मंदिर के पुजारी का किसी खास जाति-वंश से होना आवश्यक धार्मिक परंपरा नहीं: केरल हाईकोर्ट ने खारिज की ‘तंत्र विद्यालयों’ के खिलाफ याचिका

केरल हाईकोर्ट ने बुधवार (22 अक्टूबर 2025) को अखिल केरल तंत्रि समाज (Akhila Kerala Thanthri Samajam – AKTS) द्वारा दायर की गई एक याचिका को खारिज कर दिया। यह याचिका उन संस्थानों के खिलाफ थी जिन्हें त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड (Travancore Devaswom Board – TDB) और केरल देवस्वम भर्ती बोर्ड (Kerala Devaswom Recruitment Board – KDRB) ने ‘तंत्र विद्यालय’ के रूप में मान्यता और मान्यता-पत्र दिया था।

AKTS ने KDRB के उस फैसले को भी चुनौती दी थी, जिसमें यह कहा गया था कि मंदिरों में अंशकालिक शंति (पुजारी) के पदों पर नियुक्ति के लिए उम्मीदवारों के पास ‘तंत्र विद्या पीठम’ (Tantra Vidya Peetoms) से प्रमाणपत्र होना जरूरी होगा।

जस्टिस के.वी. जयकुमार और जस्टिस राजा विजयराघवन की खंडपीठ ने इस याचिका को खारिज करते हुए कहा कि मंदिर के पुजारी का किसी खास जाति या वंश से होना कोई ‘आवश्यक धार्मिक परंपरा’ नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं का यह तर्क सही नहीं है कि पुजारी की नियुक्ति पारंपरिक तरीकों से होती आई है और उसे किसी अधिनियम या नियम से बदला नहीं जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि KDRB द्वारा तैयार किया गया पाठ्यक्रम वैदिक ग्रंथों, धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पद्धतियों और उपासना के तरीकों को शामिल करता है, जिन्हें योग्य विद्वानों और तंत्रियों द्वारा सिखाया जाता है। इन पाठ्यक्रमों की अवधि एक साल से लेकर पाँच साल तक होती है।

कोर्ट ने कहा, “हमारे सामने प्रस्तुत किए गए दस्तावेज़ों से यह साफ होता है कि TDB और KDRB ने किसी संस्थान को मान्यता देने से पहले एक सख्त संस्थागत प्रक्रिया बनाई हुई है।”

याचिकाकर्ता का यह कहना था कि केवल पारंपरिक पुजारियों से प्रशिक्षण प्राप्त लोग ही पुजारी बन सकते हैं लेकिन अदालत ने इस तर्क को भी ठुकरा दिया। कोर्ट ने कहा, “ऐसी परिस्थितियों में यह कहना कि किसी व्यक्ति को सिर्फ किसी खास जाति या वंश से होना चाहिए ताकि वह पुजारी बन सके इसे किसी जरूरी धार्मिक परंपरा या पूजा-पद्धति के रूप में नहीं देखा जा सकता। इस दावे को साबित करने के लिए न तो कोई तथ्यात्मक और न ही कानूनी आधार पेश किया गया है।”

अदालत ने आगे कहा कि यह कहना भी गलत है कि आध्यात्मिक कार्यों से असंबंधित लोगों को पुजारी बनाया जा रहा है और इससे याचिकाकर्ताओं के मौलिक अधिकार जो उन्हें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मिले हैं का उल्लंघन हो रहा है। अदालत ने इस तर्क को अस्वीकार्य बताया है।