्चर को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से साफ इनकार कर दिया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने स्पष्ट किया कि मंदिर के भीतर किसे प्रवेश मिलना चाहिए और किसे नहीं, यह तय करना अदालतों का काम नहीं है। कोर्ट के कड़े रुख को देखते हुए याचिकाकर्ता ने अपनी अर्जी वापस ले ली है।

‘श्रद्धालु ऐसी याचिकाएँ नहीं लाते’: कोर्ट की फटकार

याचिकाकर्ता दर्पण अवस्थी की ओर से वकील विष्णु शंकर जैन ने दलील दी थी कि गर्भगृह में जल चढ़ाने के लिए केवल वीआईपी लोगों को ही अनुमति देना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है। उन्होंने माँग की थी कि सबके लिए एक जैसी नीति हो।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा, “ऐसी याचिकाएँ दाखिल नहीं की जानी चाहिए, असली श्रद्धालु ऐसा नहीं करते।” कोर्ट ने चुटकी लेते हुए कहा कि कल को लोग मंदिर के अंदर ‘बोलने की आजादी’ (अनुच्छेद 19) का हवाला देकर मंत्र जपने के अधिकार का दावा करने लगेंगे।

कलेक्टर का विशेषाधिकार, कोर्ट का नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें कहा गया था कि ‘VIP’ कौन है, यह उस दिन की स्थिति के अनुसार वहाँ के कलेक्टर और मंदिर प्रबंधन तय करते हैं।

हाई कोर्ट ने साफ किया था कि देश के लगभग सभी धार्मिक स्थलों में ऐसी व्यवस्था है और इसके लिए कोई पक्की लिस्ट या परिभाषा नहीं होती। यह पूरी तरह प्रशासन का विवेक है कि वह किसे गर्भगृह तक जाने की अनुमति देता है।

समानता की दलील बनाम मंदिर की व्यवस्था

विष्णु शंकर जैन ने जोर देकर कहा था कि भेदभाव खत्म होना चाहिए- या तो सबको गर्भगृह में जाने दिया जाए या फिर किसी को भी नहीं। उन्होंने कहा कि आम भक्त घंटों लाइन में लगे रहते हैं जबकि रसूखदार लोग बिना किसी बाधा के दर्शन करते हैं।

हालाँकि, कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि जो लोग व्यवस्था संभाल रहे हैं, उन्हें ही फैसला लेने दिया जाए, कोर्ट हर चीज को रेगुलेट नहीं कर सकता। अब याचिकाकर्ता के पास केवल मंदिर प्रशासन के सामने अपना सुझाव रखने का विकल्प बचा है।