सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (SC/ST) अधिनियम से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए एक केस को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि घर की चारदीवारी के भीतर आपसी विवाद के दौरान कहे गए जातिसूचक शब्द तब तक अपराध की श्रेणी में नहीं आते, जब तक कि वे ‘सार्वजनिक दृष्टि’ में न कहे गए हों।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) को लागू करने के लिए ‘सार्वजनिक दृष्टि’ एक अनिवार्य शर्त है।
सामान्य भाषा में कहें तो यदि घटना किसी निजी स्थान पर भी हुई है, तब भी यह आवश्यक है कि वहाँ आम जनता मौजूद हो या किसी बाहरी व्यक्ति ने उसे देखा-सुना हो। केवल घर के भीतर हुई घटना को सार्वजनिक अपमान नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल आरोप लगाने भर से मामला नहीं बनता, बल्कि एफआईआर में अपराध के सभी आवश्यक तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देने चाहिए। यदि प्रथम दृष्टया अपराध के मूल तत्व (जैसे पब्लिक व्यू) मौजूद न हों, तो एफआईआर को कानूनन रद्द किया जा सकता है।

अदालत ने केस में भारतीय दंड संहिता की धारा 506 (आपराधिक धमकी) के आरोप को भी खारिज कर दिया। कोर्ट के अनुसार, एफआईआर में ऐसा कोई तथ्य नहीं था जिससे यह साबित हो कि आरोपितों का उद्देश्य शिकायतकर्ता में ‘भय’ पैदा करना था, जो इस केस के लिए जरूरी हिस्सा है।
क्या है मामला
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट कोर्ट की यह टिप्पणी दिल्ली के कीर्ति नगर में हुए एक पारिवारिक विवाद से जुड़े केस पर आई। मामले में 4 आरोपित थे। दो शिकायतकर्ता के भाई और 2 उनकी पत्नियाँ। अनुसूचित जाति समुदाय से आने वाले शिकायतकर्ता का आरोप लगाया था कि उसके भाई (जो एससी समुदाय के ही थे) और उनकी पत्नियाँ (जो शादी से पहले दूसरी जाति की थीं) उन्होंने उसे जातिसूचक शब्द कहकर अपमानित किया और धमकाया।
एफआईआर में शिकायतकर्ता ने कहा था कि, 28 जनवरी 2021 को आरोपितों ने घर का ताला तोड़ने की कोशिश करते हुए उसके लिए- ‘चम@₹’, ‘हरिजन’, ‘चूड़ा’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। इसके बाद ही 30 जनवरी 2021 को पुलिस में मामला दर्ज हुआ।
हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि शिकायत में कहीं भी यह नहीं बताया गया कि घटना किसी ऐसी जगह हुई थी जहाँ आम लोग मौजूद थे या कोई घटना देख-सुन सकता था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस केस में दिल्ली हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के आदेशों को रद्द करते हुए आरोपपत्र और सभी आपराधिक कार्यवाहियों को निरस्त कर दिया तथा आरोपितों की अपील स्वीकार करते हुए कहा कि यदि जातिसूचक शब्द आपस में बैठकर दिए गए हैं तो वो अपराध नहीं माना जाएगा।

