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क्या होता है एम्बर, 6.5 करोड़ साल के टाइमलाइन शिफ्ट का क्या मतलब है: समझिए चीन में मिला ‘जीवाश्म कैप्सूल’ क्यों है इतना खास

जब पुराने पेड़ अपनी सुरक्षा के लिए चोट लगने पर चिपचिपा रेजिन निकालते हैं, तो उसमें पुराने पेड़-पौधे के हिस्से, कीड़े-मकौड़े और छोटे जीव फँस जाते हैं। जब रेजिन जमीन पर गिरता है तो लाखों साल बाद उस पर कड़ा आवरण बन जाता है। रेजिन के अंदर वह जीवाश्म सुरक्षित रहता है और वैज्ञानिकों को अपने वक्त की पारिस्थितकी तंत्र की जानकारियाँ दे जाता है।

चीन में दुनिया का सबसे पुराना एम्बर मिला है जो अनुमान से 65 मिलियन साल यानी 6.5 करोड़ वर्ष से ज्यादा पुराना है। एम्बर को अक्सर प्रकृति का ‘टाइम कैप्सूल’ कहा जाता है। दरअसल इसमें करोड़ों साल पहले के पेड़-पौधों, कीड़ों, परागकणों, फंगस, बैक्टीरिया और कभी-कभी छोटे जीवों के अवशेष लगभग उसी रूप में सुरक्षित रह जाते हैं। वैज्ञानिक इनका अध्ययन करके यह समझते हैं कि करोड़ों साल पहले पृथ्वी का वातावरण कैसा था, कौन कौन से जीव-जन्तु थे, कैसे थे। जंगल-जमीन और जलवायु कैसे थे।

क्या होता है एम्बर

दरअसल एम्बर वास्तव में जीवाश्म युक्त पेड़ की रेजिन (Resin) है। यह एक तरह से पेड़ का सुरक्षा कवच है यानी जब पेड़ की छाल निकल जाती है या उस पर कीड़े हमला करते हैं, तब पेड़ चिपचिपा रेजिन निकालता है। इससे फूलों के परागकण से लेकर छोटे छोटे कीड़े मकोड़े तक फँस जाते हैं। जब यह जमीन पर गिरता है, तो साल दर साल उस पर आवरण जमने लगता है।

लाखों सालों तक जमीन के नीचे दबने और रासायनिक बदलाव के बाद यह कठोर होकर एम्बर बन जाता है। दरअसल रेजिन पेड़ों के रस से अलग होता है क्योंकि रस पेड़ को पोषण देता है जबकि रेजिन पेड़ की रक्षा करता है। यह पुराने पेड़ों में चिपचिपा पदार्थ के रूप में पेड़ को चोट लगने पर बाहर निकलता है। चिपचिपा होने की वजह से ही इसमें परागकण, कीड़े, बीज आदि फँसते हैं। चूकिं इसके अंदर ऑक्सीजन नहीं पहुँचता, हवा-पानी नहीं लगता और किसी तरह का परिवर्तन नहीं होता है, तो वह जीवों के अवशेष के रूप में पूरी तरह सुरक्षित रहता है।

एम्बर को ‘टाइम कैप्सूल’ क्यों कहते हैं?

लाखों साल बाद भी कीड़ों-मकोड़ों, पेड़-पौधों के अवशेष अपने वास्तविक रूप में जब वैज्ञानिकों को मिलते हैं तो उन पर रिसर्च में कई बातों का पता चलता है। चूकि ये मानव निर्मित न होकर पूरी तरह प्राकृतिक तौर पर बनते हैं। मान लीजिए 5 करोड़ साल पहले कोई मच्छर किसी पेड़ के रेजिन में फँस गया।

रेजिन इतना चिपचिपा होता है कि मच्छर बाहर नहीं निकल पाया। वह वही जम कर मर गया। धीरे धीरे रेजिन कड़ा होकर जमीन पर गिर गया। चूकि वहाँ ऑक्सीजन नहीं पहुँच पा रहा है। फंग्स या बैक्टीरिया भी उसका नुकसान नहीं कर पा रहा। लाखों साल बाद यह मच्छर का अवशेष बता देंगा कि उसकी प्रजाति क्या थी, किस पेड़ का रेजिन है। उस वक्त जलवायु कैसी थी। उसके साथ अगर पराणकण भी मौजूद है तो ये भी पता चल जाएगा कि किस तरह के पौधे उस वक्त होते थे और सबसे अहम की ये कितना साल पुराना है। इसलिए एम्बर को प्राकृतिक ‘टाइम कैप्सूल’ कहा जाता है।

