घर से निकलने के बाद अंकित शर्मा लापता हुए और अगले दिन उनकी लाश सीधे मस्जिद के पास एक नाले से अत्यंत क्षत-विक्षत स्थिति में बरामद हुई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने पूरी क्रूरता को उजागर कर दिया। मीडिया में छपी उनते हाथ की तस्वीर ने सबको दंग कर दिया। उनके शरीर पर 51 बार चाकुओं से वार किया गया था, उनके अंग छिन्न-भिन्न हो चुके थे और आंतें बाहर आ गई थीं। यह एक ऐसी बर्बरता थी जिसे याद कर आज भी रूह कांप जाती है।
13 जुलाई 2026 को दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत ने जब इस जघन्य हत्याकांड में शामिल आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को दोषी ठहराया है, ये माना है कि उस वीभत्सता के पीछे ताहिर हुसैन का ही हाथ था, तो ऐसे में उन वामपंथी-कट्टरपंथी गिद्धों की करतूत को याद करना जरूरी हो जाता है जिन्होंने बर्बर हत्या पर अपना नैरेटिव गढ़ा था और ताहिर हुसैन को बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, उसे मासूम-बेचारा दिखाया था।
ताहिर हुसैन को बचाने में एक्टिव था पूरा इकोसिस्टम
इस कुत्सित प्रयास में केवल सोशल मीडिया के कट्टरपंथी या वामपंथी यूजर्स ही शामिल नहीं थे, बल्कि राजनेता, कलाकार, पत्रकार और नामी मीडिया संस्थान भी संगठित रूप से सक्रिय थे।
अपने आपको पत्रकार कहने वाली राणा अय्यूब ने ताहिर हुसैन की गिरफ्तारी को सांप्रदायिक रंग देते हुए इस तरह पेश किया जैसे देश में मुस्लिमों को निशाना बनाया जा रहा हो और हिंदुओं को छोड़ा जा रहा है।
Tahir Hussain arrested. Kapil Mishra gets Y plus security, Anurag Thakur is free, no one seeking accountability from Amit Shah, Modi is being celebrated. We call this majority privilege https://t.co/GOyFzkUddz
— Rana Ayyub (@RanaAyyub) March 6, 2020
वहीं वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने बेशर्मी दिखाते हुए इस बात पर आपत्ति जताई थी कि अंकित शर्मा की हत्या को इतना महत्व क्यों दिया जा रहा है।
35 people have died in riots till now; but for RW Internet army, only Ankit Sharma matters because needle of suspicion is on AAP councillor, Tahir Hussain. The day we seek justice for each and every innocent victim of riots, Hindu or Muslim, we will build a ‘new’ better India!
— Rajdeep Sardesai (@sardesairajdeep) February 27, 2020
और, आरफा खानम शेरवानी ने तो दिल्ली पुलिस द्वारा वांछित ताहिर हुसैन का उस समय में इंटरव्यू लेकर उसे एक आरोपित के बजाय ‘पीड़ित’ के रूप में दिखाने का प्रयास किया था।
Surrender plea rejected by the court.
— Arfa Khanum Sherwani (@khanumarfa) March 5, 2020
Tahir Hussain is arrested by Delhi Police.
“Have full faith in the justice system of my country…Am surrendering before the court today.”
Tahir Hussain told this to @thewire_in this morning
Watch full interview herehttps://t.co/ldXjssoJwa
इसी तरह, AAP नेता अमानतुल्लाह खान जैसे राजनेताओं ने भी ‘मुस्लिम कार्ड’ खेलते हुए दावा किया कि ताहिर को सिर्फ उसके मजहब के कारण फँसाया जा रहा है। खुद ताहिर हुसैन ये बोलता हुआ मिला था कि अगर निष्पक्ष जाँच हुई तो वो निर्दोषी पाया जाएगा लेकिन अगर उसका ‘नाम’ देखा गया तो उसके साथ कुछ भी हो सकता है। ताहिर हुसैन को पीएफआई तक ने समर्थन दिया था।
आज ताहिर हुसैन सिर्फ़ इस बात की सज़ा काट रहा है की वो एक मुस्लिम है। शायद आज हिंदुस्तान में सबसे बड़ा गुनाह मुस्लिम होना है ये भी होसकता है आने वाले वक्त में ये साबित करदिया जाए कि दिल्ली की हिंसा ताहिर हुसैन ने कराई है।
— Amanatullah Khan AAP (@KhanAmanatullah) March 7, 2020
साक्षी जोशी और विनोद कापरी जैसे लोगों ने तो ताहिर हुसैन द्वारा पुलिस को किए गए फोन कॉल्स को उसकी बेगुनाही का सबसे बड़ा प्रमाण बताया। जबकि पुलिस जाँच में यह तथ्य सामने आया कि वे कॉल्स खुद को कानूनी रूप से बचाने के लिए चली गई एक सोची-समझी चाल थे।


बॉलीवुड फिल्म निर्माता अनुराग कश्यप ने तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया। उन्होंने ताहिर हुसैन, उमर खालिद और खालिद सैफी के बचाव में तर्क दिया कि दंगों की साजिश की तारीखें और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा का समय मेल नहीं खाते।
जबकि, बाद में पुलिस जाँच में यह साफ हो गया कि यह साजिश बहुत पहले से और गहराई से रची गई थी।
Claim by Delhi Police: conspiracy of Riots hatched on Jan 8 by @UmarKhalidJNU, @KSaifi
— Anurag Kashyap (@anuragkashyap72) June 12, 2020
& Tahir Hussain to coincide with Trump's Feb visit.
