अंतरिक्ष की दुनिया से एक बहुत बड़ी खबर आ रही है। साल 1972 के बाद पहली बार इंसान फिर से चंद्रमा की दहलीज पार करने के लिए तैयार है। नासा अपने महात्वाकांक्षी ‘आर्टेमिस-II’ मिशन को लॉन्च करने की अंतिम तैयारियों में जुटा है। इससे पहले 1969 से 1972 के बीच नासा ने इंसान को चाँद पर लैंड कराने में छह बार कामयाबी हासिल की।
दिसंबर 1972 में जब ‘अपोलो 17’ के यात्री जीन सेर्नन ने चाँद की धूल पर आखिरी कदम छोड़े थे, तब किसी ने नहीं सोचा था कि आधी सदी तक वहाँ सन्नाटा पसर जाएगा। लेकिन अब नासा का ‘आर्टेमिस’ कार्यक्रम इस सन्नाटे को तोड़ने जा रहा है। मार्च के आसपास निर्धारित इस मिशन में चार अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा की परिक्रमा कर एक नया इतिहास रचेंगे।
आखिर 50 साल क्यों लग गए? राजनीति या पैसा?
आम बोलचाल में लोग पूछते हैं कि जब 1960 के दशक में हम चाँद पर जा सकते थे, तो अब क्यों नहीं? इसका सबसे बड़ा कारण ‘राजनीतिक इच्छाशक्ति‘ की कमी रही है। अपोलो मिशन के समय अमेरिका और सोवियत संघ के बीच अपनी ताकत दिखाने की होड़ थी। राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी के लिए यह प्रतिष्ठा की लड़ाई थी, इसलिए पानी की तरह पैसा बहाया गया।
लेकिन 1972 के बाद प्राथमिकताएँ बदल गईं। हर नई अमेरिकी सरकार के साथ नासा का बजट और लक्ष्य बदलते रहे। कभी ओबामा प्रशासन ने मंगल ग्रह की बात की, तो कभी ट्रंप प्रशासन ने फिर से चाँद पर जोर दिया। इस राजनीतिक खींचतान और बजट में कटौती के कारण अपोलो 18, 19 और 20 जैसे मिशन फाइलों में ही दफन हो गए। एक बड़े मिशन के लिए दशकों तक जिस निरंतर सहयोग की जरूरत होती है, वह पिछले 50 सालों में नहीं मिल पाया।
तकनीकी चुनौतियाँ: सिर्फ कंप्यूटर ही काफी नहीं
आज हमारे हाथ में जो स्मार्टफोन है, वह अपोलो मिशन के कंप्यूटरों से लाखों गुना ज्यादा ताकतवर है। फिर भी चाँद पर जाना आज भी उतना ही जोखिम भरा है। चंद्रमा पृथ्वी से करीब 4 लाख किलोमीटर दूर है। अब तक की आधी से ज्यादा लूनर लैंडिंग फेल रही हैं।
दूसरी समस्या यह है कि 1970 के दशक में जो इंजीनियर, मशीनें और सप्लाई चेन मौजूद थीं, वे अब खत्म हो चुकी हैं। आज वैसी तकनीक और सुरक्षा मानकों को नए सिरे से खड़ा करने में अरबों डॉलर और सालों की मेहनत लग रही है। मानव जीवन की सुरक्षा सर्वोपरि है, इसलिए नासा अब कोई भी जल्दबाजी नहीं करना चाहता।
आर्टेमिस-II: कौन हैं वो चार जाँबाज?
आर्टेमिस-II मिशन करीब 10 दिनों का होगा। यह मिशन चाँद पर उतरेगा नहीं, बल्कि उसकी परिक्रमा करके वापस आएगा। इसमें चार अंतरिक्ष यात्री ‘रीड वाइजमैन, विक्टर ग्लोवर, क्रिस्टीना कोच और कनाडा के जेरेमी हैनसेन’ शामिल हैं।
ये चारों यात्री नासा के सबसे शक्तिशाली रॉकेट SLS (स्पेस लॉन्च सिस्टम) और ऑरिऑन कैप्सूल में सवार होकर अंतरिक्ष में जाएँगे। योजना के मुताबिक, पहले पृथ्वी की कक्षा में सिस्टम चेक होगा, फिर चार दिन की यात्रा के बाद ये चंद्रमा के उस दूर वाले हिस्से (Dark Side) की परिक्रमा करेंगे जिसे पृथ्वी से नहीं देखा जा सकता। अंत में इनका यान प्रशांत महासागर में सुरक्षित लैंड करेगा। यह मिशन आर्टेमिस-III का रास्ता साफ करेगा, जिसके तहत 2028 तक चाँद पर फिर से इंसान को उतारा जाएगा।
फर्जी लैंडिंग का सच: क्या वाकई आर्मस्ट्रांग चांद पर गए थे?
जैसे-जैसे चाँद पर वापसी की चर्चा बढ़ रही है, पुराने ‘कॉन्स्पिरेंसी थ्योरी‘ (षड्यंत्र के दावे) भी सोशल मीडिया पर तैरने लगे हैं। कुछ लोग कहते हैं कि नील आर्मस्ट्रांग वाली लैंडिंग फर्जी थी क्योंकि वीडियो में झंडा लहराता दिख रहा है। वैज्ञानिक साफ करते हैं कि झंडे में एक क्षैतिज रॉड लगी थी और उसे गाड़ते समय जो हलचल हुई, उसी कंपन की वजह से वह लहराता हुआ लगा।
तस्वीरों में तारे न दिखने का कारण कैमरों की सेटिंग थी, जो चाँद की चमकीली सतह को कैद करने के लिए की गई थी। जहाँ तक विकिरण (Radiation) का सवाल है, अंतरिक्ष यात्रियों के सूट और यान की दीवारें उन्हें बचाने के लिए पर्याप्त थीं। सबसे बड़ा सबूत तो वह 800 पाउंड चाँद की चट्टानें हैं, जिन्हें वैज्ञानिक आज भी लैब में टेस्ट करते हैं।
नया स्पेस वार: चीन बनाम अमेरिका
आज हालात फिर से 1960 के दशक जैसे हो गए हैं। अब मुकाबला सिर्फ अमेरिका और रूस का नहीं, बल्कि चीन का भी है। चीन ने 2030 तक चाँद पर इंसान उतारने का लक्ष्य रखा है। इसी होड़ ने अमेरिका को फिर से सक्रिय कर दिया है।
नासा अब सिर्फ चाँद पर झंडा गाड़कर वापस नहीं आना चाहता। इस बार लक्ष्य वहाँ स्थायी बेस बनाना है। ‘आर्टेमिस’ मिशन का असल मकसद चंद्रमा को एक ‘पड़ाव’ की तरह इस्तेमाल करना है, ताकि भविष्य में यहीं से मंगल ग्रह (Mars) तक की लंबी यात्रा शुरू की जा सके।