वैज्ञानिकों को इसी तरह के टाइम कैप्सूल से डायनासोर का भी पता चला। वैज्ञानिकों को एम्बर में डायनासोर के पंख, छिपकली की पूंछ, छोटे मेंढक, मकड़ियाँ, चींटियाँ, मधुमक्खियाँ, फूलों के बीज और परागकण, फूलों के पंखुड़ी, फलों के बीज आदि मिलते रहे हैं। इससे लाखों साल पुरानी पृथ्वी की पारिस्थितिकी तंत्र को समझने में बड़ी मदद मिली है।

चीन में मिला 65 मिलियन साल पुराना एम्बर

अब तक पेड़ों के रेजिन के बने कैप्सूल से एम्बर मिले थे, लेकिन साइंस एडवासेंज में प्रकाशित नए रिसर्च में पता चला है कि चीन में 320 मिलियन साल पुराने चट्टानों के अंदर से जीवाश्म युक्त रेजिन मिले हैं। ‘द अर्लियेस्ट एम्बर फ्रॉम द मिडिल देवोनियन ऑप चीन’ शीर्षक से छपे इस रिसर्च में बताया गया है कि पृथ्वी के शुरुआत में कुछ पौधों ने रेजिन उत्पादन करने वाला सिस्टम विकसित कर लिया था जिससे पौधों को लेकर नया दृष्टिकोण मिलता है कि पृथ्वी पर पौधों का विकास किस तरह हुआ है। यह एम्बर अब तक खोजा गया सबसे पुराना एम्बर है। वैज्ञानिकों को अब लगता है कि पृथ्वी पर रेज़िन बनाने वाले पेड़ पहले सोचे गए समय से भी बहुत पहले मौजूद थे। यह बदलाव पृथ्वी के जंगलों के विकास का इतिहास बदल सकता है।

हाल ही में चीन के शिनजियांग में मध्य देवोनियन काल के सैकड़ों एम्बर कोयले के खदानों में मिले। अधिकांश का आकार 0.1-0.5 मिलीमीटर के बीच था, लेकिन इसका सबसे बड़ा एम्बर 1.5 मिलीमीटर का था, हालाँकि ये अब तक मिले एम्बर की तुलना में काफी छोटा था।

हाल के कुछ शोधों में वैज्ञानिकों ने पाया कि रेजिन बनाने वाले जंगलों (Amber forests) का इतिहास पहले की तुलना में कहीं अधिक पुराना है। पहले माना जाता था कि बड़े पैमाने पर एम्बर बनने की शुरुआत लगभग 320–300 मिलियन वर्ष पहले (Late Carboniferous) हुई। नई खोजों से पता चलता है कि रेजिन उत्पादन और एम्बर बनने की शुरुआत का समय पहले की सोच से लगभग 65 मिलियन वर्ष पहले होता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, देवोनियन चट्टानों से पहले जो रेजिन मिले थे, उस सेंपल में यह पुष्टि नहीं हो पाई थी ये वास्तविक एम्बर थे। लेकिन अब चट्टानों में मिले एम्बर से पता चला है कि ये वास्तविक एम्बर हैं यानी जितना सोचा था उससे करीब 65 मिलियन साल पुराना। इसलिए कहा जा रहा है कि एम्बर का 65 मिलियन साल टाइमलाइन शिफ्ट हो गया है।

लेट कार्बोनिफेरस पीरियड क्या है?

पृथ्वी पर लगभग 323 से 299 मिलियन साल पहले (Late Carboniferous Period) इतिहास का वह दौर था जब दलदली जंगल हुआ करते थे। पेड़ 30–40 मीटर तक ऊँचे होते थे। ऑक्सीजन की प्रचूरता ज्यादा थी। आज से करीब 30-35 फीसदी ज्यादा ऑक्सीजन धरती पर मौजूद थी। इसलिए कीड़े मकोड़े भी बड़े बड़े मिलते थे। घने और ऊँचे जंगलों के जमीन में दबने और हजारों सालों बाद कोयले में परिवर्तित होने की वजह से इस वक्त को कार्बोनिफेरस पीरियड कहा गया। इस वक्त दलदली जंगलों की वजह से सरीसृप प्राणी ज्यादा मिलते थे।

डेवोनियन पीरियड क्या है?

