‘दम है तो पहले वर्दी उतारो, फिर चुनाव लड़कर दिखाओ’: आसिम मुनीर पर भड़के पाकिस्तानी मौलाना फजलुर रहमान, सरेआम उतारी इज्जत

पाकिस्तान के फौज प्रमुख आसिम मुनीर की सरेआम बेइज्जती हुई है। जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल (JUI-F) के नेता मौलाना फजलुर रहमान ने सीधे आसिम मुनीर के मुँह पर करारा तमाचा जड़ा है। मौलाना ने फौज प्रमुख को खुली चुनौती दी है। उन्होंने साफ कहा कि अगर आसिम मुनीर को राजनीति करने का इतना ही शौक है, तो वह पहले अपनी फौज की वर्दी उतारें। उसके बाद चुनावी मैदान में आकर जनता का सामना करें।

यह तीखा हमला रविवार (12 जुलाई 2026) को पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में हुआ। वहाँ एक बड़ी जनसभा को संबोधित करते हुए मौलाना फजलुर रहमान ने सीधे आसिम मुनीर को अपनी औकात याद दिलाई। उन्होंने पूरी जनता के सामने आरोप लगाया कि पाकिस्तान की फौज अपनी हदें पार कर रही है। वह संविधान को ताक पर रखकर देश की राजनीति में जरूरत से ज्यादा टांग अड़ा रही है।

‘वर्दी पहनकर क्या घूमते हो, मैदान में आओ’

मौलाना फजलुर रहमान यहीं नहीं रुके, उन्होंने बेहद आक्रामक अंदाज में आसिम मुनीर की फजीहत की। उन्होंने गरजते हुए कहा, “अगर आपको राजनीति करनी है तो अपनी वर्दी उतारिए और चुनावी मैदान में आइए। चुनाव लड़कर देखिए कि वर्दी पहनने वाले व्यक्ति को जनता कितने वोट देती है।” मौलाना ने सीधे मुनीर के घमंड को चूर-चूर कर दिया।

सरकार बनाना या गिराना फौज का काम नहीं

फजलुर रहमान ने अपने हमले को और तेज करते हुए आरोप लगाया कि पाकिस्तान की फौज यह तय करने की कोशिश करती है कि देश में कौन सरकार बनाएगा और किस सरकार को हटाया जाएगा।

उन्होंने कहा, “आप यह समझते हैं कि जिसे चाहें सरकार में ले आएँ और जिसे चाहें सत्ता से हटा दें। लेकिन पाकिस्तान पर कौन शासन करेगा, यह तय करना फौज की संवैधानिक जिम्मेदारी नहीं है।”

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि फौज का बढ़ता दखल पाकिस्तान की संस्थाओं को कमजोर कर रहा है और देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था धीरे-धीरे खोखली होती जा रही है।

फजलुर रहमान की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को पाकिस्तान का सबसे प्रभावशाली व्यक्ति माना जाता है। कई विश्लेषकों का मानना है कि उनका प्रभाव सिर्फ सैन्य मामलों तक सीमित नहीं है, बल्कि कई मामलों में वह प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से भी अधिक प्रभावशाली दिखाई देते हैं। हाल ही में पाकिस्तान सरकार ने आसिम मुनीर को जनसंख्या प्रबंधन से जुड़ी एक उच्चस्तरीय समिति में शामिल किया है। इस फैसले के बाद शासन-प्रशासन में फौज  की बढ़ती भूमिका को लेकर बहस और तेज हो गई है।

आतंकवाद से लड़ना फौज की जिम्मेदारी

फजलुर रहमान ने आम नागरिकों से आतंकवाद के खिलाफ हथियार उठाने की बात का भी विरोध किया। उन्होंने कहा कि देश की सुरक्षा करना फौज का दायित्व है, आम लोगों का नहीं।

उन्होंने कहा, “कहा जाता है कि फौजी अपनी जान कुर्बान कर रहे हैं। लेकिन फौजी वर्दी पहनते हैं और उन्हें वेतन भी इसी जिम्मेदारी के लिए मिलता है कि वे देश की रक्षा करें। फिर उनकी कुर्बानी का बोझ आम जनता पर क्यों डाला जाए? उनकी तनख्वाह भी जनता के पसीने और खून-पसीने की कमाई से दिए गए टैक्स से चलती है।”

उन्होंने साफ कहा, “मैंने कभी सरकार से वेतन नहीं लिया और न ही मैं कोई निजी मिलिशिया खड़ी करूँगा।” फजलुर रहमान ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर आम लोगों को हथियार उठाने के लिए कहा गया तो इससे लंबे समय तक दुश्मनी और हिंसा का माहौल बनेगा।

उन्होंने कहा, “हो सकता है कि आप कल यहाँ न रहें, लेकिन आप इस जमीन को आने वाली कई पीढ़ियों तक चलने वाली दुश्मनी और खून-खराबे की ओर धकेल रहे हैं। इससे लगातार हिंसा का रास्ता खुलेगा।”

बलूचिस्तान के बड़े हिस्से पर सरकार का नियंत्रण नहीं

फजलुर रहमान ने पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा स्थिति पर भी चिंता जताई। उन्होंने दावा किया कि बलूचिस्तान के बड़े हिस्से में सरकार का प्रभावी नियंत्रण नहीं रह गया है।

उन्होंने कहा, “बलूच इलाके में विद्रोह हुआ और पूरा क्षेत्र पाकिस्तान के नियंत्रण से बाहर चला गया। आज भी वहाँ सरकार की प्रभावी पकड़ नहीं है।”

उन्होंने यह भी दावा किया कि अब यह अस्थिरता केवल बलूच बहुल इलाकों तक सीमित नहीं रही, बल्कि पश्तून क्षेत्रों तक भी फैल चुकी है। उनके अनुसार यह पाकिस्तान की बिगड़ती सुरक्षा स्थिति का संकेत है।

फजलुर रहमान का यह बयान ऐसे समय सामने आया है जब बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में आतंकी हमलों में बढ़ोतरी देखी जा रही है। इन घटनाओं के बीच पाकिस्तान की सुरक्षा नीति और देश की राजनीति व प्रशासन में फौज की बढ़ती भूमिका को लेकर एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं।