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अजीत झा

संपादक, ऑपइंडिया (हिंदी)

कॉकरोच जनता पार्टी: ‘क्रांति’ की रील और लोकतंत्र की रियलिटी

कॉकरोच जनता पार्टी, जेपी-अन्ना हजारे आंदोलन और भारतीय लोकतंत्र के संदर्भ में समझिए कि केवल असंतोष ही पर्याप्त क्यों नहीं होता। भारतीय मतदाता क्या देखते हैं?

भारतीय मीडिया की एक शैली यह भी- हर अपराध में गढ़ो ‘सवर्ण विलेन’

भारतीय मीडिया हेडलाइन के जरिए इस तरह से नैरेटिव गढ़ती है कि हर घटना में आरोपित/अपराधी के कथित ऊँची जातियों से ही होने का भ्रम पैदा हो।

जंगलराज से भी भयावह: मालदा, भय और पश्चिम बंगाल में निष्पक्ष चुनाव की चुनौती

बिहार में केजे राव मॉडल से चुनाव आयोग ने बदली थी तस्वीर। मालदा का संकट बताता है कि वही सख्ती पश्चिम बंगाल में लागू करने का समय यही है।

ST-OBC के लिए भी हो SC जैसी स्पष्ट रेखा, इसके बिना पूरा नहीं होगा ‘सामाजिक न्याय’

SC वर्ग के व्यक्ति के धर्म से बाहर जाने और घर वापसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जो स्पष्टता दी है, वैसी ही स्पष्टता ST-OBC के लिए भी आवश्यक है।

साधना से मर्यादा तक: चैत्र नवरात्र और रामनवमी की शक्ति संस्कृति

जिस सभ्यता की कालगणना शक्ति साधना से आरंभ होती है, विडंबना है कि उसी समाज को वैचारिक आक्रांताओं ने अहिंसा की विवशता का पाठ पढ़ा दिया।

SC/ST एक्ट पर सवाल उठाना न तो अपराध है, न ही ‘सवर्ण वर्चस्व’ का प्रमाण

दरभंगा के हरिनगर गाँव की घटना SC/ST एक्ट के उस चेहरे को उजागर करती है, जिस पर सवाल उठाना 'अपराध' मान लिया जाता है।

शैक्षणिक परिसर को ‘सामाजिक न्याय उद्योग’ का अखाड़ा न बनाएँ- UGC नियमावली पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के संदेश

सुप्रीम कोर्ट की रोक ने उस ढाँचे पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, जिसके जरिए UGC शैक्षणिक परिसरों में डर, संदेह और एकतरफा प्रक्रिया को संस्थागत रूप देना चाहता था।

जले नोटों पर चुप्पी, सवालों पर ‘मीडिया ट्रायल’ का लेबल: क्या न्यायपालिका खुद को कानून से ऊपर मानती है?

मीडिया ट्रायल या जवाबदेही से डर? जस्टिस यशवंत वर्मा केस और मुकुल रोहतगी के बयान ने न्यायपालिका पर उठाए असहज सवाल।