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अजीत झा

संपादक, ऑपइंडिया (हिंदी)

अविलंब फायर करो, जो होगा मैं समझ लूँगा… कहने वाले ‘खान सर’ की सबने सुनी, पर रौशन आनंद की क्यों सुनवाई नहीं कर रही...

कोचिंग फायरिंग विवाद में रौशन आनंद का सवाल है कि खान सर के मैनेजर की शिकायत पर उनकी गिरफ्तारी हुई, लेकिन उनकी शिकायतों पर FIR क्यों नहीं दर्ज कर रही पुलिस?

सोनम वांगचुक का अनशन हेडलाइन, ग्रामीणों का सत्याग्रह फुटनोट क्यों बन जाता है?

सोनम वांगचुक के भूख हड़ताल पर शोर। लेकिन मध्य प्रदेश के जल सत्याग्रह पर खामोशी। आखिर कौन तय करता है? क्या सरकार हर आमरण अनशन के आगे झुकने को बाध्य है?

पहले भरत तिवारी, अब बंटी यादव… बिहार पुलिस ये दाग अच्छे नहीं

भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद अब बंटी यादव की हत्या से सवालों के घेरे में बिहार पुलिस। जानिए कब, क्या, कैसे हुआ। क्यों उठ रहे सवाल?

कॉकरोच जनता पार्टी: ‘क्रांति’ की रील और लोकतंत्र की रियलिटी

कॉकरोच जनता पार्टी, जेपी-अन्ना हजारे आंदोलन और भारतीय लोकतंत्र के संदर्भ में समझिए कि केवल असंतोष ही पर्याप्त क्यों नहीं होता। भारतीय मतदाता क्या देखते हैं?

भारतीय मीडिया की एक शैली यह भी- हर अपराध में गढ़ो ‘सवर्ण विलेन’

भारतीय मीडिया हेडलाइन के जरिए इस तरह से नैरेटिव गढ़ती है कि हर घटना में आरोपित/अपराधी के कथित ऊँची जातियों से ही होने का भ्रम पैदा हो।

जंगलराज से भी भयावह: मालदा, भय और पश्चिम बंगाल में निष्पक्ष चुनाव की चुनौती

बिहार में केजे राव मॉडल से चुनाव आयोग ने बदली थी तस्वीर। मालदा का संकट बताता है कि वही सख्ती पश्चिम बंगाल में लागू करने का समय यही है।

ST-OBC के लिए भी हो SC जैसी स्पष्ट रेखा, इसके बिना पूरा नहीं होगा ‘सामाजिक न्याय’

SC वर्ग के व्यक्ति के धर्म से बाहर जाने और घर वापसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जो स्पष्टता दी है, वैसी ही स्पष्टता ST-OBC के लिए भी आवश्यक है।

साधना से मर्यादा तक: चैत्र नवरात्र और रामनवमी की शक्ति संस्कृति

जिस सभ्यता की कालगणना शक्ति साधना से आरंभ होती है, विडंबना है कि उसी समाज को वैचारिक आक्रांताओं ने अहिंसा की विवशता का पाठ पढ़ा दिया।