Fact: News that Trump may come to India was first announced tentatively only on 13 Jan
इसी तरह जावेद अख्तर ने लिखा था, “कई मारे गए, कई सारे घायल हुए, कई घर जला दिए गए, कई दुकानें लूटी गईं। कई लोगों को नुक़सान हुआ लेकिन पुलिस ने केवल एक घर सील किया और उसके मालिक को ढूँढ रही है। संयोगवश उसका नाम ताहिर हुसैन है, दिल्ली पुलिस की कंसिस्टेंसी को सलाम है।”
बॉलीवुड गायक और म्यूजिक कंपोजर विशाल ददलानी ने भी ताहिर हुसैन को बेकसूर बताया। विशाल ने ट्विटर पर लिखा कि दंगो में शामिल कोई शख्स पुलिस को फोन क्यों करेगा।
Let's be very clear. Tahir Hussain is the guy that "they" are trying to blame for rioting and violence. Many of you have also bought that narrative.
— VISHAL DADLANI (@VishalDadlani) March 7, 2020
BUT…ask yourself…why would HE call the Police 5 times?
Let the public hear those calls!! That will clarify a LOT! https://t.co/HqKHhti806
इस पूरे मामले में डिजिटल और मुख्यधारा के मीडिया के एक वर्ग ने भी ताहिर को निर्दोष दिखाने में अपनी ओर से कसर नहीं छोड़ी थी। बढ़-चढ़कर ताहिर का पक्ष बताने की होड़ लगी थी।
द वायर जैसी प्रोपगेंडा साइट ने ने शुरुआत में ही ताहिर हुसैन के पक्ष को रखने के लिए एक पूरा शो समर्पित कर दिया था, जहाँ उसकी बातों को ही तवज्जो दी गई।
वहीं द लल्लनटॉप ने घटना के एक साल बाद एक- देहली नाम से वीडियो/डॉक्यूमेंट्री जारी की थी। इसमें नजर आई इंडिया टुडे की पत्रकार ने यह नैरेटिव गढ़ने का प्रयास किया गया कि अंकित शर्मा स्वयं भीड़ का हिस्सा थे और मुस्लिम इलाके की तरफ बढ़ रहे थे, जिससे पीड़ित को ही एक तरह से दोषी के रूप में कटघरे में खड़ा कर दिया गया था।
ताहिर को बचाने के लिए वामपंथियों ने नकारे सारे सबूत
गौरतलब हो कि दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों के बाद सबसे हैरानी की बात यह है कि ‘लिबरल और इस्लामी गिरोह’ द्वारा यह पूरा प्रोपेगैंडा तब चलाया जा रहा था, जब ताहिर हुसैन के घर की छत से भारी मात्रा में पत्थर, पेट्रोल बम और तेजाब की बोतलें बरामद हुई थीं, सोशल मीडया पर हर जगह उसके खुद छत पर होने के वीडियो वायरल थे, अंकित के परिजन रो-रोकर ताहिर को मुख्य साजिशकर्ता बता रहे थे, एक के बाद एक इस्लामी कट्टरपंथी गिरफ्तार हो रहे थे, ताहिर अपने कुकर्म स्वीकार रहा था या अदालत ये कह रही थी उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंदुओं पर हुए हमले एक सुनियोजित और गहरी साजिश का हिस्सा थे।
आज जब यह मामला न्याय की दहलीज पर है, ताहिर हुसैन को सजा मिलना शेष है, तब अपराधियों के साथ-साथ उनके इन पैरोकारों के चेहरों को भी याद रखना जरूरी है। यह इतिहास में दर्ज रहेगा कि कैसे एक निर्दोष युवक को 51 बार चाकुओं से गोदे जाने की क्रूरता को भुलाकर, इस वामपंथी गिरोह ने सिर्फ अपने राजनीतिक और वैचारिक एजेंडे के लिए एक दंगाई और हत्यारे के बचाव में एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था।


