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गालीबाजों में दिखे ‘स्वतंत्रता सेनानी’ और मोदी सरकार में ‘क्रूर ब्रिटिश’… ‘पत्रकारिता’ के नाम पर इस वामपंथी सनक को छोड़ दो आरफा-श्याम-तनुश्री

आरफा खानुम, श्याम मीरा सिंह, तनुश्री पांडे और अनमोल जैसे वामपंथी विचारधारा के लोगों की चर्चा केवल और केवल मोदी सरकार को कैसे कोसा जाए, सीजेपी के उग्र प्रदर्शन की बिगड़ी छवि कैसे बचाई जाए और लोगों को सत्ता पलटने के लिए कैसे उकसाया जाए।

आज देश की शांति और सुरक्षा पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। कुछ खुद को ‘स्वतंत्र पत्रकार’ कहने वाले वामपंथी विचारधारा के लोग देश का माहौल बिगाड़ रहे हैं। 2 अगस्त को आरफा खानुम और श्याम मीरा सिंह अपने-अपने यूट्यूब चैनल पर एक कोलैबोरेशन (Collaboration) वीडियो अपलोड करते हैं। यह वीडियो 1 घंटे 4 मिनट का है। इसमें आरफा खानुम, श्याम मीरा सिंह, तनुश्री पांडे और अनमोल आपस में चर्चा करते हुए नजर आते है। चर्चा किस बात पर… केवल और केवल मोदी सरकार को कैसे कोसा जाए, सीजेपी के उग्र प्रदर्शन की बिगड़ी छवि कैसे बचाई जाए और लोगों को सत्ता पलटने के लिए कैसे उकसाया जाए। इस गोलमेज (राउंड टेबल) चर्चा का मकसद केवल और केवल देश में आग लगाना है। ये वामपंथी विचारधारा के लोग युवाओं को हिंसा के लिए उकसा रहे हैं।

इन तथाकथित पत्रकारों ने दिल्ली की सड़कों पर हुड़दंग मचाने वालों का साथ दिया है। इन उपद्रवियों ने देश के प्रधानमंत्री को गालियां दीं। इन्होंने सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचाया। इन्होंने दिल्ली पुलिस और जवानों पर जानलेवा हमले किए। हद तो तब हो गई जब इन देश-विरोधी लोगों ने इन गुंडों को ‘स्वतंत्रता सेनानी’ बता दिया। इन्होंने चुनी हुई सरकार की तुलना क्रूर ब्रिटिश राज से की।

हैरान करने वाली बात ये है कि सीजेपी का प्रदर्शन खत्म हो चुका है तब भी ये लोग इसी मुद्दे को लेकर बैठे है लेकिन झारखंड में नीट (NEET) पेपर लीक को लेकर जो वास्तविक छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं, उस पर इन वामपंथियों को उस चर्चा नहीं करनी है। ये वामपंथी झारखंड वाले पर चर्चा इसलिए नहीं करना चाहते हैं, क्योंकि वहाँ इनके अपने राजनीतिक आका फँसे (कॉन्ग्रेस) हैं। जब आरफा खानुम ईरान गई थीं, तब डर के मारे उन्होंने बुर्का और हिजाब पहन लिया था। वहाँ वे एक शब्द बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाई थीं। लेकिन आज वे देश में बैठकर जहर उगल रही हैं।

गालियों और उपद्रवियों को ‘स्वतंत्रता सेनानी’ बताने वाले इन वामपंथियों का काला सच

राउंड टेबल में बातचीत के दौरान तनुश्री, आरफा, अनमोल और श्याम ने अपने फाल्तु और दो कोड़ी के विचार रखें। इन लोगों ने दिल्ली की सड़कों पर पत्थरबाजी करने वालों को ‘स्वतंत्रता सेनानी’ तक बता दिया है। ये वही लोग हैं जिन्होंने प्रधानमंत्री को गालियाँ दीं। यह हमारे देश के महान स्वतंत्रता सेनानियों का सीधा अपमान है। हमारे असली सेनानियों ने देश की आजादी के लिए जान दी थी। वे अंग्रेजों की गोलियाँ खाते थे। वे देश की एकता के लिए हँसते-हँसते फाँसी पर चढ़े थे। वे चौराहों पर बैठकर ना तो पिज्जा-बर्गर खाते थे, ना ही देश का माहौल खराब करते थे। इसके अलावा, वे न तो देश विरोधी नारे लगाते थे और न ही किसी की माँ-बहन को गाली देते थे।

भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद और सरदार पटेल ने देश को एक किया था। लेकिन यह वामपंथी गैंग देश को तोड़ने में लगी है। जो लोग पुलिस पर पत्थर फेंकते हैं, वे कभी स्वतंत्रता सेनानी नहीं हो सकते। ऐसा कहना हमारे शहीदों के साथ बहुत बड़ा धोखा है। श्याम मीरा सिंह ने तो खुलेआम धमकी दी है। उसने वीडियो में कहा कि अगर 26 मार्च वाला आंदोलन सफल हो जाता, तो पीएम मोदी 26 अगस्त नहीं देख पाते। यह सीधे तौर पर देश के प्रधानमंत्री को रास्ते से हटाने की साजिश है। यह लोग देश के युवा के शुभचिंतक नहीं हैं। ये सिर्फ अपने आकाओं को खुश करना चाहते हैं। ये मासूम छात्रों को मोहरा बना रहे हैं। ये अपनी गंदी राजनीति चमकाने के लिए देश में आग लगाना चाहते हैं।

जानें असल में स्वतंत्रता सेनानी कौन थे?

शहीद भगत सिंह (1907-1931): शहीद भगत सिंह भारत के इतिहास के एक ऐसे महान क्रांतिकारी हैं, जिनका नाम लेते ही हर देशवासी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। उनका जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के बंगा में एक देशभक्त परिवार में हुआ था। भगत सिंह ने कम उम्र में ही समझ लिया था कि देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराने के लिए वैचारिक और सशस्त्र दोनों लड़ाइयों की जरूरत है। लाला लाजपत राय की लाठीचार्ज से हुई मृत्यु का बदला लेने के लिए उन्होंने ब्रिटिश पुलिस अधिकारी सॉन्डर्स का वध किया था। इसके बाद देश की सोई हुई सरकार और बहरी अंग्रेज हुकूमत को जगाने के लिए उन्होंने और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में बम फेंका। उनका उद्देश्य किसी की जान लेना नहीं, बल्कि पर्चे फेंककर अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाना था। गिरफ्तारी के बाद उन्होंने जेल में ऐतिहासिक भूख हड़ताल की और भारतीय राजनीतिक कैदियों के अधिकारों के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। मात्र 23 साल की कम उम्र में 23 मार्च 1931 को हँसते-हँसते फाँसी के फँदे को चूमने वाले भगत सिंह आज भी देश के युवाओं के प्रेरणास्रोत और अमर नायक हैं।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस (1897-1945): ‘नेताजी’ के नाम से संपूर्ण विश्व में विख्यात सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक (उड़ीसा) में हुआ था। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे आक्रामक और रणनीतिक रूप से निपुण नेताओं में से एक थे। उनका मानना था कि अंग्रेजों से भीख माँगकर नहीं, बल्कि सशस्त्र संघर्ष और बल प्रयोग करके ही पूर्ण स्वतंत्रता हासिल की जा सकती है। उन्होंने कॉन्ग्रेस के भीतर वैचारिक मतभेदों के बाद ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ की स्थापना की और अंग्रेजों द्वारा नजरबंद किए जाने के बावजूद अद्भुत साहस दिखाते हुए देश से बाहर निकल गए। नेताजी ने जर्मनी और जापान की सहायता से सुदूर पूर्व में ‘आज़ाद हिंद फ़ौज’ (Indian National Army) का पुनर्गठन किया और सिंगापुर में भारत की अस्थायी सरकार ‘अर्ह सरकार’ की स्थापना की। उन्होंने देशवासियों को ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा!’ और ‘दिल्ली चलो!’ जैसे ओजस्वी नारे दिए। उनकी यह सेना अंग्रेजों के खिलाफ सीधे युद्ध के मैदान में उतरी और अंडमान-निकोबार को अंग्रेजों से मुक्त कराकर वहाँ तिरंगा फहराया। भारत की आजादी में नेताजी का योगदान और उनका पराक्रम इतिहास का सबसे स्वर्णिम अध्याय है।

चंद्रशेखर आज़ाद (1906-1931): चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के भाबरा गाँव में हुआ था। वे बचपन से ही देश की आजादी के प्रति असीम जुनून रखते थे। जब वे मात्र 15 वर्ष के थे, तब उन्होंने महात्मा गाँधी के असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया और ब्रिटिश पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए। अदालत में जब मजिस्ट्रेट ने उनका नाम पूछा, तो उन्होंने गर्व से अपना नाम ‘आजाद’, पिता का नाम ‘स्वातंत्र्य’ (स्वतंत्रता) और पता ‘जेलखाना’ बताया था। तभी से उनके नाम के साथ ‘आजाद’ शब्द हमेशा के लिए जुड़ गया। रामप्रसाद बिस्मिल्लाह और अन्य महान क्रांतिकारियों के बलिदान के बाद, चंद्रशेखर आजाद ने ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (HRA) की कमान संभाली और इसका नाम बदलकर ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (HSRA) किया। वे काकोरी ट्रेन एक्शन जैसे कई साहसिक क्रांतिकारी अभियानों के मुख्य योजनाकारों में शामिल थे। अंग्रेजों की नींद उड़ा देने वाले आजाद ने आजीवन कसम खाई थी कि पुलिस की गोलियाँ उन्हें कभी जिंदा नहीं पकड़ सकेंगी। आखिरकार, 27 फरवरी 1931 को अल्फ्रेड पार्क (इलाहाबाद) में अंग्रेजों से हुई अंतिम मुठभेड़ में उन्होंने अपनी पिस्तौल की आखिरी गोली खुद को मारकर मातृभूमि के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी, लेकिन अंग्रेजों के सामने कभी घुटने नहीं टेके।

मोदी सरकार की ब्रिटिश राज से तुलना

आरफा खानुम और उनके साथियों ने अपनी चर्चा में मोदी सरकार की तुलना भारत पर कब्जा करने वाले ब्रिटिश राज से कर डाली। इन लोगों ने बार-बार यह साबित करने की कोशिश की है कि आज की चुनी हुई सरकार बिल्कुल ब्रिटिश हुकूमत की तरह काम कर रही है। यह इन वामपंथियों की गहरी राजनीतिक कुंठा को साफ-साफ दिखाता है। देश की जनता इन्हें बार-बार चुनावों में धूल चटा चुकी है। जनता ने इन्हें पूरी तरह नकार दिया है। अब इन लोगों से अपनी हार बर्दाश्त नहीं हो रही है। इसलिए ये बौखलाकर देश के लोकतंत्र और संविधान पर ही सवाल उठाने लगे हैं।

हमारा भारतीय संविधान देश के हर एक नागरिक को खुलकर जीने और अधिकार देता है। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि कोई भी उपद्रवी भीड़ सड़क पर उतर आए। इसका मतलब यह नहीं है कि भीड़ कानून को अपने हाथ में ले ले। यह हक किसी को नहीं है कि वह सरेआम पुलिसकर्मियों के सिर फोड़ दे और दंगा फैलाए। अंग्रेजों के शासनकाल में देशवासियों पर बेइंतहा जुल्म और अत्याचार किए जाते थे। तब भारत का नागरिक अपने ही देश में गुलाम था। लेकिन आज देश का हर नागरिक पूरी तरह स्वतंत्र है और आजाद हवा में सांस ले रहा है। आज देश में जनता के वोटों से चुनी हुई अपनी सरकार है, जिसको आरफा, तनुश्री जैसे वामपंथी पचा नहीं पा रहे हैं।

