सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने गुरुवार (23 अप्रैल 2026) को धार्मिक स्थलों (जैसे सबरीमाला) में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़े अहम मामले की सुनवाई के दौरान अहम टिप्पणी की।
कोर्ट ने कहा कि अदालत सभी प्रख्यात व्यक्तियों के विचारों का सम्मान करती है, लेकिन ‘व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी’ से मिली जानकारी को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
सुनवाई के दौरान नीरज किशन कौल ने कॉन्ग्रेस नेता शशि थरुर के एक लेख का हवाला देते हुए कहा कि गहरे धार्मिक विश्वासों से जुड़े मामलों में फैसला करते समय कोर्ट को यह समझ होना चाहिए कि कानूनी तर्क की भी अपनी सीमाएँ होती हैं।
इस पर जस्टिस बी वी नागरत्ना ने मुस्कुराते हुए कहा, “लेकिन ‘व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी’ से बिल्कुल नहीं।” इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “अदालत सभी प्रख्यात व्यक्तियों का सम्मान करती है, लेकिन व्यक्तिगत राय, व्यक्तिगत राय ही होती है।”
कौल ने जवाब देते हुए कहा, “यदि ज्ञान और बुद्धिमत्ता किसी भी स्रोत, किसी भी देश या किसी भी विश्वविद्यालय से आती है, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए।”
सबरीमाला और धार्मिक स्वतंत्रता पर स्पष्ट टिप्पणी
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सुधार को लेकर भी अहम टिप्पणियाँ कीं। मुख्य जज ने कहा, “राज्य जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है और यदि लोग किसी सामाजिक बुराई में सुधार चाहते हैं, तो उस शक्ति का उपयोग किया जा सकता है।”
इससे पहले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मंदिरों को संप्रदाय के आधार पर दूसरों को बाहर नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करना अंततः उस संप्रदाय को ही कमजोर करेगा।कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी धर्म की कौन-सी प्रथा ‘अनिवार्य’ है और कौन-सी नहीं, यह तय करना बेहद कठिन, बल्कि लगभग असंभव है।
यह पूरा विवाद 2018 के सबरीमाला मामले से जुड़ा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को असंवैधानिक करार दिया था। इसके बाद दायर पुनर्विचार याचिकाओं और अन्य धर्मों में इसी तरह के मुद्दों को देखते हुए यह मामला नौ जजों की बड़ी पीठ को सौंपा गया।

