केरल की लेफ्ट डेमक्रैटिक फ्रन्ट (LDF) सरकार ने अपने पहले के रुख से बड़ा यू-टर्न लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया से कहा है कि सबरीमाला टेंपल से जुड़े मामले में फैसला लेने से पहले धार्मिक विद्वानों से परामर्श किया जाए। शनिवार (14 मार्च 2026) को दायर अपनी लिखित दलीलों में केरल सरकार ने यह अनुरोध उस 9-जजों की पीठ से किया है, जो इस मामले की सुनवाई 7 अप्रैल 2026 से शुरू करने वाली है।
केरल सरकार ने कहा कि सबरीमला मंदिर में सालों से चली आ रही धार्मिक परंपराओं में कोई भी बदलाव व्यापक चर्चा और धार्मिक विद्वानों से सलाह लेने के बाद ही किया जाना चाहिए।
सरकार ने अपनी दलीलों में कहा कि किसी ऐसे धार्मिक अभ्यास की न्यायिक समीक्षा, जो लंबे समय से लोगों की आस्था और मूल्यों से जुड़ा है, उससे पहले संबंधित धर्म के प्रतिष्ठित धार्मिक विद्वानों और सामाजिक सुधारकों से राय लेना जरूरी है।
गौरतलब है कि इससे पहले केरल सरकार ने 28 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के उस फैसले का समर्थन किया था, जिसमें सभी उम्र की महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी।
अदालत ने कहा था कि 10 से 50 वर्ष की उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से रोकना भेदभावपूर्ण है और यह हिंदू महिलाओं के धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।
अब केरल सरकार का कहना है कि सबरीमला मामले में पहले हुए अनुभव और श्रद्धालुओं, खासकर महिला भक्तों की प्रतिक्रिया को देखते हुए इस विषय पर व्यापक परामर्श जरूरी है।
सरकार ने यह भी कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 से जुड़े मामलों में अदालत को यह नहीं देखना चाहिए कि कोई धार्मिक मान्यता तर्कसंगत लगती है या नहीं, बल्कि यह देखना चाहिए कि वह आस्था वास्तव में उस धर्म के अभ्यास का ईमानदारी से पालन किया जाने वाला हिस्सा है या नहीं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला उस मूल याचिका से जुड़ा है जो वर्ष 2006 में सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थी। इसमें माँग की गई थी कि 10 से 50 वर्ष की उम्र की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी जाए।
साथ ही केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल (प्रवेश का प्राधिकरण) नियम का नियम 3(बी), 1965 को असंवैधानिक घोषित करने की भी माँग की गई थी, क्योंकि इसे संविधान के भारत के संविधान का अनुच्छेद 14, भारत के संविधान का अनुच्छेद 15 और भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 का उल्लंघन बताया गया था।
सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से फैसला देते हुए 10 से 50 साल की महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दे दी थी। हालाँकि, इंदु मल्होत्रा इस फैसले से असहमत थीं और उन्होंने अपने अलग मत में मंदिर की उस परंपरा को सही ठहराया था, जिसमें मासिक धर्म की उम्र वाली महिलाओं के प्रवेश पर रोक थी।
अदालत के इस फैसले के बाद भगवान अयप्पा के श्रद्धालुओं में भारी नाराजगी देखी गई, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएँ भी शामिल थीं। इसके बाद फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं।
नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की पीठ ने 3:2 के बहुमत से कहा कि यह फैसला अन्य धर्मों के मामलों को भी प्रभावित कर सकता है। इसलिए धार्मिक स्वतंत्रता और ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं’ (Essential Religious Practices) के दायरे से जुड़े बड़े संवैधानिक सवालों को विस्तृत सुनवाई के लिए नौ जजों की पीठ को भेज दिया गया।