इन वामपंथियों और कट्टरपंथियों को सबसे बड़ी तकलीफ इस बात की है कि देश की जनता इनके चहेते राजनीतिक दलों को वोट नहीं देती है। जनता इन्हें देखना तक पसंद नहीं करती है। इसीलिए ये अपनी हार का बदला लेना चाहते हैं। ये सीधे रास्ते से सत्ता में नहीं आ पा रहे हैं। इसलिए अब ये सीधे-सीधे मासूम युवाओं को भड़का रहे हैं। ये युवाओं का इस्तेमाल करके देश में आग लगाना चाहते हैं। ये हर हाल में देश की सत्ता को पलटने की खतरनाक साजिश रच रहे हैं।

आरफा खानुम का पाखंड, महिलाओं की सुरक्षा का झूठा डर

आरफा खानुम ने चर्चा में दिल्ली को एक ऐसा “बदनाम शहर” बताया जहां महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं और सरकार पर डर का माहौल बनाने का आरोप लगाया। लेकिन सवाल यह है कि क्या आरफा खानुम कभी अपने ही मजहब और समाज के भीतर मुस्लिम महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों पर बोलती हैं? तीन तलाक और पर्दे की आड़ में महिलाओं के हकों पर डाका डालने वालों पर उनका मुँह क्यों सिल जाता है? देश में हिंदू लड़कियों को लव जिहाद के जाल में फँसाकर धर्मांतरण और उत्पीड़न की घटनाओं पर आरफा पूरी तरह मौन रहती हैं। और ये कहती हुई नजर आती है कि हिंदू लड़कियों को मुस्लिम लड़की ही क्यों पसंद आते हैं।

हाथरस से लेकर हिंदू विरोधी एजेंडे तक के कारनामे: तनुश्री पांडे का काला चिट्ठा

इस राउंडटेबल चर्चा में शामिल तनुश्री पांडे का पुराना रिकॉर्ड बहुत ही दागदार रहा है, जिसको वो शायद भूल चुकी है। इनका पूरा इतिहास देश और समाज के खिलाफ साजिश रचने का रहा है। इनके कारनामे बताते हैं कि ये किस खतरनाक और नफरती एजेंडे पर काम करती रही हैं।

हाथरस कांड के संवेदनशील समय में इन मोहतरमा तनुश्री ने अपनी हदें पार कर दी थीं। इन्होंने हाथरस की पीड़ित के परिवार को बार-बार फोन किया था। इन्होंने परिवार के लोगों को लगातार उकसाने का काम किया था। मृतका के भाई पर दबाव बना रही थी, कि जैसे वो कहे वैसा ही कहे। इसका एकमात्र मकसद इस गंभीर मामले को सांप्रदायिक रंग देना था। ये चाहती थीं कि देश में समाज के बीच नफरत की आग भड़क उठे।

तनुश्री पांडे पर हिंदू आस्था पर चोट करने के भी आरोप हैं। इन पर हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ आपत्तिजनक बातें कहने के गंभीर आरोप लगते रहे हैं। ये लोग हमेशा से बहुसंख्यक समाज की आस्था को ठेस पहुँचाने का काम करते आए हैं। इन्हें देश की संस्कृति और परंपराओं से हमेशा से नफरत रही है।

तनुश्री का एक और पुराना और काला सच जगजाहिर है। इनका जेएनयू के वामपंथियों के साथ पुराना और गहरा नाता रहा है। एक बार वे जेएनयू के वामपंथी उपद्रवियों को यह सिखाते हुए पकड़ी गई थीं कि कैमरे के सामने क्या बोलना है और कैसे झूठ फैलाना है।

तनुश्री ये भी कहती नजर आती है कि भारत में सवाल पूछे जाने पर आपको सजा मिलती है और अलग नजरिए से देखा जाता है। एक दो उदारहण भी ये बताती है। ये देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का झूठा ढिंढोरा पीटते हैं। लेकिन जब पाकिस्तान जैसे देश की बात आती है, तो ये एकदम गूंगे हो जाते हैं। पाकिस्तान में पत्रकारों की सरेआम हत्याएँ होती हैं। वहाँ विदेशी मीडिया पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा हुआ है। लेकिन पाकिस्तान के इन जुल्मों पर तनुश्री और इनके साथियों का मुँह कभी नहीं खुलता है।