आज से लगभग 419 से 359 मिलियन वर्ष पहले (Devonian Period) पृथ्वी पर पेड़ विकसित हुए और घने जंगल बने। सामान्य बीज वाले पौधे आए और कुछ जीव पहली बार जमीन पर रहने लगे। यानी समुद्र से निकलकर दलदली इलाकों में रहने वाले एम्फीबियन यानी उभयचर विकसित हुए। इस वक्त समुद्रों में मछलियों की बहुत अधिक विविधता थी। इसलिए इसे अक्सर ‘Age of Fishes’ कहा जाता है। ये वह वक्त था जब बड़े बड़े पेड़ों की अधिकता से घने जंगलों का बड़े पैमाने पर विकास हुआ।

उस वक्त बार बार लगने वाले जंगलों की आग भी अहम थी। ऐसे में पारिस्थितकी तंत्र पर दबाव बना और इसमे बदलाव आए। माना जाता है कि इस वक्त ही पौधों में रेजिन जैसे पदार्थ का विकास हुआ जो उन्हें लगने वाले घावों से बचा सकें। आग में पौधों को क्षतिग्रस्त होने के बाद बनने वाले घावों को भरने में मदद मिली क्योंकि इस पर कीटों का वार होता था और वह पेड़ सड़ जाते थे। रेजिन इन सब से पेड़ों को बचाता था।

रेजिन इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

रेज़िन केवल पेड़ के लिए ही सुरक्षा कवच नहीं है, बल्कि यह वैज्ञानिकों के लिए भी अनमोल धरोहर की तरह है। पेड़ की सुरक्षा करना, चोट लगने पर घाव भरना, कीड़ों को चोट वाले स्थान से दूर रखना, वायरस-बेक्टिरिया से बचाना इसका काम तो है ही। ये जीवाश्म संरक्षण में अहम योगदान देता है। अगर रेजिन नहीं हो, तो बड़े बड़े पेड़ सड़ जाएँगे। उनमें जरा सी खरोंच आने पर उनका बचना मुश्किल हो जाता।

वैज्ञानिकों को एम्बर नहीं मिल पाता क्योंकि कीड़े सड़ जाते, पराणकण और फूलों के हिस्से सड़ जाते, छोटे जीव के अवशेष नहीं बचते। रेजिन के कारण ही लाखों-करोड़ों साल पुराने छोटे जीव जन्तुओं और पौधों के अंश सुरक्षित रहते हैं। इससे पृथ्वी पर हुए विकासवाद (Evolution) को समझना आसान हो जाता है। एम्बर में सुरक्षित जीव बताते हैं कि कौन-सी प्रजातियाँ कब विकसित हुईं, उनका रूप समय के साथ कैसे बदला, किन पौधों और कीड़ों के बीच सह-विकास (co-evolution) हुआ।

एम्बर केवल एक सुंदर पीला अनमोल रत्न नहीं है, बल्कि पृथ्वी के करोड़ों वर्षों के इतिहास का प्राकृतिक अभिलेख है। पेड़ इसे अपनी सुरक्षा के लिए निकालते हैं और यह पारिस्थिति तंत्र को संरक्षित कर लेता है क्योंकि रेजिन समय के साथ जीवाश्म युक्त एम्बर बनता है और अपने भीतर उस वक्त के कीट, पौधे, परागकण, सूक्ष्मजीव और पर्यावरण की जानकारी सुरक्षित रह जाती है। इसी वजह से इसे ‘प्राकृतिक टाइम कैप्सूल’ कहा जाता है।

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रुपम
रुपम
रुपम के पास 20 साल से ज्यादा का पत्रकारिता का अनुभव है। जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा। जी न्यूज से टेलीविज़न न्यूज चैनल में कामकाज की शुरुआत। सहारा न्यूज नेटवर्क के प्रादेशिक और नेशनल चैनल में टेलीविज़न की बारीकियाँ सीखीं। सहारा प्रोग्रामिंग टीम का हिस्सा बनकर सोशल मुद्दों पर कई पुरस्कार प्राप्त डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया। एडिटरजी डिजिटल हिन्दी चैनल में न्यूज एडिटर के तौर पर काम किया।

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