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अजीत झा

संपादक, ऑपइंडिया (हिंदी)

याकूब मेमन से उमर खालिद तक: जब ‘न्याय’ इस्लामी-वाम गठजोड़ के मजहबी नैरेटिव को चुभने लगता है

उमर खालिद और शरजील इमाम पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद फिर वही पैटर्न। कानून नहीं, मजहबी पहचान और मजहब की भावना थोपने की कोशिश।

क्रिकेट या दावत-ए-जिहाद? मैदान में इस्लामी विक्टिमहुड घुसाने की साजिश

उस्मान ख्वाजा और फुरकान भट उसी इस्लामी एजेंडा की कड़ी हैं जो क्रिकेट को भीतर से खोखला कर रहा है।

2026: भारत का वर्ष- नेतृत्व, निर्णायकता और दिशा

नववर्ष 2026 में ऑपइंडिया की भूमिका केवल समाचार देने तक सीमित नहीं है। हमारा लक्ष्य स्पष्ट है- तथ्यों के साथ निर्भीकता और राष्ट्र के साथ स्पष्ट प्रतिबद्धता।

2026: जब भारत के नेतृत्व में पश्चिमी प्रभुत्व की विश्व व्यवस्था दरकने लगेगी

BRICS की अध्यक्षता भारत को नियम तय करने की स्थिति में ला रही है- जहाँ डॉलर, पश्चिमी वर्चस्व और चीन की सीमाएँ एक साथ उजागर होंगी।

वही व्यवस्था टिकेगी जो जमीन से उठी हो, संगठन में तपी हो, जिसके केंद्र में राष्ट्र हो: BJP के ‘नवीन’ प्रयोग के निहितार्थ

नितिन नवीन का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनना कोई सामान्य संगठनात्मक फेरबदल नहीं। स्पष्ट घोषणा है कि बीजेपी भविष्य को संयोग के भरोसे नहीं छोड़ेगी।

धुरंधर और टूटता बॉलीवुड नैरेटिव: सिनेमा से लौट रही है भारत की दबाई गई स्मृति

द कश्मीर फाइल्स से धुरंधर तक, नई फिल्मों ने आतंक और मजहब प्रेमी तथा भारत विरोधी सिनेमाई गठजोड़ को कठघरे में खड़ा कर दिया है।

नहीं ‘पाप’ का भागी केवल व्याध (कॉन्ग्रेस+सुप्रीम कोर्ट), सुषुप्त हिंदुओं का भी समय लिखेगा ‘अपराध’

बानू मुश्ताक ने मैसूर दशहरा महोत्सव का उद्घाटन किया है। क्या कॉन्ग्रेस और सुप्रीम कोर्ट ही इसकी दोषी है? सुषुप्त हिंदुओं का कोई दोष नहीं?

बिहार की हर सीट पर तेजस्वी का चेहरा चुनाव लड़ रहा है… गईल भैंस पानी में

तेजस्वी यादव का नाम और चेहरा, जिस विरासत और परिवार से जुड़ा है, बिहार के लोग उसकी राजनीति को अपराध और भ्रष्टाचार से अलग कर नहीं देख पाते हैं।