कंगना रनौत के सांसद रहने पर तनुश्री और आरफा को हो रही खुजली

आरफा खानुम और तनुश्री पांडे जैसी वामपंथी महिला पत्रकारों ने अपनी इस राउंडटेबल चर्चा में कंगना रनौत को लेकर भी बातचीत की। इन दोनों ने देश की जानी-मानी अभिनेत्री और मंडी से लोकसभा सांसद कंगना रनौत को लेकर बेहद अशोभनीय और अपमानजनक टिप्पणियाँ की हैं। इन्होंने खुलेआम कंगना के सांसद के पद और उनके राजनीतिक रसूख पर सवालिया निशान खड़े किए हैं। इन तथाकथित पत्रकारों की मानसिकता इतनी गिरी हुई है कि ये एक राष्ट्रवादी और बेबाक महिला नेता को देखकर हमेशा बौखलाई रहती हैं।

आरफा खानुम ने वीडियो में कहा कि एक 15 साल की बच्ची को डरा-धमकाकर माफी मँगवाई गई है। तनुश्री ने तंज कसते हुए यहाँ तक कह दिया कि अगर कंगना रनौत उस बच्ची के साथ बैठकर बात कर लें, तभी वह मानेंगी कि कंगना सचमुच एक सांसद हैं। इन दोनों वामपंथी चेहरों को यह बात अच्छी तरह याद रखनी चाहिए कि वे सच्चाई को छिपा नहीं सकतीं। उस नाबालिग बच्ची ने खुद दुनिया के सामने यह स्वीकार किया था कि उसे कुछ राजनीतिक तत्वों और उपद्रवियों द्वारा बहला-फुसलाकर और उकसाया गया था। उस मासूम बच्ची से गलत हरकतें करवाई गई थीं ताकि देश का माहौल खराब किया जा सके।

कंगना रनौत ने उसी गंदी राजनीति का पुरजोर विरोध किया था जिसके तहत इन मासूम बच्चियों का ब्रेनवॉश किया जाता है। कंगना ने उस साजिश के खिलाफ आवाज उठाई थी जिसमें बच्चों को ढाल बनाकर अराजकता फैलाई जाती है। लेकिन इन वामपंथी महिला पत्रकारों को यह बात बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होती है। इन्हें यह पचता ही नहीं है कि संसद में बैठी एक मजबूत और राष्ट्रवादी महिला सांसद खुलकर इनके पूरे प्रोपेगेंडा और एजेंडे की पोल खोल रही है। जब भी कोई महिला इनकी पोल खोलती है, तो ये अपनी बौखलाहट में व्यक्तिगत हमलों पर उतर आती हैं। यह इनकी दोहरी मानसिकता का सबसे बड़ा और जीता-जागता सबूत है।

वामपंथी इकोसिस्टम का एकमात्र काम

यह पूरा वीडियो इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि भारत में एक ऐसा इकोसिस्टम सक्रिय है जो देश की प्रगति को पचा नहीं पा रहा है। आरफा खानुम, श्याम मीरा सिंह, तनुश्री पांडे और अनमोल जैसे चेहरे पत्रकारिता की आड़ में देश के युवाओं में जहर घोलने का काम कर रहे हैं। इनका उद्देश्य केवल देश में अराजकता फैलाना और अपने वैचारिक आकाओं को खुश करना है। झारखंड पेपर लीक मामले में इनका मुँह बंद था और बंद हो चुके सीजेपी प्रदर्शन पर अभी भी अपनी रोटियाँ सेक रहे हैं और पैसा कमा रहे हैं। इनके पास विषय केवल ‘विष’ (जहर) फैलाने का रह गया है और मोदी सरकार को कोसने का रह गया है। जब तक ये पूरे दिन में केंद्र सरकार की खामियाँ नहीं गिना देते, तब तक इनके अंदर की खुजली खत्म नहीं होती है।

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