मेटा भारत में फैक्ट-चेकिंग पार्टनर्स को मिलने वाली फीस करेगा कम, छोटे संगठनों में बड़े पैमाने पर छंटनी की आशंका: US में पहले ही उठा चुका है कदम

फेसबुक और इंस्टाग्राम की पैरेंट कंपनी मेटा भारत में अपने पेशेवर ‘फैक्ट-चेकिंग पार्टनर्स’ को मिलने वाली राशि में बड़ी कटौती करने जा रही है। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी ने अगले छह महीनों के लिए फीस में 33 फीसदी से लेकर 50 फीसदी तक की कटौती कर दी है।

मेटा ने अपनी वैश्विक फैक्ट-चेकिंग रणनीति में बड़े बदलाव किए हैं। इसके चलते भारत में कई छोटे फैक्ट-चेकिंग संगठनों के बंद होने का खतरा पैदा हो गया है, क्योंकि उनकी आय का मुख्य स्रोत मेटा से मिलने वाला फंड ही है। रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले छह महीनों में भारतीय ‘फैक्ट-चेकिंग पार्टनर्स’ को मिलने वाला भुगतान काफी कम कर दिया जाएगा।

यह कटौती 33% से 50% तक हो सकती है। कई संगठनों के लिए मेटा से मिलने वाला पैसा ही उनकी आमदनी का मुख्य जरिया है। ऐसे में इतनी बड़ी कटौती के कारण उन्हें अपने खर्च चलाने के लिए कर्मचारियों की छंटनी करनी पड़ सकती है।

ट्रंप के चुनाव जीतने के बाद अमेरिका में कार्यक्रम बंद

इससे पहले अमेरिका में भी कंपनी ने इसी तरह का कदम उठाया था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव जीतने के बाद मेटा ने अमेरिका में फैक्ट-चेकिंग साझेदारियों को खत्म कर दिया था। इसके बाद मेटा के CEO मार्क जुकरबर्ग ने ऐलान किया कि फेसबुक और इंस्टाग्राम अब ‘कम्युनिटी नोट्स’ मॉडल अपनाएँगे।

इस नए सिस्टम के तहत फैक्ट-चेकिंग आम यूजर्स के एक विविध समूह द्वारा की जाएगी। किसी पोस्ट पर अतिरिक्त जानकारी जोड़ने से पहले कई यूजर्स की सहमति जरूरी होगी, ताकि यह तय हो सके कि उस पोस्ट को संदर्भ की आवश्यकता है। मेटा ने पहली बार दिसंबर 2016 में पेशेवर फैक्ट-चेकिंग पार्टनर्स को जोड़ा था।

उस समय सोशल मीडिया पर गलत जानकारी के तेजी से फैलने को लेकर वैश्विक चिंता बढ़ रही थी। इसके बाद दुनिया भर में कई फैक्ट-चेकिंग संगठन सामने आए, जिनकी आय का बड़ा हिस्सा मेटा से मिलने वाले फंड पर निर्भर रहा। समय के साथ इन फैक्ट-चेकिंग पहलों में वैचारिक पक्षपात भी घुस गया और निष्पक्ष फैक्ट-चेकिंग केवल कागजों तक ही सीमित रह गई।

कम्युनिटी नोट्स के वैश्विक विस्तार को लेकर अनिश्चितता

मेटा ने कहा है कि वह अपने कम्युनिटी नोट्स फीचर को अन्य देशों में भी लागू करने की योजना बना रहा है। हालाँकि कंपनी ने यह साफ नहीं किया है कि क्या इसके चलते अमेरिका के बाहर भी पेशेवर फैक्ट-चेकिंग साझेदारियों को खत्म किया जाएगा।

जनवरी 2025 में इंटरनेशनल फैक्ट चेकिंग नेटवर्क ने जुकरबर्ग को पत्र लिखकर कहा था कि फैक्ट-चेकिंग कार्यक्रम को बंद करने से राजनीतिक और सामाजिक रूप से संवेदनशील देशों पर बुरा असर पड़ सकता है। संगठन ने चेतावनी दी थी कि अगर पेशेवर फैक्ट-चेकिंग को वैश्विक स्तर पर खत्म किया गया, तो इससे गलत जानकारी फैलने का खतरा बढ़ेगा।

इससे राजनीतिक अस्थिरता, चुनावी हस्तक्षेप, भीड़ हिंसा और कुछ क्षेत्रों में नरसंहार जैसी स्थितियाँ भी पैदा हो सकती हैं। उस समय ऑपइंडिया ने रिपोर्ट किया था कि अमेरिका में मेटा द्वारा फैक्ट-चेकिंग कार्यक्रम खत्म करने के फैसले से भारतीय ‘फैकक्ट-चेकिंग पार्टनर्स’ में भी भारी चिंता फैल गई थी।

फैक्ट-चेकर्स का कहना था कि भारत में कई संगठनों के लिए मेटा का थर्ड-पार्टी फैक्ट-चेकिंग प्रोग्राम ही उनकी आय का एकमात्र साधन है। अगर यह फंडिंग बंद होती है, तो उन्हें अपना कामकाज बंद करना पड़ सकता है। इसके अलावा ये फैक्ट-चेकर्स अपनी पहचान और ट्रैफिक के लिए भी मेटा के प्लेटफॉर्म पर निर्भर हैं।

फेसबुक और इंस्टाग्राम उनके लिए वेबसाइट पर पाठक लाने का मुख्य जरिया हैं। अगर इन प्लेटफॉर्म से उनका कंटेंट हटाया गया, तो उनकी साइट पर आने वाले यूजर्स की संख्या में भारी गिरावट आ सकती है।